सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

ऋग्वेद 1.37.7-जो राजा वायु के समान शीघ्र दण्ड देता है, उसको तुम पिता के समान जानो !

नि वो यामाय मानुषो ध्र प्राय॑ म॒न्यवै

जिहीत पर्वतो गिरिः॥७॥

निवः। यामाया मानुषः। दु उग्राय। मन्यवैजिहीत। पर्वतःगिरिः॥७॥

पदार्थः-(नि) निश्चयार्थे (वः) युष्माकम् (यामाय) यथार्थव्यवहारप्रापणाय। अर्तिस्तुसु० (उणा० १.१४०)। इति याधातोर्मप्रत्ययः। (मानुषः) सभापतिर्मनुजः (द ) धरति। अत्र लडथै लि
ट्।(उग्राय) तीव्रदण्डाय (मन्यवे) क्रोधरूपाय (जिहीत) स्वस्थानाच्चलति। अत्र लडथै लिङ्। (पर्वतः) मेघः (गिरिः) यो गिरति जलादिकं गृणाति महतः शब्दान् वा सः॥७॥


अन्वयः-हे प्रजासेनास्था मनुष्या! भवन्तो यस्य सेनापतेर्भयाद्वायोः सकाशाद् गिरिः पर्वत इव शत्रुगणो जिहीत पलायते, स मानुषो वो युष्माकं यामाय मन्यव उग्राय च राज्यं दध्र इति विजानन्तु॥७॥

भावार्थ:-अत्र लुप्तोपमालङ्कारः। हे प्रजासेनास्था मनुष्याः! युष्माकं सर्वे व्यवहारा राज्यव्यवस्थयैव वायुवद् व्यवस्थाप्यन्ते। स्वनियमविचलितेभ्यश्च युष्मभ्यं वायुरिव सभाध्यक्षो भृशं दण्डं दद्यात्, यस्य भयाच्छत्रवश्च वायोर्मेघा इव प्रचलिता भवेयुस्तं पितृवन्मन्यध्वम्॥७॥

मोक्षमूलरोक्तिः। हे वायवो! युष्माकमागमनेन मनुष्यस्य पुत्रः स्वयमेव नम्रो भवति, युष्माकं क्रोधात् पलायत इति व्यर्थोऽस्ति। कुतोऽत्र गिरिपर्वतशब्दाभ्यां मेघो गृहीतोऽस्ति, मानुषशब्दोऽर्थो निदधे इति क्रियायाः कर्त्तास्त्यतो नात्र बालकशिरो नमनस्य ग्रहणं यथा सायणाचार्यस्य व्यर्थोऽर्थः तथैव मोक्षमूलरस्यापीति वेद्यम्। यदि वेदकर्तेश्वर एव नैव मनुष्याः सन्तीत्येतावत्यपि मोक्षमूलरेण न स्वीकृतं तर्हि वेदार्थज्ञानस्य तु का कथा।।७॥

पदार्थ:-हे प्रजासेना के मनुष्यो! जिस सभापति राजा के भय से वायु के बल से (गिरिः) जल को रोकने गर्जना करने वाले (पर्वतः) मेघ शत्रु लोग (जिहीत) भागते हैं वह (मानुषः) सभाध्यक्ष राजा (व:) तुम लोगों के (यामाय) यथार्थ व्यवहार चलाने और (मन्यवे) क्रोधरूप (उग्राय) तीव्र दण्ड देने के लिये राज्यव्यवस्था को (द ) धारण कर सकता है, ऐसा तुम लोग जानो॥७॥

भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचक लुप्तोपमालङ्कार है। हे प्रजासेनास्थ मनुष्यो! तुम लोगों के सब व्यवहार वायु के समान राजव्यवस्था ही से ठीक-ठीक चल सकते हैं और जब तुम लोग अपने नियमोपनियमों पर नहीं चलते हो, तब तुम को सभाध्यक्ष राजा वायु के समान शीघ्र दण्ड देता है और जिसके भय से वायु से मेघों के समान शत्रुजन पलायमान होते हैं, उसको तुम लोग पिता के समान जानो।॥७॥

मोक्षमूलर कहते हैं कि हे पवनो! आप के आने से मनुष्य का पुत्र अपने आप ही नम्र होता है तथा तुम्हारे क्रोध से डर भागता है। यह उनका कथन व्यर्थ है, क्योंकि इस मन्त्र में गिरि और पर्वत शब्द से मेघ का ग्रहण किया है। तथा मानुष शब्द का अर्थ धारण क्रिया का कर्ता है और न इस मन्त्र में बालक के शिर के नमन होने का ग्रहण है। जैसा कि सायणाचार्य का अर्थ व्यर्थ है, वैसा ही मोक्षमूलर का भी जानना चाहिये। वेद का करने वाला ईश्वर ही है, मनुष्य नहीं। इतनी भी परीक्षा मोक्षमूलर साहिब ने नहीं की, पुन: वेदार्थज्ञान की तो क्या ही कथा है।।७।

पुनस्तेषां योगेन किं भवतीत्युपदिश्यते

फिर उन पवनों के योग से क्या होता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।।

ऋग्वेद 1.37.6

 को ो वर्षिष्ठ आ नरो विश्च ग्मश्च धूतयः।

यत्सीमन्तुं न धूनुथ॥६॥

कः। वःवर्षिष्ठः। आ। नरः। दिवः। च। ग्मः। च। धूतयः। यत्। सीम्। अन्तम्। न। धूनुथ॥६॥

पदार्थ:-(क:) प्रश्ने (व:) युष्माकं मध्ये (वर्षिष्ठः) अतिशयेन वृद्धः (आ) समन्तात् (नरः) नयन्ति ये ते नरस्तत्सम्बुद्धौ (दिवः) द्योतकान् सूर्यादिलोकान् (च) समुच्चये (ग्म:) प्रकाशरहितपृथिव्यादि- लोकान्। ग्मेति पृथिवीनामसु पठितम्। (निघं०१.१) अत्र गमधातोर्बाहुलकादौणादिक आप्रत्यय उपधालोपश्च। (च) तत्सम्बन्धितश्च (धूतयः) धून्वन्ति ये ते (यत्) ये (सीम्) सर्वतः (अन्तम्) वस्त्रप्रान्तम् (न) इव (धूनुथ) शत्रून् कम्पयत॥६॥ ___

अन्वयः-हे धूतयो नरो विद्वांसो मनुष्या! यद्यो यूयं दिवः सूर्यादिप्रकाशकाँल्लोकाँस्तत्सम्बन्धिनोऽन्याँश्च रमः रमपृथिवीस्तत्सम्बन्धिन इतराँश्च सी सर्वतस्तृणवृक्षाद्यवयवान् कम्पयन्तो वायवो नेव शत्रुगणानामन्तं यदाधूनुथ समन्तात् कम्पयत तदा वो युष्माकं मध्ये को वर्षिष्ठो विद्वान्न जायते॥६॥

भावार्थ:-अत्रोपमालङ्कारः। विद्वद्भी राजपुरुषैर्यथाकश्चिबलवान् मनुष्यो निर्बलं केशान् गृहीत्वा कम्पयति, यथा च वायवः सर्वान् लोकान् धृत्वा कम्पयित्वा चालयित्वा स्वं स्वं परिधि प्रापयन्ति, तथैव सर्वं शत्रुगणं प्रकम्प्य तत्स्थानात् प्रचाल्य प्रजा रक्षणीया।।६।। __

मोक्षमूलरोक्तिः। हे मनुष्या! युष्माकं मध्ये महान् कोऽस्ति? यूयं कम्पयितार आकाशपृथिव्योः । यदा यूयं धारितवस्त्रप्रान्तकम्पनवत् तान् कम्पयत। अन्तशब्दार्थ सायणाचार्योक्तं न स्वीकुर्वे किन्तुविलसनाख्यादिभिरुक्तमित्यशुद्धमिति। कुतः? अत्रोपमालङ्कारेण यथा राजपुरुषाः शत्रूनितरे मनुष्यास्तृणकाष्ठादिकं च गृहीत्वा कम्पयन्ति तथा वायवोऽग्निपृथिव्यादिकं गृहीत्वा कम्पयन्तीत्यर्थस्य विदुषां सकाशान्निश्चयः कार्य इत्युक्तत्वात्। यथा सायणाचार्येण कृतोऽर्थो व्यर्थोऽस्ति, तथैव मोक्षमूलरोक्तोऽस्तीति विजानीमः॥६॥ ___

पदार्थ:-हे विद्वान् मनुष्यो! (धूतयः) शत्रुओं को कम्पाने वाले (नरः) नीतियुक्त (यत्) ये तुम लोग (दिव:) प्रकाश वाले सूर्य आदि (च) वा उनके सम्बन्धी और तथा (ग्म:) पृथिवी (च) और उनके सम्बन्धी प्रकाश रहित लोकों को (सीम्) सब ओर से अर्थात् तृण, वृक्ष आदि अवयवों के सहित ग्रहण करके कम्पाते हुए वायुओं के (न) समान शत्रुओं का (अन्तम्) नाश कर दुष्टों को जब (आधूनुथ) अच्छे प्रकार कम्पाओ, तब (व:) तुम लोगों के बीच में (क:) कौन (वर्षिष्ठः) यथावत् श्रेष्ठ विद्वान् प्रसिद्ध न हो॥६॥

भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। विद्वान् राजपुरुषों को चाहिये कि जैसे कोई बलवान् मनुष्य निर्बल मनुष्य के केशों का ग्रहण करके कंपाता और जैसे वायु सब लोकों का ग्रहण तथा चलायमान करके अपनी-अपनी परिधि में प्राप्त करते हैं, वैसे ही सब शत्रुओं को कम्पा और उनके स्थानों से चलायमान करके प्रजा की रक्षा करें॥६॥ ____

मोक्षमूलर साहिब का अर्थ कि हे मनुष्यो! तुम्हारे बीच में बड़ा कौन है तथा तुम आकाश वा पृथिवी लोक को कम्पाने वाले हो, जब तुम धारण किये हुए वस्त्र का प्रान्त भाग कंपने समान उनको कंपित करते होसायणाचार्य के कहे हुए अन्त शब्द के अर्थ को मैं स्वीकार नहीं करता, किन्तु विलसन आदि के कहे हुए को स्वीकार करता हूं। यह अशुद्ध और विपरीत है, क्योंकि इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे राजपुरुष शत्रुओं और अन्य मनुष्य, तृण, काष्ठ आदि को ग्रहण करके कंपाते हैं, वैसे वायु भी हैं, इस अर्थ का विद्वानों के सकाश से निश्चय करना चाहिये, इस प्रकार कहे हुए व्याख्यान से। जैसे सायणाचार्य का किया हुआ अर्थ व्यर्थ है, वैसा ही मोक्षमूलर साहिब का किया हुआ अर्थ अनर्थ है, ऐसा हम सब सज्जन लोग जानते हैं॥६॥

पुना राजप्रजाजनैः कथं भवितव्यमित्युपदिश्यते॥

फिर वे राजा और प्रजाजन कैसे होने चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

ऋग्वेद 1.37.5

 प्रशंसा गोष्वघ्यं क्रीळं यच्छमारुत

म्जम्भे रसस्य वावृधे॥५॥१२॥

प्रा शंस। गोषु। अन्यम्। क्रीळम्। यत्। शर्धः। मारुतम्। जम्भ। रसस्या ववृधे॥५॥

पदार्थ:-(प्र) प्रकृष्टार्थे (शंसा) अनुशाधि (गोषु) पृथिव्यादिष्विन्द्रियेषु पशुषु वा (अन्यम्) हन्तुमयोग्यमघ्न्याभ्यो गोभ्यो हितं वा। अध्यादयश्च। (उणा०४.११२)। अनेनाऽयं सिद्धः। अन्येति गोनामसु पठितम्। (निघं०२.११) (क्रीडम्) क्रीडति येन तत् (यत्) (शर्धः) बलम् (मारुतम्) मरुतो विकारो मारुतस्तम् (जम्भे) जम्भ्यन्ते गात्राणि विनाम्यन्ते चेष्टयन्ते येन मुखेन तस्मिन् (रसस्य) भुक्तान्नत उत्पन्नस्य शरीरवर्द्धकस्य भोगेन (वावृधे) वर्धते। अत्र तुजादीनां दीर्घोऽभ्यासस्य (अष्टा०६.१.७) इति दीर्घः ।।५॥ ___

अन्वयः-हे विद्वंस्त्वं यद् गोषु क्रीडमघ्न्यं मारुतं जम्भे रसस्य सकाशादुत्पद्यमानं शर्धो बलं वावृधे तन्मह्यं प्रशंस नित्यमनुशाधि॥५॥

भावार्थ:-मनुष्यैर्यद्वायुसम्बन्धि शरीरादिषु क्रीडाबलवर्धनमस्ति तन्नित्यं वर्धनीयम्। यावद्रसादिज्ञानं तत्सर्वं वायुसन्नियोगेनैव जायते, अतः सर्वैः परस्परमेवमनुशासनं कायं यतः सर्वेषां वायुगुणविद्या विदिता स्यात्।।५।

मोक्षमूलरोक्तिः। स प्रसिद्धो वृषभो गवां मध्य अर्थात् पवनदलानां मध्ये उपाधिवर्द्धितो जातः सन् यथा तेन मेघावयवाः खादिताः। कुतः? अनेन मरुतामादरः कृतस्तस्मादित्यशुद्धास्ति। कथम्। अत्र यद्गवां मध्ये मारुतं बलमस्ति। तस्य प्रशंसाः कार्याः। यच्च प्राणिभिर्मुखेन खाद्यते तदपि मारुतं बलमस्तीति। अत्र जम्भशब्दार्थे विलसन मोक्षमूलराख्यविवादो निष्फलोऽस्ति॥५॥

पदार्थ:-हे विद्वान्मनुष्यो! तुम (यत्) जो (गोषु) पृथिवी आदि भूत वा वाणी आदि इन्द्रिय तथा गौ आदि पशुओं में (क्रीडम्) क्रीड़ा का निमित्त (अघ्न्यम्) नहीं हनन करने योग्य वा इन्द्रियों के लिये हितकारी (मारुतम्) पवनों का विकाररूप (रसस्य) भोजन किये हुए अन्नादि पदार्थों से उत्पन्न (जम्भे) जिससे गात्रों का संचलन हो, मुख में प्राप्त हो के शरीर में स्थित (शर्धः) बल (वावृधे) वृद्धि को प्राप्त होता है, उसको मेरे लिये नित्य (प्रशंसा) शिक्षा करो।।५।

भावार्थ:-मनुष्यों को योग्य है कि जो वायुसम्बन्धी शरीर आदि में क्रीड़ा और बल का बढ़ना है, उसको नित्य उन्नति देवें और जितना रस आदि प्रतीत होता है, वह सब वायु के संयोग से होता है। इससे परस्पर इस प्रकार सब शिक्षा करनी चाहिये कि जिससे सब लोगों को वायु के गुणों की विद्या विदित हो जावे॥५॥ ___

मोक्षमूलर साहिब का कथन कि यह प्रसिद्ध वायु पवनों के दलों में उपाधि से बढ़ा हुआ जैसे उस पवन ने मेघावयवों को स्वादयुक्त किया है, क्योंकि इसने पवनों का आदर किया इससे। सो यह अशुद्ध है, कैसे कि जो इस मन्त्र में इन्द्रियों के मध्य में पवनों का बल कहा है, उसकी प्रशंसा करनी और जो प्राणि लोग मुख से स्वाद लेते हैं, वह भी पवनों का बल है और इस 'जम्भ' शब्द के अर्थ में विलसन और मोक्षमूलर साहिब का वाद-विवाद निष्फल है॥५॥

पुनरेतेभ्यः प्रजाराजजनाभ्यां कि किं कायं ज्ञातव्यं चेत्युपदिश्यते॥

फिर इन पवनों से मनुष्यों को क्या-क्या करना वा जानना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है। 

ऋग्वेद 1.37.4

 प्र वः शर्धाय घृष्वये त्वेषद्युम्नाय शुष्मिणे

दे॒वत्तं ब्रह्म गायत॥४॥

प्र। वः। शर्धाय। घृष्वये। त्वेषऽद्युम्नाय। शुष्मिणे। देवत्तम्। ब्रह्म। गायत॥४॥

पदार्थ:-(प्र) प्रीतार्थे (व:) युष्माकम् (शर्धाय) बलाय (घृष्वये) घर्षन्ति परस्परं संचूर्णयन्ति येन तस्मै (त्वेषद्युम्नाय) प्रकाशमानाय यशसे। द्युम्नं द्योततेर्यशो वान्नं वा। (निरु०५.५) (शुष्मिणे) शुष्यति बलयति येन व्यवहारेण स बहुर्विद्यते यस्मिँस्तस्मै। अत्र भूम्न्यर्थ इनिः(देवत्तम्) यद्देवेनेश्वरेण दत्तं विद्वद्भिर्वाध्यापकेन तत् (ब्रह्म) वेदम् (गायत) षड्जादि स्वरैरालपत॥४॥ ____

अन्वयः-हे विद्वांसो मनुष्या! य इमे वायव: वो युष्माकं शर्धाय घृष्वये शुष्मिणे त्वेषाम्नाय सन्ति, तन्नियोगेन देवत्तं ब्रह्म यूयं गायत॥४॥

भावार्थ:-विद्वद्भिर्मनुष्यैरीश्वरोक्तान् वेदानधीत्य वायुगुणान् विदित्वा यशस्वीनि बलकारकाणि कर्माणि नित्यमनुष्टाय सर्वेभ्यः प्राणिभ्यः सुखानि देयानीति।।४।। ___

मोक्षमूलरोक्तिः येषां गृहेषु वायवो देवता आगच्छन्ति हे कण्वा! यूयं तेषामग्रे ता देवता स्तुत। ताः कीदृश्यः सन्ति। उन्मत्ता विजयवत्यो बलवत्यश्च। अत्र। ऋ०४.१७.२ इदमत्रप्रमाणमस्तीत्यशुद्धास्तियच्चात्र मन्त्रप्रमाणं दत्तं तत्रापि तदभीष्टोऽर्थो नास्तीत्यतः॥४॥

पदार्थ:-हे विद्वान् मनुष्यो! जो ये पवन (व:) तुम लोगों के (शर्धाय) बल प्राप्त करनेवाले (घृष्वये) जिसके लिये परस्पर लड़ते-भिड़ते हैं, उस (शुष्मिणे) अत्यन्त प्रशंसित बलयुक्त व्यवहार वाले (त्वेषद्युम्नाय) प्रकाशमान यश के लिये हैं, तुम लोग उनके नियोग से (देवत्तम्) ईश्वर ने दिये वा विद्वानों ने पढ़ाये हुए (ब्रह्म) वेद को (प्रगायत) अच्छे प्रकार षड्जादि स्वरों से स्तुतिपूर्वक गाया करो॥४॥

भावार्थ:-विद्वान् मनुष्यों को चाहिये कि ईश्वर के कहे हुए वेदों को पढ़, वायु के गुणों को जान और यश वा बल के कर्मों का अनुष्ठान करके सब प्राणियों के लिये सुख देवें।।४॥

मोक्षमूलर साहिब का अर्थ:- जिन के घरों में वायु देवता आते हैं, हे बुद्धिमान् मनुष्यो! तुम उनके आगे उन देवताओं की स्तुति करो तथा देवता कैसे हैं कि उन्मत्त विजय करने वा वेग वाले। इसमेंचौथे मण्डल सत्रहवें सूक्त दूसरे मन्त्र का प्रमाण है। सो यह अशुद्ध है, क्योंकि सब जगह पवनों की स्थिति के जाने-आने वाली क्रिया होने वा उनके सामीप्य के विना वायु के गुणों की स्तुति के सम्भव होने से और वायु से भिन्न वायु का कोई देवता नहीं हैं, इससे तथा जो मन्त्र का प्रमाण दिया है, वहाँ भी उनका अभीष्ट अर्थ इनके अर्थ के साथ नहीं है।।४।___

पुनरेतेषां योगेन किं किं भवतीत्युपदिश्यते।

फिर इनके योग से क्या-क्या होता है, यह अगले मन्त्र में उपदेश किया है।।

ऋग्वेद 1.37.3

 इहेव शृण्व एषां कशा हस्तेषु यद्वान्।

नि यामचित्रम॒ञ्जते॥३॥

दुहऽईवा शृण्व। एषाम्। कशाः। हस्तेषु। यत्। वान्। नि। याम॑न्। चित्रम्। ऋञ्जते॥३॥

पदार्थः-(इहेव) यथाऽस्मिन् स्थाने स्थित्वा तथा (शृण्वे) शृणोमि। अत्र व्यत्ययेनात्मनेपदम्। (एषाम्) वायूनाम् (कशाः) चेष्टासाधनरज्जुवन्नियमप्रापिकाः क्रियाः (हस्तेषु) हस्ताद्यङ्गेषुबहुवचनादङ्गानीति ग्राह्यम्। (यत्) व्यावाहारिकं वचः (वदान्) वदेयुः (नि) नितराम् (यामन्) यान्तिप्राप्नुवन्ति सुखहेतुपदार्थान् यस्मिंस्तस्मिन् मार्गे। अत्र सुपां सुलुग्० इति डेर्लुक्। (चित्रम्) अद्भुतं कर्म (ऋञ्जते) प्रसाध्नोति। ऋञ्जतिः प्रसाधनकर्मा। (निरु०६.२१)॥३॥ ___

अन्वयः-अहं यदेषां वायूनां कशा हस्तेषु सन्ति प्राणिनो वदान् वदेयुस्तदिहेव शृण्वे सर्वः प्राण्यप्राणी यद्यामन् यामनि चित्रं कर्म न्य॒ञ्जते तदहमपि कर्तुं शक्नोमि।।३।।

भावार्थ:-अत्रोपमालङ्कारःपदार्थविद्यामभीप्सुभिर्विद्वद्भिर्यानि कर्माणि जडचेतनाः पदार्थाः कुर्वन्ति, तद्वेतवो वायवः सन्ति। यदि वायुर्न स्यात्तर्हि कश्चित् किञ्चदपि कर्म कर्तुं न शक्नुयात्दूरस्थेनोच्चारिताञ्छब्दान् समीपस्थानिव वाचेष्टामन्तरेण कश्चिदपि श्रोतुं वक्तुं च न प्रभवेत्। वीरा युद्धादिकार्येषु यावन्तो बलपराक्रमो कुर्वन्ति, तावत्तौ सर्वो वायुयोगादेव भवतः। न तेन विना नेत्रस्पन्दनमपि कर्तुं शक्यमतोऽस्य सर्वदेव शुभगुणाः सर्वैः सदान्चेष्टव्याः॥३॥

मोक्षमूलरोक्तिः। अहं सारथिना कशाशब्दाञ्च्छृणोमि। अतिनिकटे हस्तेषु तान् प्रहरन्ति ते स्वमार्गेष्वतिशोभां प्राप्नुवन्ति। यामन्निति मार्गस्य नाम येन मार्गेण देवा गच्छन्ति यस्मान् मार्गाद् बलिदानानि प्राप्नुवन्ति। यथास्माकं प्रकरणे मेघावयवानामपि ग्रहणं भवतीत्यशुद्धास्ति। कुतः? अत्र कशाशब्देन वायुहेतुकानां क्रियाणां ग्रहणाद् यामन्निति शब्देन सर्वव्यवहारसुखप्रापिकस्य कर्मणो ग्रहणाच्च॥३॥ __

पदार्थ:-मैं (यत्) जिस कारण (एषाम्) इन पवनों की (कशा:) रज्जु के समान चेष्टा के साधन नियमों को प्राप्त कराने वाली क्रिया (हस्तेषु) हस्त आदि अङ्गो में हैं, इससे सब चेष्टा और जिससे प्राणी व्यवहार सम्बन्धी वचन को (वदान्) बोलते हैं, उसको (इहेव) जैसे इस स्थान में स्थित होकर वैसे करता और (शृण्वे) श्रवण करता हूं और जिससे सब प्राणी और अप्राणी (यामन्) सुख हेतु व्यवहारों के प्राप्त कराने वाले मार्ग में (चित्रम्) आश्चर्य्यरूप कर्म को (न्यूञ्जते) निरन्तर सिद्ध करते हैं, उसके करने को समर्थ उसी से मैं भी होता हूं॥३॥ ___

भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वायु, पदार्थ-विद्या की इच्छा करने वाले विद्वानों को चाहिये कि मनुष्य आदि प्राणी जितने कर्म करते हैं, उन सभी के हेतु पवन हैं। जो वायु न हों तो कोई मनुष्य कुछ भी कर्म करने को समर्थ न हो सके और दूरस्थित मनुष्य ने उच्चारण किये हुए शब्द निकट के उच्चारण के समान, वायु की चेष्टा के विना, कोई भी कह वा सुन न सके और मनुष्य मार्ग में चलने आदि जितने बल वा पराक्रमयुक्त कर्म करते हैं, वे सब वायु ही के योग से होते हैं। इससे यह सिद्ध है कि वायु के बिना कोई नेत्र के चलाने को भी समर्थ नहीं हो सकता, इसलिये इसके शुभगुणों का खोज सर्वदा किया करें।॥३॥

___मोक्षमूलर साहिब कहते हैं कि मैं सारथियों के कशा अर्थात् चाबुक के शब्दों को सुनता हूं तथा अति समीप हाथों में उन पवनों को प्रहार करते हैं, वे अपने मार्ग में अत्यन्त शोभा को प्राप्त होते हैं और'यामन्' यह मार्ग का नाम है, जिस मार्ग से देव जाते हैं वा जिस मार्ग से बलिदानों को प्राप्त होते हैं, जैसे हम लोगों के प्रकरण में मेघ के अवयवों का भी ग्रहण होता है। यह सब अशुद्ध है, क्योंकि इस मन्त्र में 'कशा' शब्द से सब क्रिया और 'यामन्' शब्द से मार्ग में सब व्यवहार प्राप्त करने वाले कर्मों का ग्रहण है॥३॥

पुनरेते वायोः कस्मै प्रयोजनाय किं कुर्युरित्युपदिश्यते।

फिर वे विद्वान् लोग वायु से किस-किस प्रयोजन के लिये क्या-क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

ऋग्वेद 1.37.2

 ये पृषतीभिरृष्टिभिः साकं वाशीभिरञ्जिभिः

अर्जायन्त स्वानवः॥२॥

ये। पृषतीभिः। ऋष्टिऽभिः। चूकम्। वाशीभिः। अञ्जिऽभिः। अर्जायन्त। स्वऽभानवः॥२॥

पदार्थ:-(ये) मरुत इव विज्ञानशीला विद्वांसो जनाः (पृषतीभिः) पर्षन्ति सिञ्चन्ति धर्मवृक्षं याभिरद्भिः (ऋष्टिभिः) याभिः कलायन्त्रयष्टीभिर्ऋषन्ति जानन्ति प्राप्नुवन्ति व्यवहाराँस्ताभिः (साकम्) सह (वाशीभिः) वाणीभिः । वाशीति वानामसु पठितम्। (निघं०१.११) (अञ्जिभिः) अञ्जन्ति व्यक्तीकुर्वन्ति पदार्थगुणान् याभिः क्रियाभिः (अजायन्त) धर्मक्रियाप्रचाराय प्रादुर्भवन्ति। अत्र लडर्थे लङ्। (स्वभानव:) वायुवत्स्वभानवो ज्ञानदीप्तयो येषान्ते।।२॥ __

अन्वयः-ये पृषतीभिरृष्टिभिरञ्जिभिर्वाशीभिः साकं क्रियाकौशले प्रयतन्ते ते स्वभानवोऽजायन्त॥२॥

भावार्थ:-हे विद्वांसो मनुष्या! युष्माभिरीश्वररचितायां सृष्टो कार्यस्वभावप्रकाशस्य वायोः सकाशाज्जलसेचनं चेष्टाकरणमग्न्यादिप्रसिद्धिर्वायुव्यवहाराश्चात् कथनश्रवणस्पर्शा भवन्ति, तैः क्रियाविद्याधर्मादिशुभगुणाः प्रचारणीयाः।।२।

मोक्षमूलरोक्तिः। ये ते वायवो विचित्रैर्हरिणैरयोमयोभिः शक्तिभिरसिभिः प्रदीप्तैराभूषणैश्च सह जाता इत्यसम्भवोऽस्ति। कुतः? वायवो हि पृषत्यादीनां स्पर्शादिगुणानां च योगेन सर्वचेष्टाहेतुत्वेन च वागग्निप्रादुर्भावे हेतवः सन्तः स्वप्रकाशवन्तः सन्त्यतः। यच्चोक्तं सायणाचार्येण वाशीशब्दस्य व्याख्यानं समीचीनं कृतमित्यप्यलीकम्। कुतः? मन्त्रपदवाक्यार्थविरोधात्। यश्च प्रकरणपदवाक्यभावार्थानुकूलोऽस्ति सोऽयमस्य मन्त्रस्यार्थो द्रष्टव्यः॥२॥

पदार्थ:-(ये) जो (पृषतीभिः) पदार्थों को सींचने (ऋष्टिभिः) व्यवहारों को प्राप्त और (अञ्जिभिः) पदार्थों को प्रगट कराने वाली (वाशीभिः) वाणियों के (साकम्) साथ क्रियाओं के करने की चतुराई में प्रयत्न करते हैं, वे (स्वभानवः) अपने ऐश्वर्य के प्रकाश से प्रकाशित (अजायन्त) होते हैं।॥२॥

भावार्थ:-हे विद्वान् मनुष्यो! तुम लोगों को उचित है कि ईश्वर की रची हुई इस कार्य सृष्टि में जैसे अपने-अपने स्वभाव के प्रकाश करने वाले वायु के सकाश से जल की वृष्टि, चेष्टा का करना, अग्नि आदि की प्रसिद्धि और वाणी के व्यवहार अर्थात् कहना सुनना स्पर्श करना आदि सिद्ध होते हैं, वैसे ही विद्या और धर्मादि शुभगुणों का प्रचार करो॥२॥

मोक्षमूलर साहिब कहते हैं कि जो वे पवन, चित्र-विचित्र हरिण, लोह की शक्ति तथा तलवारों और प्रकाशित आभूषणों के साथ उत्पन्न हुए हैं, इति। यह व्याख्या असम्भव है, क्योंकि पवन निश्चय करके वृष्टि कराने वाली क्रिया तथा स्पर्शादि गुणों के योग और सब चेष्टा के हेतु होने से वाणी और अग्नि के प्रगट करने के हेतु हुए अपने आप प्रकाश वाले हैं और जो उन्होंने कहा है कि सायणाचार्य ने 'वाशी' शब्द का व्याख्यान यथार्थ किया है, सो भी असङ्गत है, क्योंकि वह भी मन्त्र पद और वाक्यार्थ से विरुद्ध है और जो मेरे भाष्य में प्रकरण, पद, वाक्य और भावार्थ के अनुकूल अर्थ है, उसको विद्वान् लोग स्वयं विचार लेंगे कि ठीक है वा नहीं॥२॥

पुनरेते तैः कि कुर्युरित्युपदिश्यते।

फिर वे विद्वान् लोग इन पवनों से क्या-क्या उपकार लेवें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

ऋग्वेद 1.37.1


अथास्य पञ्चदशर्चस्य सप्तत्रिंशस्य सूक्तस्य घौरः कण्व ऋषिः। मरुतो देवताः।

१,२,४,६,८,१२ गायत्री। ३,९,११,१४ निद्गायत्री५ विरागायत्री १०,१५

पिपीलिकामध्या निचूद्गायत्री। १३ पादनिघृद्गायत्री च छन्दः। षड्जः स्वरः॥

तत्रादिमे मन्त्रे विद्वद्भिर्वायुगुणैः किं किं कर्त्तव्यमित्युपदिश्यते॥

अब सैंतीसवे सूक्त का आरम्भ है और इस सूक्त भर में मोक्षमूलर आदि साहिबों का किया हुआ व्याख्यान असङ्गत है, उसमें एक-एक मन्त्र में उनकी अंसगति जाननी चाहियेइस सूक्त के प्रथम मन्त्र में विद्वानों को वायु के गुणों से क्या-क्या उपकार लेना चाहिये, इस विषय का उपदेश किया है।

क्रीळं वः शर्धा मारुतमनुर्वाणं रथे शुभ

म्कण्वा अ॒भि प्र गायत॥ १॥

क्रीळम्। वः। शर्धः। मारुतम्। अनर्वाणम्। रथे। शुभम्। कण्वाः । अभि। प्रा गायत॥ १॥

पदार्थ:-(क्रीडम्) क्रीडन्ति यस्मिँस्तत्अत्र कीड़ विहार इत्यस्माद् घञर्थे कविधानम् इति कः प्रत्ययः। (व:) युष्माकम् (शर्धः) बलम्। शर्ध इति बलनामसु पठितम्। (निघं० २.९) (मारुतम्) मरुतां समूहः। अत्र मृग्रोरुतिः। (उणा० १.९५) इति मृधातोरुतिः प्रत्ययःअनुदात्तादेरञ्। (अष्टा०४.२.४४) इत्यञ् प्रत्ययः। इदं पदं सायणाचार्येण मरुतां सम्बन्धि तस्येदम् इत्यण् व्यत्ययेनाादात्तत्वमित्यशुद्धं व्याख्यातम् (अनर्वाणम्) अविद्यामाना अर्वाणोऽश्वा यस्मिंस्तम्। अर्वेत्यश्वनामसु पठितम्। (निघ०१.१४) (रथे) रयते गच्छन्ति येन तस्मिन् विमानादियाने (शुभम्) शोभनम् (कण्वाः) मेधाविनः (अभि) आभिमुख्ये (प्र) प्रकृष्टार्थे (गायत) शब्दायत शृणुतोपदिशत च॥१॥

अन्वयः-हे कण्वा मेधाविनो विद्वांसो! यूयं यद्वोऽनर्वाणं रथे क्रीडं क्रियायां शुभमारुतं शर्धोऽस्ति, तदभिप्रगायत॥१॥

भावार्थ:-विद्वद्भिर्ये वायवः प्राणिनां चेष्टाबलवेगयानमङ्गलादिव्यवहारान् साधयन्ति, तस्मात् तद्गुणान् परीक्ष्यतेभ्यो यथायोग्यमुपकारा ग्राह्याः॥१॥

मोक्षमूलराख्येनार्वशब्देन ह्यश्वग्रहणनिषेधः कृतः सोऽशुद्ध एव भ्रममूलत्वात्। तथा पुनरर्वशब्देन सर्वत्रैवाश्वग्रहणं क्रियत इत्युक्तम्। एतदपि प्रमाणाभावादशुद्धमेव। अत्र विमानादेरनश्वस्य रथस्य विवक्षितत्वात्। अत्र कलाभिश्चालितेन वायुनाग्नेः प्रदीपनाज्जलस्य वाष्पवेगेन यानस्य गमनं कार्य्यते नहि पशवोऽश्वा गृह्यन्त इति॥१॥

पदार्थ:-हे (कण्वाः ) मेधावी विद्वान् मनुष्यो! तुम जो (व:) आप लोगों के (अनर्वाणम्) घोड़ों के योग से रहित (रथे) विमानादि यानों में (क्रीडम्) क्रीड़ा का हेतु क्रिया में (शुभम्) शोभनीय (मारुतम्) पवनों का समूह रूप (शर्धः) बल है, उसको (अभि प्रगायत) अच्छे प्रकार सुनो वा उपदेश करो॥१॥

भावार्थ:-सायणाचार्य ने (मारुतम्) इस पद को पवनों का सम्बन्धि (तस्येदम्) इस सूत्र से अण् प्रत्यय और व्यत्यय से आधुदात्त स्वर अशुद्ध व्याख्यान किया है। बुद्धिमान् पुरुषों को चाहिये कि जो पवन प्राणियों के चेष्टा, बल, वेग, यान और मङ्गल आदि व्यवहारों को सिद्ध करते, इससे इनके गुणों की परीक्षा करके इन पवनों से यथायोग्य उपकार ग्रहण करें।।१।

मोक्षमूलर साहिब ने 'अर्व' शब्द से अश्व के ग्रहण का निषेध किया है, सो भ्रममूलक होने से अशुद्ध ही है और फिर अर्व शब्द से सब जगह अश्व का ग्रहण किया है, यह भी प्रमाण के न होने से अशुद्ध ही है। इस मन्त्र में अश्वरहित विमान आदि रथ की विवक्षा होने से यानों में कलाओं से चलाये हुए पवन तथा अग्नि के प्रकाश और जल की भाफ के वेग से यानों के गमन का सम्भव है, इससे यहाँ कुछ पशुरूप अश्व नहीं लिये हैं।।१।

पुनस्तैः कथं भवितव्यमित्युपदिश्यते।।

फिर वे विद्वान् कैसे होने चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

ऋग्वेद 1.36.18

 नि त्वामग्ने मर्नुर्दधे ज्योति॒र्जनाय शवते।

दीदेय कण्व ऋतात उक्षितो यं नमस्यन्ति कृष्टयः॥१९॥

नि। त्वाम्। अग्ने। मनुः। दधे। ज्योतिः। जाय। शश्वते। दीदे। कण्वे। ऋतऽजातः। उक्षितः। यम्। नमस्यन्ति। कृष्टयः॥ १९॥

पदार्थ:-(नि) नितराम् (त्वाम्) सर्वसुखप्रदम्। अत्र स्वरव्यत्ययादुदात्तत्वम्। सायणाचार्येणेदं भ्रमान्न बुद्धम्। (अग्ने) तेजस्विन् (मनुः) विज्ञानन्यायेन सर्वस्याः प्रजायाः पालक: (दधे) स्वात्मनि धरे (ज्योतिः) स्वयं प्रकाशकत्वेन ज्ञानप्रकाशकम् (जनाय) जीवस्य रक्षणाय (शश्वते) स्वरूपेणानादिने (दीदेथ) प्रकाशयेथ। शबभावः। (कण्वे) मेधाविनि जने (ऋतजातः) ऋतेन सत्याचरणेन जात: प्रसिद्धः (उक्षितः) आनन्दैः सिक्तः (यम्) परमात्मानम् (नमस्यन्ति) पूजयन्ति। नमसः पूजायाम्। (अष्टा०३.१.१९) (कृष्टयः) मनुष्याःकृष्टय इति मनुष्यनामसु पठितम्। (निघ०२.३)।।१९।। __

अन्वयः-हे अग्ने जगदीश्वर ! यं परमात्मानं त्वां शश्वते जनाय कृष्टयो नमस्यन्ति। हे विद्वांसो! यूयं दीदेथ तज्ज्योतिस्स्वरूपं ब्रह्म ऋतजात उक्षितो मनुरहं कण्वे निदधे, तमेव सर्वे मनुष्या उपासीरन्॥१९॥

भावार्थ:- पूज्यस्य परमात्मनः कृपया प्रजारक्षणाय राज्याधिकारे नियोजितैः मनुष्यैः सर्वैः सत्यव्यवहारप्रसिद्ध्या धार्मिका आनन्दितव्या दुष्टाश्च ताड्या बुद्धिमत्सु मनुष्येषु विद्या निधातव्याः॥१९॥

पदार्थ:-हे (अग्ने) परमात्मन्! (यम्) जिस परमात्मा (त्वाम्) आप को (शश्वते) अनादि स्वरूप (जनाय) जीवों की रक्षा के लिये (कृष्टयः) सब विद्वान् मनुष्य (नमस्यन्ति) पूजा और हे विद्वान् लोगो! जिसको आप (दिदेथ) प्रकाशित करते हैं, उस (ज्योतिः) ज्ञान के प्रकाश करने वाले परब्रह्म को (ऋतजातः) सत्याचरण से प्रसिद्ध (उक्षितः) आनन्दित (मनुः) विज्ञानयुक्त मैं (कण्वे) बुद्धिमान् मनुष्य में (निदधे) स्थापित करता हूं, उसकी सब मनुष्य लोग उपासना करें।।१९॥

भावार्थ:-सब के पूजने योग्य परमात्मा के कृपाकटाक्ष से प्रजा की रक्षा के लिये राज्य के अधिकारी सब मनुष्यों को योग्य है कि सत्यव्यवहार की प्रसिद्धि से धर्मात्माओं को आनन्द और दुष्टों को ताड़ना देवें।। १९॥

अथ तं सभेशं प्रति कि किमुपदिशेदित्याह॥

अब उस सभापति के प्रति क्या-क्या उपदेश करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया

ऋग्वेद 1.36.17

 अ॒ग्निर्वत्ने सुवीर्यम॒ग्निः कण्ाय सौभंगम्।

अ॒ग्निः प्रावमित्रोत मेध्यातिथिम॒ग्निः साता उपस्तुतम्॥१७॥

अग्निः। वन्ने। सुऽवीर्यम्। अग्निः। कण्वायः। सौभगम्। अग्निः। प्रा आवत्। मित्रा। उत। मेध्यंऽअतिथिम्। अग्निः। सातौ। उपऽस्तुतम्॥ १७॥

पदार्थ:-(अग्निः) विद्युदिव सभाध्यक्षो राजा (वने) याचते। वनु याचन इत्यस्माल्लडर्थे लिट्, वन सम्भक्तावित्यस्माद् वा छन्दसो वर्णलोपो वा इत्यनेनोपधालोपः। (सुवीर्यम्) शोभनं शरीरात्मपराक्रमलक्षणं बलम् (अग्निः) उत्तमैश्वर्यप्रदः (कण्वाय) धर्मात्मने मेधाविने शिल्पिने (सौभगम्) शोभना भगा ऐश्वर्ययोगा यस्य तस्य भावस्तम् (अग्निः) सर्वमित्रः (प्र) प्रकृष्टार्थे (आवत्) रक्षति प्रीणाति (मित्रा) मित्राणि। अत्र शेर्लोपः। (उत) अपि (मेध्यातिथिम्) मेध्याः सङ्गमनीयाः पवित्रा अतिथयो यस्य तम् (अग्निः) सर्वाभिरक्षकः (सातौ) सम्भजन्ते धनानि यस्मिन् युद्धे शिल्पकर्मणि वा तस्मिन् (उपस्तुतम्) य उपगतैर्गुणैः स्तूयते तम्॥१७॥ __

अन्वयः-यो विद्वान् राजाग्निरिव सातौ संग्रामे उपस्तुतं सुवीर्यमग्निरिव कण्वाय सौभगं वनेऽग्निरिव मित्राः सुहृदः प्रावदग्निरिवोताग्निरिव मेध्यातिथिं च सेवेत, स एव राजा भवितुमर्हेत।।१७।।

भावार्थ:-अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथायं भौतिकोऽग्निर्विद्वद्भिः सुसेवितः सन् तेभ्यो बलपराक्रमान् सौभाग्यं च प्रदाय शिल्पविद्याप्रवीणं तन्मित्राणि च सर्वदा रक्षति। तथैव प्रजासेनास्थैर्भद्रपुरुषैर्याचितोऽयं सभाध्यक्षो राजा तेभ्यो बलपराक्रमोत्साहानैश्वर्य्यशक्ति च दत्त्वा युद्धं विद्याप्रवीणान् तन्मित्राणि च सर्वथा पालयेत्॥१७॥

पदार्थ:-जो विद्वान् (अग्नि) भौतिक अग्नि के समान (सातौ) युद्ध में (उपस्तुतम्) उपगत स्तुति के योग्य (सुवीर्यम्) अच्छे प्रकार शरीर और आत्मा के बल पराक्रम (अग्निः) विद्युत् के सदृश (कण्वाय) उसी बुद्धिमान् के लिये (सौभगम्) अच्छे ऐश्वर्य को (वने) किसी ने याचित किया हुआ देता है (अग्निः) पावक के तुल्य (मित्रा) मित्रों को (आवत्) पालन करता (उत) और (अग्निः) जाठराग्निवत् (उपस्तुतम्) शुभ गुणों से स्तुति करने योग्य (मेध्यातिथिम्) कारीगर विद्वान् को सेवे, वही पुरुष राजा होने को योग्य होता है।।१७।___

भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे यह भौतिक अग्नि विद्वानों का ग्रहण किया हुआ, उनके लिये बल पराक्रम और सौभाग्य को देकर, शिल्पविद्या में प्रवीण और उसके मित्रों की सदा रक्षा करता है, वैसे ही प्रजा और सेना के भद्रपुरुषों से प्रार्थना किया हुआ यह सभाध्यक्ष राजा उनके लिये बल, पराक्रम, उत्साह और ऐश्वर्य का सामर्थ्य देकर युद्धविद्या में प्रवीण और उनके मित्रों को सब प्रकार पाले।।१७॥ __

सर्वे मनुष्याः सभाध्यक्षेण सह दुष्टान् कथं हन्युरित्युपदिश्यते।।

सब मनुष्य सभाध्यक्ष से मिल के दुष्टों को कैसे मारें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया 

ऋग्वेद 1.36.16

 घनेव विष्व॒ग्वि जह्यरागस्तपुर्जम्भ यो अस्मनुक्।

यो मर्त्यः शिशीत अत्य॒क्तुभिर्मा नः स रिपुरीशत॥१६॥

घनाऽईवा विष्वक्। वि। जहि। अराव्णः। तपुःऽजम्भा यः। अस्मऽधुक्। यः। मर्त्यः। शिशीत। अति। अक्तुऽभिः। मा। नः। सः। रिपुः। ईशत॥ १६॥

पदार्थ:-(घनेव) घनाभिर्यष्टिभिर्यथा घटं भिनत्ति तथा (विष्वक्) सर्वत: (वि) विगतार्थे (जहि) नाशय (अराव्णः) उक्तशत्रून् (तपुर्जम्भ) तप सन्ताप इत्यस्मादौणादिक उसिन् प्रत्ययः, सन्ताप्यन्ते शत्रवो यैस्तानि तषि। जभि नाशन इत्यस्मात् करणे घञ्, जभ्यन्त एभिरिति जम्भान्यायुधानि तपूंष्येव जम्भानि यस्य भवतस्तत्सम्बुद्धौ (यः) मनुष्यः (अस्मधुक्) अस्मान् द्रुह्यति यः सः (यः) (मर्त्यः) मनुष्यः (शिशीते) कृशं करोति। शो तनूकरण इत्यस्माल्लटि विकरणव्यत्ययेन श्यनः स्थाने श्लुरात्मनेपदं बहुलं छन्दसि इत्यभ्यासस्येत्वम्। ई हल्यघोः। (अष्टा०६.४.११३) इत्यनभ्यासस्येकारादेशश्च। (अति) अतिशये (अक्तुभिः) अञ्जन्ति मृत्युं नयन्ति यैस्तैः शस्त्रैः। अञ्जू धातोर्बाहुलकादौणादिकस्तुः प्रत्ययः (मा) निषेधार्थे (न:) अस्मान् (सः) (रिपुः) शत्रुः (ईशतम्) ईष्टां समर्थो भवतु। अत्र लोडर्थे लङ्, बहुलं छन्दसि इति शपो लुक्।।१६।।

अन्वयः-हे तपुर्जाम्भ सेनापते! विष्वक् त्वमराव्णोऽरीन् घनेन विजहि यो मोऽक्तुभिरस्मधुगतिशिशीते स रिपु!ऽस्मान् मेशत।।१६॥

भावार्थ:-अत्रोपमालङ्कारः। सेनापत्यादयो यथा घनेनायः पाषाणादीस्त्रोटयन्ति, तथैव शत्रूणामङ्गानि त्रोटयित्वाऽहर्निशं धार्मिकप्रजापालनतत्पराः स्युर्यतोऽरय एते दुःखयितुन्नो शक्नुयुरिति१६॥

पदार्थ:-हे (तपुर्जाम्भ) शत्रुओं को सताने और नाश करने के शस्त्र बांधने वाले सेनापते! (विष्वक्) सर्वथा सेनादि बलों से युक्त होके आप (अराव्णः) सुखदानरहित शत्रुओं को (घनेव) घन के समान (विजहि) विशेष करके जीत और (यः) जो (मर्त्यः) मनुष्य (अक्तुभिः) रात्रियों से (अस्मधुक्) हमारा द्रोही (अतिशिशीते) अति हिंसा करता हो (सः) सो (रिपुः) वैरी (नः) हम लोगों को पीड़ा देने में (मा) मत (ईशत) समर्थ होवे।।१६।

भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमा अलङ्कार है। सेनाध्यक्षादि लोग जैसे लोहा के घन से लोहे पाषाणादिकों को तोड़ते हैं, वैसे ही अधर्मी दुष्ट शत्रुओं के अङ्गों को छिन्न-भिन्न कर दिन-रात धर्मात्मा प्रजाजनों के पालन में तत्पर हों, जिससे शत्रुजन इन प्रजाओं को दुःख देने को समर्थ न हो सकें।॥१६॥

पुनस्तेषां गुणा अग्नि दृष्टान्तेनोपदिश्यते॥

फिर भी इन सभाध्यक्षादि राजपुरुषों के गुण अग्नि के दृष्टान्त से अगले मन्त्र में कहे हैं।

ऋग्वेद 1.36.15

 पाहि नौ अग्ने रक्षसः पाहि धूर्तेरराव्णः।

पाहि रीषत उत वा जिघांसतो बृहद्भानो यविष्ठ्य॥१५॥१०॥

पाहि। नः। अग्ने। रक्षसः। पाहि। धूर्तेः। अराव्णः। पाहि। रिपतः। उता वा। जिघांसतः। बृहद्भानो इति बृहत्ऽभानो। यविष्ठ्य॥ १५॥

पदार्थ:-(पाहि) रक्ष (न:) अस्मान् (अग्ने) सर्वाग्रणी: सर्वाभिरक्षक (रक्षसः) महादुष्टान्मनुष्यात् (पाहि) (धूर्तेः) विश्वासघातिनः। अत्र धुर्वी धातोर्बाहुलकादाणौदिकस्तिः प्रत्ययः। (अराव्णः) राति ददाति स रावा न अरावा रावा तस्मात्कृपणाददानशीलात्। (पाहि) रक्ष (रिषतः) हिंसकाद् व्याघ्रादे: प्राणिनः। अत्रान्येषामपि दृश्यत इति दीर्घः। (उत) अपि (वा) पक्षान्तरे (जिघांसतः) हन्तुमिच्छतः शत्रोः (बृहद्भानो) बृहन्ति भानवो विद्याद्यैश्वर्यतेजांसि यस्य तत्सम्बुद्धौ (यविष्ठ्य) अतितरुणावस्थायुक्त॥१५॥

अन्वयः-हे बृहद्भानो यविष्टयाग्ने सभाध्यक्ष महाराज! त्वं धूर्तेरराव्यणो रक्षसो नः पाहि। रिषतः पापाचाराज्जनात् पाहि। उत वा जिघांसत: पाहि।।१५।।

भावार्थ:-मनुष्यैः सर्वतोभिरक्षणाय सर्वाभिरक्षको धर्मोन्नतिं चिकीर्षुदयालुः सभाध्यक्षः सदा प्रार्थनीयःस्वैरपि दुष्टस्वभावेभ्यो मनुष्यादिप्राणिभ्यः सर्वपापेभ्यश्च शरीरवचोमनोभिर्दूरे स्थातव्यं नैवं विना कश्चित्सदा सुखी भवितुमर्हति।।१५।___

पदार्थ:-हे (बृहद्भानो) बड़े-बड़े विद्यादि ऐश्वर्या के तेजवाले (यविष्ठ्य) अत्यन्त तरुणावस्थायुक्त (अग्ने) सब से मुख्य सब की रक्षा करने वाले मुख्य सभाध्यक्ष महाराज! आप (धूर्तेः) कपटी, अधर्मी (अराव्णः) दानधर्मरहित कृपण (रक्षसः) महाहिंसक दुष्ट मनुष्य से (नः) हमको (पाहि) बचाइये (रिषतः) सबको दुःख देने वाले सिंह आदि दुष्ट जीव दुष्टाचारी मनुष्य से हम को पृथक् रखिये (उत) और (वा) भी (जिघांसतः) मारने की इच्छा करते हुए शत्रु से हमारी रक्षा कीजिये।।१५॥ ___

भावार्थ:-सब मनुष्यों को चाहिये कि सब प्रकार रक्षा के लिये सर्वरक्षक धर्मोन्नति की इच्छा करने वाले सभाध्यक्ष की सर्वदा प्रार्थना करें और अपने आप भी दुष्ट स्वभाव वाले मनुष्य आदि प्राणियों और सब पापों से मन वाणी और शरीर से दूर रहें, क्योंकि इस प्रकार रहने के विना कोई मनुष्य सर्वदा सुखी नहीं रह सकता।१५॥

पुनस्तदेवाह॥

फिर भी अगले मन्त्र में उसी सभाध्यक्ष का उपदेश किया है।

ऋग्वेद 1.36.14

 ो नः पाहो नि केतुना विश्वं समत्रिणं दह।

कृधी न ऊर्ध्वाञ्चराय जीवसे विदा देवेषु नो दुवः॥१४॥

ऊर्ध्वः। नः। पहि। अंहसः। नि। केतुना। विश्वम्। सम्। अत्रिणम्। दह। कृधि। नः। ऊर्ध्वान्। चराय। जीवसे। विदाः। देवेषु। नः। दुवः॥१४॥

पदार्थ:-(अर्वः) सर्वोत्कृष्टः (नः) अस्मान् (पाहि) रक्ष (अंहसः) परपदार्थहरणरूपपापात्। अमेर्लक् च। (उणा०४.२१३)इत्यसुन् प्रत्ययो हुगागमश्च(नि) नितराम् (केतुना) प्रकृष्टज्ञानदानेन केतुरिति प्रज्ञानामसु पठितम्। (निघ०३.९) (विश्वम्) सर्वम् (सम्) सम्यगर्थे (अत्रिणम्) अत्ति भक्षयत्यन्यायेन परपदार्थान् यः स शत्रुस्तम् (दह) भस्मी (कृधि) कुरु। अत्रान्येषामपीति संहितायां दीर्घः । (नः) अस्मान् (अर्ध्वान्) उत्कृष्टगुणसुखसहितान् (चरथाय) चरणाय (जीवसे) जीवितुम्। जीव धातोस्तुमर्थेऽसे प्रत्ययः (विदाः) लम्भय। अत्र लोडर्थे लेट। (देवेषु) विद्वत्स्वृतुषु वा। ऋतवो वै देवाः(शत०७.२.४.२६; तै०सं०५.४.११.४) (न:) अस्माकमस्मभ्यं वा (दुवः) परिचर्याम्॥१४॥ __

अन्वयः-हे सभापते! त्वं केतुना प्रज्ञादानेन नोंऽहसो निपाहि विश्वमत्रिणं शत्रु सन्दह ऊर्ध्वस्त्वं चरथाय न ऊर्ध्वान् कृधि देवेषु जीवसे नो दुवो विदाः॥१४॥

भावार्थ:-उत्कृष्टगुणस्वभावेन सभाध्यक्षेण राज्ञा राज्यनियमदण्डभयेन सर्वमनुष्यान् पापात् पृथक्कृत्य सर्वान् शत्रून् दग्ध्वा विदुषः परिषेव्य ज्ञानसुखजीवनवर्द्धनाय सर्वे प्राणिन उत्कृष्टगुणाः सदा सम्पादनीयाः॥१४॥

पदार्थ:-हे सभापते! आप (केतुना) बुद्धि के दान से (न:) हम लोगों को (अंहसः) दूसरे का पदार्थ हरणरूप पाप से (निपाहि) निरन्तर रक्षा कीजिये (विश्वम्) सब (अत्रिणम्) अन्याय से दूसरे के पदार्थों को खाने वाले शत्रुमात्र को (संदह) अच्छे प्रकार जलाइये और (अर्ध्वः) सब से उत्कृष्ट आप (चरथाय) ज्ञान और सुख की प्राप्ति के लिये (नः) हम लोगों को (ऊर्ध्वान्) बड़े-बड़े गुण कर्म और स्वभाव वाले (कृधि) कीजिये तथा (न:) हमको (देवेषु) धार्मिक विद्वानों में (जीवसे) सम्पूर्ण अवस्था होने के लिये (दुवः) सेवा को (विदाः) प्राप्त कीजिये।।१४।

भावार्थ:-अच्छे गुण, कर्म और स्वभाव वाले सभाध्यक्ष राजा को चाहिये कि राज्य की रक्षा नीति और दण्ड के भय से सब मनुष्यों को पाप से हटा सब शत्रुओं को मार और विद्वानों की सब प्रकार सेवा करके प्रजा में ज्ञान, सुख और अवस्था बढ़ाने के लिये सब प्राणियों को शुभगुणयुक्त सदा किया करें।।१४॥

पुनः तं प्रति प्रजासेनाजनाः किङ्किप्रार्थयेयुरित्युपदिश्यते।।

फिर उस सभाध्यक्ष राजा से प्रजा और सेना के जन क्या-क्या प्रार्थना करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है


ऋग्वेद 1.36.13

 ऊर्ध्व ऊ षु ण ऊतये तिष्ठा देवो न सविता»

 ऊर्ध्वः वाजस्य सनिता यञ्जिभिर्वाघद्भिर्विह्वया॑महे॥१३॥

ऊर्ध्वः। ऊँ इति। सु। नः। ऊतये। तिष्ठ। देवः। न। सविताऊर्ध्वः। वाजस्य। सनिता। यत्। अञ्जिऽभिःवाघऽभिः। विऽह्वयामहे॥ १३॥

पदार्थः-(ऊर्ध्वः) उच्चासने (ॐ) च (सु) शोभने। अत्र सोरुपसर्गस्यग्रहणं न किन्तु सुञो निपातस्य तेन इकः सुञिा (अष्टा०६.३.१३४) इति संहितायामुकारस्य दीर्घः। सुञः(अष्टा०८.३.१०७) इति मूर्धन्यादेशश्च। (न:) अस्माकम्। नश्च धातुस्थोरुषभ्यः। (अष्टा०८.४.२६) इति णत्वम्। (ऊतये) रक्षणाद्याय (तिष्ठ) अत्र व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घश्च। (देवः) द्योतकः (न) इव (सविता) सूर्यलोकः (अर्ध्व:) उन्नतस्सन् (वाजस्य) संग्रामस्य (सनिता) सम्भक्ता सेवकः (यत्) यस्मात् (अञ्जिभिः) अञ्जसाधनानि प्रकटयद्भिः। सर्वधातुभ्य इन्। (उणा०४.१२३) इति कर्तरीन् प्रत्ययः। (वाघद्भिः) विद्वद्भिर्मेधाविभिःवाघत इति मेधाविनामसु पठितम्। (निघं०३.१५) (विह्वयामहे) विविधैः शब्दैः स्तुमः॥१३॥

अन्वयः-हे सभापते! त्वं सविता देवो नेव नोऽस्माकमूतय ऊर्ध्वः सुतिष्ठ। ऊ चोर्ध्वः सन् वाजस्य सनिता भव, अतो वयमञ्जिभिघिद्भिस्सह त्वां विह्वयामहे॥१३॥

भावार्थ:-सूर्य्यवदुत्कष्टतेजसा सभापतिना संग्रामसेवने न दुष्टशत्रून्निवार्य सर्वेषां प्राणिनामूतये यज्ञसाधकैर्विद्वद्भिः सहात्युच्चासने स्थातव्यम्।।१३॥ ___

पदार्थ:-हे सभापते! आप (देवः) सबको प्रकाशित करनेहारे (सविता) सूर्य्यलोक के (न) समान (न:) हम लोगों की रक्षा आदि के लिये (ऊर्ध्वः) ऊंचे आसन पर (सुतिष्ठ) सुशोभित हूजिये (ॐ) और (ऊर्ध्वः) उन्नति को प्राप्त हुए (वाजस्य) युद्ध के (सविता) सेवने वाले हूजिये, इसलिये हम लोग (अञ्जिभिः) यज्ञ के साधनों को प्रसिद्ध करने तथा (वाघद्भिः) सब ऋतुओं में यज्ञ करने वाले विद्वानों के साथ (विह्वयामहे) विविध प्रकार के शब्दों से आप की स्तुति करते हैं।।१३।। ___

भावार्थ:-सूर्य के समान अति तेजस्वी सभापति को चाहिये कि संग्राम सेवन से दुष्ट शत्रुओं को हटा के सब प्राणियों की रक्षा के लिये प्रसिद्ध विद्वानों के साथ सभा में बीच में ऊंचे आसन पर बैठे।। १३॥

पुन: स कीदृश इत्याह॥

फिर वह सभापति कैसा होवे, यह अगले मन्त्र में कहा है।।

ऋग्वेद 1.36.12

 रायस्प॑र्धि स्वावोऽस्ति हि तेऽग्नै दे॒वेष्वायम्।

त्वं वाज॑स्य॒ श्रुत्य॑स्य राजसि स नों मूळ महाँ असि॥१२॥

रायः। पूर्धि। स्वधाऽवः। अस्ति। हि। ते। अग्ने। देवेषु। आप्यम्। त्वम्। वाजस्य। श्रुत्य॑स्य। राजसि। सः। नः। मृळ। महान्। असि॥ १२॥

पदार्थ:-(रायः) विद्यासुवर्णचक्रवर्त्तिराज्यादिधनानि (पूर्धि) पिपूर्धि। अत्र बहुलं छन्दसि (अष्टा० २.४.७३) इति शपो लुक्। श्रुशृणुपृ० (अष्टा०६.४.१०२) इति हेधिः। (स्वधावः) स्वधा भोक्तव्या अन्नादिपदार्थाः सन्ति यस्य तत्सम्बुद्धौ (अस्ति) (हि) यतः (ते) तव (अग्ने) अग्निवत्तेजस्विन् (देवेषु) विद्वत्सु (आप्यम्) आप्तुं प्राप्तुं योग्यं सखित्वम्। अत्र आप्लू व्याप्तावित्यस्मादौणादिको यत्। सायणाचार्येण प्रमादाददुपधत्वाभावेऽपि पोरदुपधात् इति कर्मणि यत्। यतो नाव (अष्टा०६.१.२१०) इत्यायुदात्तत्वम् यच्च छान्दसमायुदात्तत्वमित्यशुद्धमुक्तम्। औणादिकस्य यत्प्रत्ययस्य विद्यमानत्वात् (त्वम्) पुत्रवत्प्रजापालकः (वाजस्य) युद्धस्य (श्रुत्यस्य) श्रोतुं योग्यस्य। श्रु श्रवण इत्यस्मादौणादिक: कर्माणि क्यप् प्रत्ययः। (राजसि) प्रकाशितो भवसि (स:) (न:) अस्मान् (मृड) सुखय (महान्) बृहद् गुणाढ्य: (असि) वर्त्तसे॥१२॥

अन्वयः-हे स्वधावोऽग्ने! हि यतस्ते देवेष्वाप्यमस्ति रायस्पूर्धि। यस्त्वं महानसि श्रुत्यस्य वाजस्य च मध्ये राजसि, स त्वं नोऽस्मान् मृड सुखयुक्तान् कुरु।।१२॥

भावार्थ:-वेदवित्सु विद्यावृद्धिषु मैत्री भावयद्भिः सभाध्यक्षादिराजपुरुषैरन्नधनादिपदार्थागारान् सततं प्रपूर्य प्रसिद्धेर्दस्युभिस्सह युद्धाय समर्था भूत्वा प्रजायै महान्ति सुखानि दातव्यानि॥१२॥ ___

पदार्थ:-हे (स्वधावः) भोगने योग्य अन्नादि पदार्थों से युक्त (अग्ने) अग्नि के समान तेजस्वी सभाध्यक्ष! (हि) जिस कारण (ते) आपकी (देवेषु) विद्वानों के बीच में (आप्यम्) ग्रहण करने योग्य मित्रता (अस्ति) है, इसलिये आप (रायः) विद्या, सुवर्ण और चक्रवर्त्ति राज्यादि धनों को (पूर्धि) पूर्ण कीजिये जो आप (महान्) बड़े-बड़े गुणों से युक्त (असि) हैं और (श्रुत्यस्य) सुनने के योग्य (वाजस्य) युद्ध के बीच में प्रकाशित होते हैं (सः) सो (त्वम्) पुत्र के तुल्य प्रजा की रक्षा करनेहारे आप (न:) हम लोगों को (मृड) सुखयुक्त कीजिये।।१२।___

भावार्थ:-वेदों को जानने वाले उत्तम विद्वानों में मित्रता रखते हुए सभाध्यक्षादि राजपुरुषों को उचित है कि अन्न, धन आदि पदार्थों के कोशों को निरन्तर भर और प्रसिद्ध डाकुओं के साथ निरन्तर युद्ध करने को समर्थ होके प्रजा के लिये बड़े-बड़े सुख देने वाले होवें।॥१२॥

पुन: स कथंभूत इत्युपदिश्यते॥

फिर वह सभाध्यक्ष कैसा होता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।


ऋग्वेद 1.36.11

 यमग्नि मेध्यातिथिः कण्व ईध ऋतादधि।

तस्य॒ प्रेषौ दीदियुस्तममा ऋचुस्तम॒ग्नि वर्धयामसि॥११॥

यम्। अग्निम्। मेध्यंऽअतिथिः। कण्वः। ईधे। तात्। अधि। तस्य। प्रा इषः। दीदियुः। तम्। इमाः। ऋचः। तम्। अग्निम्वर्धयामसि॥ ११॥

पदार्थ:-(यम्) (अग्निम्) दाहगुणविशिष्टं सर्वपदार्थछेदकं च (मेध्यातिथिः) पवित्रः पूजकैः शिष्यवगैर्युक्तो विद्वान् (कण्व:) विद्याक्रियाकुशलः (ईधे) दीपयति। अत्र लडथै लिट्। इजादेश्च गुरुमतोऽनृच्छः। (अष्टा०३.१.३६) इति ‘अमन्त्रे' इति प्रतिषेधाद् ‘आम्' निषेधः। इन्धिभवतिभ्यां लिट च। (अष्टा० १.२.६) इति लिट: कित्त्वाद् अनिदिताम्० (अष्टा०६.४.२४) इति नलोपो गुणाभावश्च। (ऋतात्) मेघमण्डलादुपरिष्टादुदकात् (अधि) उपरिभावे (तस्य) अग्नेः (प्र) प्रकृष्टार्थे (इषः) प्रापिका दीप्तयो रश्मयः (दीदियुः) दीयन्ते। दीदयतीति ज्वलतिकर्मसु पठितम्। (निघं०१.१६) दीङ् क्षय इत्यस्माद् व्यत्ययेन परस्मैपदमभ्यासस्य ह्रस्वत्वे वाच्छन्दसि सर्वे विधयो भवन्ति इत्यनभ्यासस्य ह्रस्वः । सायणाचार्येणेदं पदमन्यथा व्याख्यातम्। (तम्) यज्ञस्य मुख्यं साधनम् (इमाः) प्रत्यक्षाः (ऋचः) वेदमन्त्राः विद्युदाख्यम् (अग्निम्) सर्वत्र व्यापकम् (वर्धयामसि) वर्धयामः।।११।।

अन्वयः-मेध्यातिथि: कण्व ऋतादधि यमग्निमीधे तस्येषो प्रदीदियुरिमा ऋचस्तं वर्णयन्ति तमेवाग्निं राजपुरुषा वयं शिल्पक्रियासिद्धये वर्धयामसि॥११॥

भावार्थ:-सभाध्यक्षादिराजपुरुषैर्होत्रादयो विद्वांसो वायवृष्टिशुद्धयर्थं हवनाय यमग्निं दीपयन्ति, यस्य रश्मय ऊर्ध्वं प्रकाशन्ते, यस्य गुणान् वेदमन्त्रा वदन्ति, स राजव्यवहारसाधकशिल्पक्रियासिद्धय एव वर्द्धनीयः॥११॥

पदार्थ:-(मेध्यातिथि:) पवित्र सेवक शिष्यवर्गों से युक्त (कण्वः) विद्यासिद्ध कर्मकाण्ड में कुशल विद्वान् (ऋतादधि) मेघमण्डल के ऊपर से सामर्थ्य होने के लिये (यम्) जिस (अग्निम्) दाहयुक्त सब पदार्थों के काटने वाले अग्नि को (ईधे) प्रदीप्त करता है (तस्य) उस अग्नि के (इषः) घृतादि पदार्थों को मेघमण्डल में प्राप्त करने वाले किरण (प्र) अत्यन्त (दीदियुः) प्रज्वलित होते हैं और (इमाः) ये (ऋचः) वेद के मन्त्र (तम्) जिस अग्नि के गुणों का प्रकाश करते हैं (तम्) उसी (अग्निम्) अग्नि को सभाध्यक्षादि राजपुरुष हम लोग शिल्प क्रियासिद्धि के लिये (वर्धयामसि) बढ़ाते हैं।॥११॥

भावार्थ:-सभाध्यक्षादि राजपुरुषों को चाहिये कि होता आदि विद्वान् लोग वायु वृष्टि के शोधक हवन के लिये जिस अग्नि को प्रकाशित करते हैं, जिसके किरण ऊपर को प्रकाशित होते और जिसके गुणों को वेदमन्त्र कहते हैं, उसी अग्नि को राज्य साधक क्रियासिद्धि के लिये बढ़ावें।।११।___

पुनश्च तेषामेव राजपुरुषाणां गुणा उपदिश्यन्ते।। __

फिर भी अगले मन्त्र में उन्हीं राजपुरुषों के गुणों का उपदेश किया है।

ऋग्वेद 1.36.10

 यमग्नि मेध्यातिथिः कण्व ईध ऋतादधि।

तस्य॒ प्रेषौ दीदियुस्तममा ऋचुस्तम॒ग्नि वर्धयामसि॥११॥

यम्। अग्निम्। मेध्यंऽअतिथिः। कण्वः। ईधे। तात्। अधि। तस्य। प्रा इषः। दीदियुः। तम्। इमाः। ऋचः। तम्। अग्निम्वर्धयामसि॥ ११॥

पदार्थ:-(यम्) (अग्निम्) दाहगुणविशिष्टं सर्वपदार्थछेदकं च (मेध्यातिथिः) पवित्रः पूजकैः शिष्यवगैर्युक्तो विद्वान् (कण्व:) विद्याक्रियाकुशलः (ईधे) दीपयति। अत्र लडथै लिट्। इजादेश्च गुरुमतोऽनृच्छः। (अष्टा०३.१.३६) इति ‘अमन्त्रे' इति प्रतिषेधाद् ‘आम्' निषेधः। इन्धिभवतिभ्यां लिट च। (अष्टा० १.२.६) इति लिट: कित्त्वाद् अनिदिताम्० (अष्टा०६.४.२४) इति नलोपो गुणाभावश्च। (ऋतात्) मेघमण्डलादुपरिष्टादुदकात् (अधि) उपरिभावे (तस्य) अग्नेः (प्र) प्रकृष्टार्थे (इषः) प्रापिका दीप्तयो रश्मयः (दीदियुः) दीयन्ते। दीदयतीति ज्वलतिकर्मसु पठितम्। (निघं०१.१६) दीङ् क्षय इत्यस्माद् व्यत्ययेन परस्मैपदमभ्यासस्य ह्रस्वत्वे वाच्छन्दसि सर्वे विधयो भवन्ति इत्यनभ्यासस्य ह्रस्वः । सायणाचार्येणेदं पदमन्यथा व्याख्यातम्। (तम्) यज्ञस्य मुख्यं साधनम् (इमाः) प्रत्यक्षाः (ऋचः) वेदमन्त्राः विद्युदाख्यम् (अग्निम्) सर्वत्र व्यापकम् (वर्धयामसि) वर्धयामः।।११।।

अन्वयः-मेध्यातिथि: कण्व ऋतादधि यमग्निमीधे तस्येषो प्रदीदियुरिमा ऋचस्तं वर्णयन्ति तमेवाग्निं राजपुरुषा वयं शिल्पक्रियासिद्धये वर्धयामसि॥११॥

भावार्थ:-सभाध्यक्षादिराजपुरुषैर्होत्रादयो विद्वांसो वायवृष्टिशुद्धयर्थं हवनाय यमग्निं दीपयन्ति, यस्य रश्मय ऊर्ध्वं प्रकाशन्ते, यस्य गुणान् वेदमन्त्रा वदन्ति, स राजव्यवहारसाधकशिल्पक्रियासिद्धय एव वर्द्धनीयः॥११॥

पदार्थ:-(मेध्यातिथि:) पवित्र सेवक शिष्यवर्गों से युक्त (कण्वः) विद्यासिद्ध कर्मकाण्ड में कुशल विद्वान् (ऋतादधि) मेघमण्डल के ऊपर से सामर्थ्य होने के लिये (यम्) जिस (अग्निम्) दाहयुक्त सब पदार्थों के काटने वाले अग्नि को (ईधे) प्रदीप्त करता है (तस्य) उस अग्नि के (इषः) घृतादि पदार्थों को मेघमण्डल में प्राप्त करने वाले किरण (प्र) अत्यन्त (दीदियुः) प्रज्वलित होते हैं और (इमाः) ये (ऋचः) वेद के मन्त्र (तम्) जिस अग्नि के गुणों का प्रकाश करते हैं (तम्) उसी (अग्निम्) अग्नि को सभाध्यक्षादि राजपुरुष हम लोग शिल्प क्रियासिद्धि के लिये (वर्धयामसि) बढ़ाते हैं।॥११॥

भावार्थ:-सभाध्यक्षादि राजपुरुषों को चाहिये कि होता आदि विद्वान् लोग वायु वृष्टि के शोधक हवन के लिये जिस अग्नि को प्रकाशित करते हैं, जिसके किरण ऊपर को प्रकाशित होते और जिसके गुणों को वेदमन्त्र कहते हैं, उसी अग्नि को राज्य साधक क्रियासिद्धि के लिये बढ़ावें।।११।___

पुनश्च तेषामेव राजपुरुषाणां गुणा उपदिश्यन्ते।। __

फिर भी अगले मन्त्र में उन्हीं राजपुरुषों के गुणों का उपदेश किया है।

ऋग्वेद 1.36.10

 यं त्वा देवासो मनवे धुरिह यजिष्ठं हव्यवाहन

यं कण्वो मेध्यातिथिर्धन॒स्पृत यं वृषा यमुपस्तुतः॥१०॥९॥

यम्त्वदेवासःमनवे। दधुः। इह। यजिष्ठम्। हव्यवाहन। यम्। कण्वः। मेध्य॑ऽअतिथिःधनऽस्पृतम्। यम्। वृषा। यम्। उपऽस्तुतः॥१०॥

पदार्थ:-(यम्) मननशीलम् (त्वा) त्वाम् (देवासः) विद्वांसः (मनवे) मननयोग्याय राजशासनाय (दधुः) दध्यासुःअत्र लिङर्थे लिट्। (इह) अस्मिन् संसारे (यजिष्ठम्) अतिशयेन यष्टारम् (हव्यवाहन) हव्यान्यादातुमर्हाणि वसूनि वहति प्राप्नोति तत्सम्बुद्धौ सभ्यजन (यम्) शिक्षितम् (कण्वः) मेधावीजन: (मेध्यातिथिः) मेध्यैरतिथिभियुक्तोऽध्यापकः (धनस्पृतम्) धनैर्विद्यासुवर्णादिभिः स्मृतः प्रीतः सेवितस्तम् (यम्) सुखस्य वर्षकम् (वृषा) विद्यावर्षक: (यम्) स्तोतुमर्हम् (उपस्तुतः) उपगतः स्तौति स उपस्तुतो विद्वान्अत्र स्तुधातोर्बाहुलकादौणादिकः क्तः प्रत्ययः॥१०॥

अन्वयः-हे हव्यवाहन! यं यजिष्टं त्वा त्वां देवासो मनव इह दधुर्दधति। यं धनस्पृतं त्वा त्वां मेध्यातिथिः कण्वो दधे। यं त्वा त्वां वृषादधेयं त्वा त्वामुपस्तुतो दधे तं त्वां वयं सभापतित्वेनाङ्गीकुर्महे॥१०॥

भावार्थ:-अस्मिञ्जगति सर्वैर्मनुष्यैर्विद्वांसोऽन्ये च श्रेष्ठपुरुषा मिलित्वा यं विचारशीलमादेयवस्तुप्रापकं शुभगुणाढ्यं विद्यासुवर्णादिधनयुक्तं सभ्यजनं राज्यशासनाय नियुज्युस्स एव पितृवत्पालको राजा भवेत्॥१०॥

पदार्थ:-हे (हव्यवाहन) ग्रहण करने योग्य वस्तुओं की प्राप्ति कराने वाले सभ्यजन! (यम्) जिस विचारशील (यजिष्ठम्) अत्यन्त यज्ञ करने वाले (त्वा) आप को (देवासः) विद्वान् लोग (मनवे) विचारने योग्य राज्य की शिक्षा के लिये (इह) पृथिवी में (दधुः) धारण करते (यम्) जिस शिक्षा पाये हुए (धनस्पृतम्) विद्या सुवर्ण आदि धन से युक्त आप को (मेध्यातिथि:) पवित्र अतिथियों से युक्त अध्यापक (कण्वः) विद्वान् पुरुष स्वीकार करता (यम्) जिस सुख की वृष्टि करने वाला (त्वा) आप को(वृषा) सुखों का फैलाने वाला धारण करता और (यम्) जिस स्तुति के योग्य आप को (उपस्तुतः) समीपस्थ सज्जनों की स्तुति करने वाला राजपुरुष धारण करता है, उन आप को हम लोग सभापति के अधिकार में नियत करते हैं।।१०॥

भावार्थ:-इस सृष्टि में सब मनुष्यों को चाहिये कि विद्वान् और अन्य सब श्रेष्ठ चतुर पुरुष मिल के जिस विचारशील ग्रहण के योग्य वस्तुओं के प्राप्त कराने वाले शुभ गुणों से भूषित विद्या सुवर्णादि धनयुक्त सभा के योग्य पुरुष को राज्य शिक्षा के लिये नियुक्त करें, उसी पिता के तुल्य पालन करने वाला जन राजा होवे।।१०॥

पुनरेतैरग्न्यादिपदार्थाः कथमुपकर्त्तव्याः॥

फिर सभाध्यक्षादि लोग अग्नि आदि पदार्थों से कैसे उपकार लेवें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

ऋग्वेद.1.36.9

 सं सीदस्व महाँ असि शोचस्व देववीतमः।

वि धूममग्ने अरुषं मियेध्य सृज प्रशस्त दर्शतम्॥९॥

सम्। सीदस्व। महान्। असि। शोचस्वा देवऽवीतमः। वि। धूमम्। अग्ने। अरुषम्। मियेध्या सृज। प्रऽशस्त। दर्शतम्॥९॥

पदार्थ:-(सम्) सम्यगर्थे (सीदस्व) दोषान् हिन्धि। व्यत्येनात्रत्मनेपदम् (महान्) महागुणविशिष्टः (असि) वर्त्तसे (देववीतमः) देवान् पृथिव्यादीन् वेत्ति व्याप्नोति (शोचस्व) प्रकाशस्वशुचिदीप्तावित्यस्माल्लोट् (देववीतमः) यो देवान् विदुषो व्याप्नोति सोऽतिशयतः (वि) (धूमम्) धूमसदृशमलरहितम् (अग्ने) तेजस्विन् सभापते (अरुषम्) सुन्दररूपयुक्तम्। अरुषमिति रूपनामसु पठितम्। (निघं०३.७) (मियेध्य) मेधार्ह। अयं प्रयोगः पृषोदरादिना अभीष्टः सिद्धयति। (सृज) (प्रशस्त) प्रशंसनीय (दर्शतम्) द्रष्टुमर्हम्॥९॥

अन्वयः-हे तेजस्विन् मियेध्याग्ने सभापते! यस्त्वं महानसि स सभापते देववीतमः सन्न्याये संसीदस्व शोचस्व। हे प्रशस्त राज॑स्त्वमत्र विधूमं दर्शतमरुषं सृजोत्पादय॥९॥

भावार्थ:-मेधाविनो राजपुरुषा अग्निवत् तेजस्विनो महागुणाढ्या भूत्वा दिव्यगुणानां पृथिव्यादिभूतानां तत्त्वं विज्ञाय प्रकाशमानाः सन्तो निर्मलं दर्शनीयं रूपमुत्पादयेयुः।।९।।

पदार्थ:-हे (तेजस्विन्) विद्याविनययुक्त (मियेध्य) प्राज्ञ (अग्ने) विद्वन् सभापते! जो आप (महान्) बड़े-बड़े गुणों से युक्त (असि) हैं सो (देववीतमः) विद्वानों को व्याप्त होने हारे आप न्यायधर्म में स्थित होकर (संसीदस्व) सब दोषों का नाश कीजिये और (शोचस्व) प्रकाशित हूजिये हे (प्रशस्त)प्रशंसा करने योग्य राजन्! आप (विधूमम्) धूमसदृश मल से रहित (दर्शतम्) देखने योग्य (अरुषम्) रूप को (सृज) उत्पन्न कीजिये।९।

भावार्थ:-प्रशंसित बुद्धिमान् राजपुरुषों को चाहिये कि अग्नि के समान तेजस्वि और बड़े-बड़े गुणों से युक्त हों और श्रेष्ठ गुणवाले पृथिवी आदि भूतों के तत्त्व को जान के प्रकाशमान होते हुए निर्मल देखने योग्य स्वरूपयुक्त पदार्थों को उत्पन्न करें॥९॥

___मनुष्याः कीदृशं सभेशं कुर्युरित्याह॥

मनुष्य किस प्रकार के पुरुष को सभाध्यक्ष करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।।

ऋग्वेद 1.36.8

 मन्तौ वृत्रम॑तरन् रोद॑सी अप ऊरु क्षया॑य चक्रिरे

भुव॒त्कण्वे वृां द्युम्याहूतः क्रन्दो गविष्टिषु॥८॥

घ्रन्तः। वृत्रम्अतरन्। रोद॑सी इति। अ॒पः। उरु। क्षाय। चक्रिरे। भुव॑त्। कण्वे। वृषाद्युम्नीआऽहुतः। क्रन्दत्अश्वः। गोऽष्टिषु।। ८॥

पदार्थ:-(मन्त:) शत्रुहननं कुर्वन्तो विद्युत्सूर्यकिरणा इव सेनापत्यादयः (वृत्रम्) मेघमिव शत्रुम् (अतरन्) प्लावयन्ति। अत्र लडथै लङ्। (रोदसी) द्यावापृथिव्यौ (अपः) कर्माणि। अप इति कर्मनामसु पठितम्। (निघं०२.१) (उरु) बहु (क्षयाय) निवासाय (चक्रिरे) कुर्वन्ति। अत्र लडथै लिट। (भुवत्) भवेत् लेट प्रयोगो बहुलं छन्दसि इति शपो लुकि भूसुवोस्तिङि। (अष्टा०७.३.८८) इति गुणप्रतिषेधः । (कण्वे) शिल्पविद्याविदि मेधाविनि विद्वज्जने (वृषा) सुखवृष्टिकर्ता (द्युम्नी) द्युम्नानि बहुविधानि धनानि भवन्ति यस्मिन्। अत्र भूम्न्यर्थ इनिः। (आहुत:) सभाध्यक्षत्वेन स्वीकृतः (क्रन्दत्) हेषणाख्यं शब्दं कुर्वन् (अश्व:) तुरङ्ग इव (गविष्टिषु) गवां पृथिव्यादीनामिष्टिप्राप्तीच्छा येषु संग्रामेषु तेषु॥८॥

अन्वयः-राजपुरुषा विद्युत्सूर्यकिरणा वृत्रमिव शत्रुदलं घ्नन्तो रोदसी अतरन्नपः कुर्युः तथा गविष्टिषु क्रन्ददश्व इवाहुतो वृषासन्नुरुक्षयाय कण्वे द्युम्नी दधद्भवत्॥८॥

भावार्थ:-यथा विद्युद्भभौतिकसूर्याग्नयो मेघ छित्त्वा वर्षयित्वा सर्वान् लोकान् जलेन पूयन्ति तत् कर्म प्राणिनां चिरसुखाय भवत्येवं सभाध्यक्षादिभी राजपुरुषैः कण्टकरूपाञ्छत्रून् हत्वा प्रजाः सततं तर्पणीयाः॥८॥

पदार्थः-राजपुरुष जैसे बिजुली सूर्य और उसके किरण (वृत्रम्) मेघ का छेदन करते और वर्षाते हुए आकाश और पृथिवी को जल से पूर्ण तथा इन कर्मों को प्राणियों के संसार में अधिक निवास केलिये करते हैं, वैसे ही शत्रुओं को (घ्नन्तः) मारते हुए (रोदसी) प्रकाश और अन्धेरे में (अपः) कर्म को करें और सब जीवों को (अतरन्) दुःखों के पार करें तथा (गविष्टिषु) गाय आदि पशुओं के संघातों में (क्रन्दत्) शब्द करते हुए (अश्वः) घोड़े के समान (आहुतः) राज्याधिकार में नियत किया (वृषा) सुख की वृष्टि करने वाला (उरुक्षयाय) बहुत निवास के लिये (कण्वे) बुद्धिमान् में (द्युम्नी) बहुत ऐश्वर्य को धरता हुआ सुखी (भुवत्) होवे॥८॥ _

भावार्थ:-जैसे बिजुली, भौतिक और सूर्य यही तीन प्रकार के अग्नि मेघ को छिन्न-भिन्न कर सब लोकों को जल से पूर्ण करते हैं, उनका युद्ध कर्म सब प्राणियों के अधिक निवास के लिये होता है, वैसे ही सभाध्यक्षादि राजपुरुषों को चाहिये कि कण्टकरूप शत्रुओं को मार के प्रजा को निरन्तर तृप्त करें॥८॥

अथ सभापतेर्गुणा उपदिश्यन्ते।

अब अगले मन्त्र में सभापति के गुणों का उपदेश किया है।

ऋग्वेद 1.36.7

 तं घेम॒ित्था नम॒स्विन उप स्वराजमासते।

होत्राभिरग्नि मनुषः समिधते तितर्वांसो अति स्रिधः॥७॥

तम्। घ। ईम्। इत्था। नमस्विनः। उप। स्वराजम्। आसते। होत्राभिः। अग्निम्। मनुषः। सम्। इधते। तितर्वांसः। अति। त्रिधः॥७॥

पदार्थ:-(तम्) प्रधानसभाध्यक्षं राजानम् (घ) एव (ईम्) प्रदातारम्। ईमिति पदनामसु पठितम्। (निघं०४.२) अनेन प्राप्त्यर्थो गृह्यते (इत्था) अनेन प्रकारेण (नमस्विनः) नमः प्रशस्तो वज्रः शस्त्रसमूहो विद्यते येषां ते। अत्र प्रशंसार्थे विनिः। (उप) सामीप्ये (स्वराजम्) स्वेषां राजा स्वराजस्तम् (आसते) उपविशन्ति (होत्राभिः) हवनसत्यक्रियाभिः (अग्निम्) ज्ञानस्वरूपम् (मनुषः) मनुष्याःअत्र मनधातोर्बाहुलकादोणादिक उसि: प्रत्ययः। (सम्) सम्यगर्थे (इधते) प्रकाशयन्ते (तितिर्वांसः) सम्यक् तरन्तः। अत्र तृधातोलिट:28 स्थाने वर्त्तमाने क्वसुः। (अति) अतिशयार्थे (निधः) हिंसकान् क्षयकर्तृञ्च्छत्रून्॥७॥

अन्वयः-ये नमस्विनो मनुषो होत्राभिस्तं स्वराजमग्निं सभाध्यक्षं घोपासते समिन्धते च तेऽतिनिधस्तितिर्वांसो भवेयुः॥७॥

भावार्थ:-न खलु सभाध्यक्षोपासकैः सभासद्भिर्भूत्यैर्विना कश्चिदपि स्वराजसिद्धिं प्राप्य शत्रून् विजेतुं शक्नोति॥७॥

पदार्थ:-जो (नमस्विनः) उत्तम सत्कार करने वाले (मनुषः) मनुष्य (होत्राभिः) हवनयुक्त सत्य क्रियाओं से (स्वराजम्) अपने राजा (अग्निम्) ज्ञानवान् सभाध्यक्ष को (घ) ही (उपासते) उपासना और (तम्) उसीका (समिधते) प्रकाश करते हैं, वे मनुष्य (निधः) हिंसानाश करने वाले शत्रुओं को (अति तितिर्वांसः) अच्छे प्रकार जीतकर पार हो सकते हैं।।७॥ ___

भावार्थ:-कोई भी मनुष्य सभाध्यक्ष की उपासना करने वाले भृत्य और सभासदों के विना अपने राज्य की सिद्धि को प्राप्त होकर शत्रुओं से विजय को प्राप्त नहीं हो सकता॥७॥

पुनः स एवार्थ उपदिश्यते।

फिर भी पूर्वोक्त विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।।

ऋग्वेद 1.36.6

 त्वे इदग्ने सुभगै यविष्ठ्य विश्वमा हूयते हुविः।

स त्वं नौ अ॒द्य सुमना उतापरं यक्षि देवान्त्सुवीर्या।।६॥

त्वे इति। इत्। अ॒ग्ने। सुऽभगे। यविष्ठ्य। विश्वम्। आ। हुयते। हविः। सः। त्वम्। नः। अद्य। सुऽमनाः। उत। अपरम्। यक्षिा देवान्। सुऽवीर्या।। ६॥

पदार्थ:-(त्वे) त्वयि (इ.) एव (अग्ने) सुखप्रदातः सभेश (सुभगे) शोभनमैश्वर्यं यस्मिँस्तस्मिन् (यविष्ठ्य) यो वेगेन पदार्थान् यौति संयुनक्ति संहतान् भिनत्ति वा स युवातिशयेन युवा यविष्ठो यविष्ठ एव यविष्टयस्तत्सम्बुद्धौ (विश्वम्) सर्वम् (आ) समन्तात् (हूयते) दीयते (हविः) सुसंस्कृतं वस्तु (सः) त्वम् (नः) अस्मान् (अद्य) अस्मिन्नहनि (सुमनाः) शोभनं मनो विज्ञानं यस्य सः (उत) अपि (अपरम्) श्वो दिनं प्रति (यक्षि) संगमय। अत्र लोडर्थे लङडभावश्च। (देवान्) विदुषः (सुवीर्या) शोभनानि वीर्याणि येषां तान्। अत्र सुपां सुलुग्० इत्याकारादेशः॥६॥ __

अन्वयः-हे यविष्ठयाग्ने! यथा होत्राग्नौ विश्वं हविराहूयते यस्मिन् सुभगे त्वे त्वयि सर्वो न्यायोऽस्माभिरधिक्रियते स सुमनास्त्वमद्योताप्यपरं दिनं प्रति नोऽस्मान् सुवीर्या श्रेष्ठपराक्रमयुक्तानि देवान्यक्षि संगमय॥६॥

भावार्थ:-अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा विद्वांसो वह्नौ शुद्ध हव्यं द्रव्यं प्रक्षिप्य जगते सुखं जनयन्ति तथैव राजपुरुषा दुष्टान् कारागृहे प्रक्षिप्य धार्मिकेभ्य आनन्दं प्रादुर्भावयन्तु॥६॥

पदार्थ:-हे (यविष्ठ्य) पदार्थों के मेल करने में बलवान् (अग्ने) सुख देनेवाले राजन्! जैसे होता द्वारा (अग्नौ) अग्नि में (विश्वम्) सब (हविः) उत्तमता से संस्कार किया हुआ पदार्थ (आहूयते) डाला जाता है, वैसे जिस (सुभगे) उत्तम ऐश्वर्ययुक्त (त्वे) आप में न्याय करने का काम स्थापित करते हैं सो (सुमनाः) अच्छे मन वाले (त्वम्) आप (अद्य) आज (उत) और (अपरम्) दूसरे दिन में भी (न:) हम लोगों को (सुवीर्य्या) उत्तम वीर्य वाले (देवान्) विद्वान् (इत्) ही (यक्षि) कीजिये॥६॥

भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् लोग वह्नि में पवित्र होम करके योग्य घृतादि पदार्थों को होम के संसार के लिये सुख उत्पन्न करते हैं, वैसे ही (राजपुरुष) दुष्टों को बन्दीघर में डाल के सज्जनों को आनन्द सदा दिया करें॥६॥

पुन: स एवार्थ उपदिश्यते॥

फिर उसी अर्थ का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।।

ऋग्वेद 1.36.5

 मन्द्रो होता॑ गृहप॑ति॒रग्नै दूतो विशामसि।

त्वे विश्वा संगतानि व्रता ध्रुवा यानि देवा अकृण्वत॥५॥८॥

मन्द्रः। होता। गृहऽप॑तिः। अग्ने। दूतः। विशाम्। असि। त्वे इति। विश्ा। सम्ऽगतानि। व्रता। ध्रुवा। यानि। दे॒वाः। अकृण्वत॥५॥

पदार्थ:-(मन्द्रः) पदार्थप्रापकत्वेन हर्षहेतुः (होता) सुखानां दाता (गृहपतिः) गृहकार्याणां पालयिता (अग्ने) शरीरबलेन देदीप्यमान (दूतः) यो दुनोत्युपतप्य भिनत्ति दुष्टान् शत्रून् सः (विशाम्) प्रजानाम् (असि) (त्वे) त्वयि राज्यपालके सति (विश्वा) विश्वानि सर्वाणि (संगतानि) धर्म्यव्यवहारसंयुक्तानि (व्रता) व्रतानि सत्याचरणानि कर्माणि। व्रतमिति कर्मनामसु पठितम्। (निघं०२.१) (ध्रुवा) निश्चलानि। अत्र त्रिषु शेश्छन्दसि बहुलम् इति शेर्लोपः। (यानि) (देवाः) विद्वांसः (अकृण्वत) कृण्वन्ति कुर्वन्ति। अत्र लडथै लङ् व्यत्येयनात्मनेपदञ्च।।५।।

अन्वयः-हे अग्ने! यतस्त्वं मन्द्रो होता गृहपतिर्दूतो विशांपतिरसि, तस्मात् सर्वा प्रजा यानि विश्वा ध्रुवा संगतानि व्रता धाणि कर्माणि देवा अकृण्वत तानि त्वे सततं सेवन्ते॥५॥ भावार्थ:-सुराजदूतसभासद एव राज्यं रक्षितुमर्हन्ति न विपरीताः।।५।। __

_इत्यष्टमो वर्गः॥

पदार्थ:-हे (अग्ने) शरीर और आत्मा के बल से सुशोभित जिससे आप (मन्द्रः) पदार्थों की प्राप्ति करने से सुख का हेतु (होता) सुखों के देने (गृहपतिः) गृहकार्यों का पालन (दूतः) दुष्ट शत्रुओं को तप्त और छेदन करने वाले (विशाम्) प्रजाओं के (पतिः) रक्षक (असि) हैं, इससे सब प्रजा (यानि) जिन (विश्वा) सब (ध्रुवा) निश्चल (संगतानि) सम्यक् युक्त समयानुकूल प्राप्त हुए (व्रता) धर्मयुक्त कर्मो को (देवाः) धार्मिक विद्वान् लोग (अकृण्वत) करते हैं, उनका सेवन (त्वे) आप के रक्षक होने से सदा कर सकती हैं।॥५॥ __

भावार्थ:-जो प्रशस्त राजा, दूत और सभासद् होते हैं, वे ही राज्य का पालन कर सकते हैं, इन से विपरीत मनुष्य नहीं कर सकते।।५।

आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ

अथाग्निदृष्टान्तेन राजपुरुषगुणा उपदिश्यन्ते।

अब अग्नि के दृष्टान्त से राजपुरुषों के गुणों का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

ऋग्वेद 1.36.4

 देवासस्त्वा वरुणो मित्रो अर्यमा सं दूतं प्रत्नमिधते।

विश्वं सो अग्ने जयति त्वया धनं यस्तै ददाश मर्त्यः॥४॥

दे॒वासः। त्वा। वरुणः। मित्रः। अर्यमा। सम्। दूतम्। प्र॒त्नम्। दृद्धते। विश्वम्। सः। अग्ने। जयति। त्वया। धनम्। यः। ते। ददाशा मर्त्यः॥४॥

पदार्थ:-(देवासः) सभ्या विद्वांसः (त्वा) त्वाम् (वरुणः) उत्कृष्टः (मित्रः) मित्रवत्प्राणप्रदः (अर्यमा) न्यायकारी (सम्) सम्यगर्थे (दूतम्) यो दुनोति सामादिभिः शत॒स्तम्। दुतनिभ्यां दीर्घश्च। (उणा०३.८८)। (प्रत्नम्) कारणरूपेणानादिम्। नश्च पुराणे प्रादूक्तव्याः। (अष्टा०५.४.३०) इति पुराणार्थे प्रशब्दात् तनप् प्रत्ययः। (इग्धते) शुभगुणैः प्रकाशन्ते (विश्वम्) सर्वम् (सः) (अग्ने) धर्मविद्या श्रेष्ठगुणैः प्रकाशमानसभापते (जयति) उत्कर्षयति (त्वया) (धनम्) विद्यासुवर्णादिकम् (यः) (ते) तव (ददाश) दाशति। अत्र लडथै लिट। (मर्त्यः) मनुष्यः।।४।।

अन्वयः-हे अग्ने सभेश! यस्ते दूतो मा धनं ददाश यस्त्वया सह शत्रूञ्जयति मित्रो वरुणोऽर्यमा देवासो यं दूतं समिन्धते यस्त्वा त्वां प्रजाञ्च प्रीणाति स प्रत्नं विश्वं राज्यं रक्षितुमर्हति॥४॥

भावार्थ:-नहि केचिदपि सर्वशास्त्रविशारदै राजधर्मवित्तमैः परावरज्ञैर्धार्मिकै: प्रगल्भैः शूरैर्दूतैः सराजभिः सभासद्भिश्च विना राज्यं लब्धं रक्षितुमुन्नेतुमुपकर्तुं शक्नुवन्ति तस्मादेवमेव सर्वैः सदा विधेयमिति॥४॥

पदार्थ:-हे (अग्ने) धर्म विद्या श्रेष्ठ गुणों से प्रकाशमान सभापते! (यः) जो (ते) तेरा (दूतः) दूत (मर्त्यः) मनुष्य तेरे लिये (धनम्) विद्या, राज्य, सुवर्णादि श्री को (ददाश) देता है तथा जो (त्वया) तेरे साथ शत्रुओं को (जयति) जीतता है (मित्रः) सबका सुहृद् (वरुणः) सब से उत्तम (अर्यमा) न्यायकारी (देवासः) ये सब सभ्य विद्वान् मनुष्य जिसको (समिन्धते) अच्छे प्रकार प्रशंसित जान कर स्वीकार के लिये शुभगुणों से प्रकाशित करें जो (त्वा) तुझ और सब प्रजाको प्रसन्न रक्खे (सः) वह दूत (प्रत्नम्) जो कि कारणरूप से अनादि है (विश्वम्) सब राज्य को सुरक्षित रखने को योग्य होता है।॥४॥

भावार्थ:-कोई भी मनुष्य सब शास्त्रों में प्रवीण, राजधर्म को ठीक-ठीक जानने, पर-अपर इतिहासों के वेत्ता, धर्मात्मा, निर्भयता से सब विषयों के वक्ता, शूरवीर, दूतों और उत्तम राजा सहित सभासदों के विना राज्य को पाने, पालने, बढ़ाने और परोपकार में लगाने को समर्थ नहीं हो सकते, इससे पूर्वोक्त प्रकार ही से राज्य की प्राप्ति आदि का विधान सब लोग सदा किया करें।॥४॥

__पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते॥

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

ऋग्वेद 1.36.3

 प्र त्वा दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम्म

हस्ते सतो वि चरन्त्यर्चयो दिवि स्पृशन्ति भानवः॥३॥

प्रा त्ा। दूतम्। वृणीमहे। होतारम्। विश्वऽवैदसम्महः। ते। सतः। वि। चरन्तिअर्चयः। दिविस्पृशन्ति। भानवः॥३॥

पदार्थ:-(प्र) प्रकृष्टार्थे (त्वा) त्वाम् (दूतम्) यो दुनोत्युपतापयति सर्वान् पदार्थानितस्ततो भ्रमणेन दुष्टान् वा तम् (वृणीमहे) स्वीकुर्महे (होतारम्) ग्रहीतारम् (विश्ववेदसम्) विश्वानि सर्वाणि शिल्पसाधनानि विन्दन्ति यस्मात्तं सर्वप्रजासमाचारजं वा (महः) महसो महागुणविशिष्टस्यसर्वधातुभ्योऽसुन् (उणा०४.१९०) इत्यसुन्। सुपां सुलुग्० इति डसो लुक्। (ते) तव (सतः) कारणरूपेणाविनाशिनो विद्यमानस्य (वि) विशेषार्थे (चरन्ति) गच्छन्ति (अर्चयः) दीप्तिरूपा ज्वाला न्यायप्रकाशका नीतयो वा (दिवि) द्योतनात्मके सूर्यप्रकाशे प्रजाव्यवहारे वा (स्पृशन्ति) सम्बध्नन्ति (भानवः) किरणाः प्रभावा वा। भानव इति रश्मिनामसु पठितम्। (निघं०१.५)।३।

अन्वयः-हे विद्वन् राजदूत! यथा वयं विश्ववेदसं होतारं दूतमग्निं प्रवृणीमहे तथाभूतं त्वा त्वामपि प्रवृणीमहे यथा च महो महसः सतोऽग्नेर्भानवः सर्वान् पदार्थान् स्पृशन्ति सम्बध्नन्त्यर्चयो दिवि विचरन्ति च तथा ते तवापि सन्तु॥३॥

भावार्थ:-अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे स्वकर्मप्रवीण राजदूत! यथा सर्वैर्मनुष्यैर्महाप्रकाशादिगुणयुक्तमग्निं पदार्थप्राप्त्यप्राप्त्योः कारकत्वाद् दूतं कृत्वा शिल्पकार्याणि वियदि हुतद्रव्यप्रापणं च साधयित्वा सुखानि स्वीक्रियन्ते यथाऽस्य विद्युदूपास्याग्नेर्दीप्तयः सर्वत्र वर्त्तन्तेप्रसिद्धस्य लघुत्वाद् वायोश्छेदकत्वेनावकाशकारित्वाज्जवाला उपरि गच्छन्ति तथा त्वमपीदं कृत्वैवं भव॥३॥

पदार्थ:-हे विद्वन् राजदूत! जैसे हम लोग (विश्ववेदसम्) सब शिल्पविद्या का हेतु (होतारम्) ग्रहण करने और (दूतम्) सब पदार्थों को तपाने वाले अग्नि को (वृणीमहे) स्वीकार करते हैं, वैसे (त्वा) तुझ को भी ग्रहण करते हैं तथा जैसे (महः) महागुणविशिष्ट (सतः) सत्कारणरूप से नित्य अग्नि के (भानवः) किरण सब पदार्थों से (स्पृशन्ति) सम्बन्ध करते और (अर्चयः) प्रकाशरूप ज्वाला (दिवि) द्योतनात्मक सूर्य के प्रकाश में (विचरन्ति) विशेष करके प्राप्त होती हैं, वैसे तेरे भी सब काम होने चाहिये॥३॥

भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे अपने काम में प्रवीण राजदूत! जैसे सब मनुष्य महाप्रकाशादिगुणयुक्त अग्नि को पदार्थों की प्राप्ति वा अप्राप्ति के कारण दूत के समान जान और शिल्पकार्यों को सिद्ध करके सुखों को स्वीकार करते और जैसे इस बिजुली रूप अग्नि की दीप्ति सब जगह वर्तती है और प्रसिद्ध अग्नि की दीप्ति छोटी होने तथा वायु के छेदक होने से अवकाश करने वाला होकर ज्वाला ऊपर जाती है, वैसे तू भी अपने कामों में प्रवृत हो॥३॥

पुन: स दूतः कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह दूत कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

ऋग्वेद 1.36.2

 जासो अग्नि दधिरे सोवृध हविष्म॑न्तो विधेम ते।

स त्वं नौ अ॒द्य सुमना इहाविता भवा वाजेषु सन्त्य॥२॥

जासःअग्निम्। दधिरेसहःऽवृधम्। हुविष्म॑न्तःविधेम। ते। सः। त्वम्। नः। अद्य। सुऽमनाःदुह। अवता। भव। वाजेषु। सन्त्य॥२॥

पदार्थ:-(जनासः) विद्यासु प्रादुर्भूता मनुष्याः (अग्निम्) सर्वाभिरक्षकमीश्वरम् (दधिरे) धरन्ति। अत्र लडथै लिट। (सहोवृधम्) सहोबलं वर्धयतीति सहोवृत्तम् (हविष्मन्तः) प्रशस्तानि हवींषि दातुमादातुमर्हाणि वस्तूनि विद्यन्ते येषां ते। अत्र प्रशंसार्थे मतुप्। (विधेम) सेवेमहि (ते) तव। अत्र सायणाचार्येण ते त्वामित्युक्तं तन्न सम्भवति द्वितीयैकवचने त्वाऽऽदेशविधानात् (सः) ईश्वरः (त्वम्) सर्वदा प्रसन्नः (न:) अस्माकम् (अद्य) अस्मिन्नहनि (सुमनाः) शोभनं मनो ज्ञानं यस्य सः (इह) अस्मिन् संसारे (अविता) रक्षको ज्ञापक: सर्वासु विद्यासु प्रवेशकः (भवा) अत्र व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः । (वाजेषु) युद्धेषु (सन्त्य) सन्तौ दाने साधुस्तत्सम्बुद्धौ। अत्र षणुदान इत्यस्माद् बाहुलकादौणादिकस्तिः प्रत्ययस्तत: साध्वर्थे यच्च॥२॥ __

अन्वयः-हे सन्त्येश्वर ! यथा हविष्मन्तो जनासो यस्य ते तवाश्रयं दधिरे तथा तं सहोवृधमग्निं त्वां वयं विधेम स सुमनास्त्वमद्य नोऽस्माकमिह वाजेषु चाविता भव॥२॥

भावार्थ:-मनुष्यैरेकस्याद्वितीयपरमेश्वरस्योपासनेनैव सन्तोषितव्यं नहि विद्वांसः कदाचिद् ब्रह्मस्थानेऽन्यद् वस्तूपास्यत्वेन स्वीकुर्वन्ति। अत एव तेषां युद्धेष्विह कदाचित् पराजयो न दृश्यते। एवं नहि कदाचिदनीश्वरोपासकास्तान् विजेतुं शक्नुवन्ति येषामीश्वरो रक्षकोऽस्ति कुतस्तेषां पराभवः॥२॥

पदार्थ:-हे (सन्त्य) सब वस्तु देनेहारे ईश्वर ! जैसे (हविष्मन्तः) उत्तम देने-लेने योग्य वस्तु वाले (जनासः) विद्या में प्रसिद्ध हुए विद्वान् लोग जिस (ते) आप के आश्रय का (दधिरे) धारण करते हैं, वैसेउन (सहोवृधम्) बल को बढ़ाने वाले (अग्निम्) सब के रक्षक आप को हम लोग (विधेम) सेवन करें (सः) सो (सुमनाः) उत्तम ज्ञान वाले (त्वम्) आप (अद्य) आज (न:) हम लोगों के (इह) संसार और (वाजेषु) युद्धों में (अविता) रक्षक और सब विद्याओं में प्रवेश कराने वाले (भव) हूजिये॥२॥

भावार्थ:-मनुष्यों को एक अद्वितीय परमेश्वर की उपासना ही से सन्तुष्ट रहना चाहिये, क्योंकि विद्वान् लोग परमेश्वर के स्थान में अन्य वस्तु को उपासना भाव से स्वीकार कभी नहीं करते। इसी कारण उनका युद्ध वा इस संसार में कभी पराजय दीख नहीं पड़ता, क्योंकि वे धार्मिक ही होते हैं और इसी से ईश्वर की उपासना नहीं करने वाले उनके जीतने को समर्थ नहीं होते, क्योंकि ईश्वर जिनकी रक्षा करने वाला है, उनका कैसे पराजय हो सकता है।।२।।

___अथ भौतिकाग्निदृष्टान्तेन राजदूतगुणा उपदिश्यन्ते।।

अब अगले मन्त्र में भौतिक अग्नि के दृष्टान्त से राजदूत के गुणों का उपदेश किया है।।

ऋग्वेद 1.36.1

 अथ विशत्यूचस्य षट्त्रिंशस्य सूक्तस्य घौर: काण्वऋषिः। अग्निर्देवता। १, १२ भुरिगनुष्टप्

छन्दः। गान्धारः स्वरः। २ नित्सतः पङ्क्तिः। ४ निवृत्पङ्क्तिः। १०,१४ निद्विष्टारपङ्क्तिः।

१८ विष्टारपङ्क्तिः । २० सतः पङ्क्तिश्छन्दः। पञ्चमः स्वरः। ३,११ निवृत्पथ्याबृहती। ५,१६

निबृहती। ६ भुरिग् बृहती। ७ बृहती। ८ स्वराड् बृहती। ९ निचूदुपरिष्टाद् बृहती। १२ उपरिष्टाद् बृहती१५ विराट् पथ्या बृहती। १७ विराडुपरिष्टाद् बृहती। १९ पथ्याबृहती च

__ छन्दः। मध्यमः स्वरः॥

तत्रादावग्निशब्देनेश्वरगुणा उपदिश्यन्ते।

अब छत्तीसवें सूक्त का आरम्भ है उसके पहिले मन्त्र में अग्नि शब्द से ईश्वर के गुणों का उपदेश किया है

प्र वो यह्व पुरूणां विशां देवय॒तीनाम्।

अग्निं सूक्तेभिर्वचौभिरीमहे यं सीमिदन्य ईळते॥१॥

प्रा वः। यह्वम्। पुरूणाम्। विशाम्। देवऽयतीनाम्। अग्निम्सुऽउक्तेभिः। वच:ऽभिः। ईमहे। यम्। सीम्। इत्। अन्ये। ईळते॥ १॥

पदार्थ:-(प्र) प्रकृष्टार्थे (वः) युष्माकम् (यह्वम्) गुणैर्महान्तम्। यह इति महन्नामसु पठितम्। (निघं०३.३) (पुरूणाम्) बह्वीनाम् (विशाम्) प्रजानां मध्ये (देवयतीनाम्) आत्मनो देवान् दिव्यान् भोगान् गुणांश्चेच्छन्तीनाम् (अग्निम्) परमेश्वरम् (सूक्तेभिः) सुष्टुक्ता विद्या येषु तैः (वचोभिः) वेदार्थज्ञानयुक्तैर्वचनैः (ईमहे) याचामहेअत्र बहुलं छन्दसि इति श्यनो लुक्। ईमह इति याञ्चाकर्मसु पठितम्। (निघं०३.१९) (यम्) उक्तम् (सीम्) सर्वतः। प्र सीमादित्यो असृजत्। (ऋ०२.२८.४) प्रासृजदिति वा। प्रासृजत् सर्वत इति वा। (निरु०१.७) इति सीमव्ययं सर्वार्थ गृह्यते। (इत्) एव (अन्ये) परोपकारका बुद्धिमन्तो धार्मिका विद्वांसः (ईळते) स्तुवन्ति॥१॥

अन्वयः-वयं यथान्ये विद्वांसः सूक्तेभिर्वचोभिर्देवयतीनां पुरूणां वो युष्माकं विशां प्रजानां सुखाय यं यह्वमग्निं सीमीडते तथा तमिदेव प्रेमहे प्रकृष्टतया याचामहे प्रकाशयामश्च।।१।।

भावार्थ:-अत्र वाचकलुप्तोमालङ्कारः। हे मनुष्या! यूयं यथा विद्वांसः प्रजासुखसम्पत्तये सर्वव्यापिनं परमेश्वरं निश्चित्योपदिश्य च तद्गुणान् प्रयत्नेन विज्ञापयन्ति स्तावयन्ति, तथैव वयमपि प्रकाशयामःयथेश्वरोऽग्न्यादिपदार्थरचनपालनाभ्यां जीवेषु सर्वाणि सुखानि दधाति तथा वयमपि सर्वप्राणिसुखानि सदा निर्वर्त्तयेमेति बुध्यध्वम्॥१॥ __

पदार्थः-हम लोग जैसे (अन्ये) अन्य परोपकारी धर्मात्मा विद्वान् लोग (सूक्तेभिः) जिनमें अच्छे प्रकार विद्या कही है, उन (वचोभिः) वेद के अर्थज्ञानयुक्त वचनों से (देवयतीनाम्) अपने लियेदिव्यभोग वा दिव्यगुणों की इच्छा करने वाले (पुरूणाम्) बहुत (व:) तुम (विशाम्) प्रजा लोगों के सुख के लिये (यम्) जिस (यह्वम्) अनन्तगुण युक्त (अग्निम्) परमेश्वर की (सीम्+ईडते) सब प्रकार स्तुति करते हैं, वैसे उस (इत्) ही की (प्रेमहे) अच्छे प्रकार याचना और गुणों का प्रकाश करें॥१॥

भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे तुम लोग पूर्ण विद्यायुक्त विद्वान् लोग प्रजा के सुख की सम्पत्ति के लिये सर्वव्यापी परमेश्वर का निश्चय तथा उपदेश करके प्रयत्न से जानते हैं, वैसे ही हम लोग भी उसके गुण प्रकाशित करें। जैसे ईश्वर अग्नि आदि पदार्थों के रचन और पालन से जीवों में सब सुखों को धारण करता है, वैसे हम लोग भी प्राणियों के लिये सदा सुख वा विद्या को सिद्ध करते रहें, ऐसा जानो॥१॥

पुन: स एवार्थ उपदिश्यते॥

फिर भी अगले मन्त्र में उक्त विषय का उपदेश किया है।

ऋग्वेद 1.35.10

 ये ते पाः सवितः पूर्व्यासोऽरेणवः सुकृता अन्तरिक्ष।

तेभिर्नो अद्य पथिभिः सुगेभी रक्षा च नो अधिं च ब्रूहि देव॥११॥७॥७॥

ये। ते। पन्थाः। सवितरित। पूर्व्यासः। अरेणवः। सुऽकृताः। अन्तरिक्ष। तेभिः। नःअद्यपृथिऽभिःसुऽगेभिः। रक्षा च। नः। अधि। च। ब्रूहि। देव।। ११॥ ___

पदार्थ:-(ये) वक्ष्यमाणाः (ते) तव (पन्थाः) धर्ममार्गाः। अत्र सुपां सुलुग्० इति जसः स्थाने सुः। (सवितः) सकलजगदुत्पादकेश्वर (पूर्व्यासः) पूर्वैः कृता साधिता: सेविताश्च। अत्र पूर्वेः कृतमिनियौ च। (अष्टा० ४.४.१३३) इति पूर्वशब्दाद्यः प्रत्ययः। आज्जसेरसुग् (अष्टा०७.१.५०) इत्यस्सुगागमश्च। (अरेणवः) अविद्यमाना रेणवो धूल्यंशा इव विघ्ना येषु ते। अजिबूरी० (उणा०३.३७) इति रीधातोर्णः प्रत्ययः। (सुकृताः) सुष्टु निर्मिताः (अन्तरिक्ष) स्व्याप्तिरूपे ब्रह्माण्डे (तेभिः) तैः (न:) अस्मान् (अद्य) अस्मिन्नहनि (पथिभिः) उक्तमार्गः (सुगेभिः) सुखेन गच्छन्ति येषु तैःसुदुरोरधिकरणे० (अष्टा०३.२.४८) इति वार्त्तिकेन सूपपदाद् गमधातोर्डः प्रत्ययः (रक्ष) पालय। अत्र द्वयचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (च) समुच्चये (नः) अस्मभ्यम् (अधि) ईश्वरार्थ उपरिभावे (च) अपि (ब्रूहि) उपदिश (देव) सर्वसुखप्रदातरीश्वर।।११॥

अन्वयः-हे सवितर्देव जगदीश्वर! त्वं कृपया ये ते तवारेणवः पूर्व्यासः सुकृताः पन्थानोऽन्तरिक्षे स्वव्याप्तिरूपे वर्तन्ते, तेभिः सुगेभिः पथिभिर्नोऽस्माना रक्ष च नोऽस्मभ्यं सर्वा विद्या अधिबेहि च।।११॥

भावार्थ:-हे ईश्वर! त्वया ये सूर्यादिलोकानां भ्रमणार्था मार्गा प्राणिसुखाय च धर्ममार्गा अन्तरिक्षे स्वमहिम्नि च रचितास्तेष्विमे यथानियमं भ्रमन्ति विचरन्ति च तान् सर्वेषां पदार्थानां मार्गान् गुणांश्चास्मभ्यं ब्रूहि। येन वयं कदाचिदितस्ततो न भ्रमेमेति॥११॥

अस्मिन् सूक्ते सूर्यलोकेश्वरवायुगुणानां प्रतिपादनाच्चतुस्त्रिंशसूक्तोक्तार्थेन सङ्गतिरस्तीति वेदितव्यम्।

इति सप्तमो ७ वर्ग:, अनुवाकः पञ्चत्रिंशं ३५ सूक्तं च समाप्तम्॥

पदार्थ:-हे (सवितः) सकल जगत् के रचने और (देव) सब सुख देने वाले जगदीश्वर! (ये) जो (ते) आपके (अरेणवः) जिनमें कुछ भी धूलि के अंशों के समान विघ्नरूप मल नहीं हैं तथा (पूर्व्यास:) जो हमारी अपेक्षा से प्राचीनों ने सिद्ध और सेवन किये हैं (सुकृताः) अच्छे प्रकार सिद्ध किये हुए (पन्थाः) मार्ग (अन्तरिक्ष) अपने व्यापकता रूप ब्रह्माण्ड में वर्तमान हैं (तेभिः) उन (सुगेभिः) सुखपूर्वक सेवने योग्य (पथिभिः) मार्गों से (न:) हम लोगों की (अद्य) आज (रक्ष) रक्षा कीजिये (च) और (न:) हम लोगों के लिये सब विद्याओं का (अधिब्रूहि) उपदेश (च) भी कीजिये।।११।

भावार्थ:-हे ईश्वर ! आपने जो सूर्य आदि लोकों के घूमने और प्राणियों के सुख के लिये आकाश वा अपने महिमारूप संसार में शुद्ध मार्ग रचे हैं, जिनमें सूर्यादि लोक यथानियम से घूमते और सब प्राणी विचरते हैं, उन सब पदार्थों के मार्गों तथा गुणों का उपदेश कीजिये कि जिससे हम लोग इधर-उधर चलायमान न होवें।।११॥

इस सूक्त में सूर्यलोक वायु और ईश्वर के गुणों का प्रतिपादन करने से चौंतीसवें सूक्त के साथ इस सूक्त की सङ्गति जाननी चाहिये।

यह सातवां वर्ग ७ सातवां अनुवाक ७ और पैंतीसवां सूक्त समाप्त हुआ॥ ३५॥

ऋग्वेद 1.35.9

 हिरण्यहस्तो असुरः सुनीथः सुमृळीकः स्ववा यात्वर्वा।

अपसेधन् रक्षौ यातुधानानस्थाद् देवः प्रतिदोषं गृणानः॥१०॥

हिरण्यऽहस्तः। असुरः। सुनीथः। सुऽमृळीकः। स्वऽवान् यातु। अर्वाड अपऽसेधन्। रक्षसः। यातुऽधानान्। अस्थात्। दे॒वः। प्रति॒िऽदोषम्। गृणानः॥ १०॥

पदार्थ:-(हिरण्यहस्तः) हिरण्यानि सर्वतो गमनानि हस्ता इव यस्य सः। अत्र गत्यर्थाद्धर्य धातोरोणादिकः कन्यन् प्रत्ययः। (असुरः) असून् प्राणान् राति ददात्यविद्यमानरूपगुणो वा सोऽसुरो वायुःआतोऽनुपसर्गे कः। (अष्टा०३.२.३) इत्यसूपपदाद्राधातोः कः(सुनीथः) शोभनं नीथो नयनं प्रापणं यस्य सः(सुमृडीक:) यः शोभने मृडयति सुखयति सः। मृड: कीकच् कङ्कणौ। (उणा०४.२५) इति कीकच्। (स्ववान्) स्वे प्रशस्ताः स्पर्शादयो गुणा विद्यन्ते यस्मिन् सःअत्र प्रशंसाथै मतुप्(यातु) प्राप्नोति प्राप्नोतु वा (अर्वाङ्) अर्वतः स्वकीयानध ऊर्ध्वतिर्यग्गमनाख्यवेगानञ्चति प्राप्नोतीति। अत्र ऋत्विग्दधृक्० (अष्टा०३.२.५९) इति क्विन्। क्विन् प्रत्यस्य कुः (अष्टा०८.२.६२) इति कवर्गादेशः। (अपसेधन्) निवारयन् सन् (रक्षसः) चोरादीन् दुष्टकर्मकर्तृन्। रक्षो रक्षयितव्यमस्मात्। (निरु०४.१८) (यातुधानान्) यातवो यातनाः पीडा धीयन्ते येषु तान् दस्यून् (अस्थात्) स्थितवानस्ति (देवः) सर्वव्यवहारसाधकः (प्रतिदोषम्) रात्रिं रात्रिं प्रति। अत्र रात्ररुपलक्षणत्वाद् दिवसस्यापि ग्रहणमस्ति प्रतिसमयमित्यर्थः दोषेति रात्रिनामसु पठितम्। (निघं०१.७) (गृणान:) स्वगुणैः स्तोतुमर्हः ।।१०॥ ___

अन्वयः-हे सभेश! भवान् यथाऽयं हिरण्यहस्तोऽसुरः सुनीथः सुमृडीकः स्ववानर्वाङ् वायुर्याति सर्वतश्चलति। एवं प्रति दोषं गृणानो देवो वायु दुःखानि निवार्य सुखानि प्रापयित्वाऽस्थात् तथा यातुधानान् रक्षसोऽपसेधन् सर्वान् दुष्टान्निवारयन् श्रेष्ठान् यातु प्राप्नोतु॥१०॥

भावार्थ:-अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे सभापते! यथायं वायुः स्वकीयाकर्षणबलादिगुणैः सर्वान् पदार्थान् व्यवस्थापयति यथा च दिवसे चौरा: प्रबला भवितुं नार्हन्ति, तथैव भवतापि भवितव्यम्। येन जगदीश्वरेण बहुगुणसुखप्रापका वायुवादयः पदार्था रचितास्तस्मै सर्वेर्धन्यवादा देयाः॥१०॥

पदार्थ:-हे सभापते! आप जैसे यह (हिरण्यहस्तः) जिसका चलना हाथ के समान है (असुरः) प्राणों की रक्षा करने वाला रूपगुणरहित (सुनीथः) सुन्दर रीति से सबको प्राप्त होने (सुमृडीक:) उत्तम व्यवहारों से सुखयुक्त करने और (स्ववान्) उत्तम-उत्तम स्पर्श आदि गुण वाला (अर्वाङ्) अपने नीचेऊपर टेढ़े जाने वाले वेगों को प्राप्त होता हुआ वायु चारों ओर से चलता है तथा (प्रतिदोषम्) रात्रि-रात्रि के प्रति (गृणान:) गुण कथन से स्तुति करने योग्य (देवः) सुखदायक वायु दुःखों को निवृत्त और सुखों को प्राप्त करके (अस्थात्) स्थित होता है, वैसे (रक्षसः) दुष्ट कर्म करने वाले (यातुधानान्) जिनसे पीड़ा आदि दुःख होते हैं, उन डाकुओं को (अपसेधन्) निवारण करते हुए श्रेष्ठों को प्राप्त हूजिये॥१०॥

भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे सभापति! जैसे यह वायु अपने आकर्षण और बल आदि गुणों से सब पदार्थों को व्यवस्था में रखता है और जैसे दिन में चोर प्रबल नहीं हो सकते हैं, वैसे आप भी हूजिये और तुमको जिस जगदीश्वर ने बहुत गुणयुक्त सुख प्राप्त करने वाले वायु आदि पदार्थ रचे हैं, उसी को सब धन्यवाद देने योग्य हैं।।१०॥

अथेन्द्रशब्दनेश्वर उपदिश्यते॥

अब अगले मन्त्र में इन्द्र शब्द से ईश्वर का उपदेश किया है।

ऋग्वेद 1.35.8

अष्टौ व्यख्यत्ककुभः पृथिव्यास्त्री धन्व योजना स॒प्त सिधून्।

हिरण्याक्षः सविता देव आगाद् दद्रा दाशुषे वार्याणि॥८॥

अष्टौविअख्यत्ककुभः। पृथिव्याःत्री। धन्वा योजनासप्त। सिधून्। हिरण्य॒ऽअक्षः। सवितादे॒वः। आ। अात्। दधत्। रत्ना। दाशुषे। वार्याणि।। ८॥

पदार्थ:-(अष्टौ) चतस्रो दिश उपदिशश्च(वि) विशेषार्थे क्रियायोगे (अख्यत्) ख्यापयति (ककुभः) दिशः। ककुभ इति दिङ्नामसु पठितम्। (निघं० १.६) (पृथिव्याः) भूमेः सम्बन्धिनी: (त्री) त्रीणि भूम्यन्तरिक्षप्रकाशस्थानि भुवनानि (धन्व) प्राप्तव्यानि। अत्र गत्यर्थाद्धविधातौरोणादिकः कनिन्, सुपां सुलुग् इति विभक्तेर्लुक्। (योजना) युज्यन्ते सर्वाणि वस्तूनि येषु भुवनेषु तानि योजनानि। अत्र शेश्छन्दसि इति शेर्लोपः। (सप्त) सप्त सङ्ख्याकान् (सिन्धून्) भूम्यन्तरिक्षोपर्युपरिस्थितान् (हिरण्याक्षः) हिरण्यानि ज्योतीष्यक्षीणि व्याप्तिशीलानि यस्य सः (सविता) वृष्टयुत्पादक: (देवः) द्योतनात्मकः (आ) समन्तात् (अगात्) एति प्राप्नोति। अत्र लडथै लुङ्। इणो गा लुङिा (अष्टा०२.४.४५) इति गा आदेशः। (दधत्) दधातीति दधत्सन् (रत्ना) सुवर्णादीनि रमणीयानि (दाशुषे) सर्वोपकारकाय विद्यादिदानशीलाय यजमानाय (वार्याणि) वरितुं ग्रहीतुं योग्यानि।।८॥

अन्वयः-हे सभेश! त्वं यथा यो हिरण्याक्षः सविता देवः सूर्यलोकः पृथिव्याः सम्बन्धिनीरष्टौ ककुभस्त्री त्रीण्युपर्यधोमध्यस्थानि धन्वानि योजनानि तदुपलक्षितान् मार्गान् सप्तसिधैंश्च व्यख्यद् विख्यापयति, स दाशुषे वार्याणि रत्ना रत्नानि दधत्पन्नागात् समन्तादेति तथा भूतः सन् वर्त्तस्व॥८॥

भावार्थ:-अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथाऽयं सूर्यलोकः सर्वाणि मूर्त्तद्रव्याणि प्रकाश्य छित्वा वायुद्वाराऽन्तरिक्षे नीत्वा तस्मादधो निपात्य सर्वाणि रमणीयानि सुखानि जीवार्थ नयति। पृथिव्या मध्ये स्थितानामेकोनपञ्चाशत् क्रोशपर्यन्तेऽन्तरिक्षे स्थूलसूक्ष्मलघुगुरुत्वरूपेण स्थितानां चापां सप्तसिध्विति संजैताः सर्वा आकर्षणेन धरति च तथा सर्वविद्वद्भिर्विद्याधर्माभ्यां सकलान् मनुष्यान् धृत्वाऽऽनन्दयितव्याः॥८॥

पदार्थ:-हे सभेश! जैसे जो (हिरण्याक्षः) जिसके सुवर्ण के समान ज्योति है वह (सविता) वृष्टि उत्पन्न करने वाला (देवः) द्योतनात्मक सूर्यलोक (पृथिव्याः) पृथिवी से सम्बन्ध रखने वाली (अष्टौ) आठ (ककुभः) दिशा अर्थात् चार दिशा और चार उपदिशाओं (त्री) तीन भूमि, अन्तरिक्ष और प्रकाश के अर्थात् ऊपर, नीचे और मध्य में ठहरने वाले (धन्व) प्राप्त होने योग्य (योजना) सब वस्तु के आधार तीन लोकों और (सप्त) सात (सिधून) भूमि, अन्तरिक्ष वा ऊपर स्थित हुए जलसमुदायों को (व्यख्यत्) प्रकाशित करता है, वह (दाशुषे) सर्वोपकारक विद्यादि उत्तम पदार्थ देने वाले यजमान के लिये (वार्याणि) स्वीकार करने योग्य (रत्ना) पृथिवी आदि वा सुवर्ण आदि रमणीय रत्नों को (दधत्) धारण करता हुआ (आगात्) अच्छे प्रकार प्राप्त होता है, वैसे तुम भी वर्तो।।८॥

भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे यह सूर्यलोक सब मूर्तिमान् पदार्थों का प्रकाश, छेदन, वायु द्वारा अन्तरिक्ष में प्राप्त और वहाँ से नीचे गिराकर सब रमणीय सुखों को जीवों के लिये उत्पन्न करता और पृथिवी में स्थित और उनचास क्रोश पर्यन्त अन्तरिक्ष में स्थूल, सूक्ष्म, लघु और गुरु से स्थित हुए जलों को अर्थात् जिन का सप्तसिन्धु नाम है, आकर्षणशक्ति से धारण करता है, वैसे सब विद्वान् लोग विद्या और धर्म से सब प्रजा को धारण करके सबको आनन्द में रक्खें॥८॥

पुन: स किं करोतीत्युपदिश्यते॥

फिर वह क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है। 

शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

ऋग्वेद 1.35.7

 ति॒स्रो द्यावः सवितुर्दा उपस्था एका य॒मस्य॒ भुव॑ने विराषाट्।

आणि न रथ्य॑म॒मृताधि तस्थुरिह ब्रवीतु य उ तच्चिकैतत्॥६॥

ति॒िस्रः। द्यावः। सवितुः। द्वौ। उपऽस्था। एका। यमस्य। भुवने। विराषाट्। आणिम्। न। रथ्य॑म्। अमृता। अधि। तस्थुः। इह। ब्रवीतु। यः। ऊँ इति। तत्। चिकैतत्॥६॥

पदार्थ:-(तिस्रः) त्रित्वसंख्याकाः (द्यावः) सूर्याग्निविधुदूपाः (सवितुः) सूर्यलोकस्य (द्वौ) स्वप्रकाशभूगोलौ (उपस्था) उपतिष्ठन्ति यस्मिँस्तत्र। अत्र आडयाजयाराणां चोपसङ्ख्यानम्। (अष्टा० वा०७.१.३९) इति वार्त्तिकेन : स्थाने आङादेशः। आडोऽनुनासिकश्छन्दसि। (अष्टा०६.१.१२६) इति प्रकृतिभावादसंधिः। (एका) विद्युदाख्यदीप्तिः (यमस्य) वायोः (भुवने) अन्तरिक्षस्थाने (विराषाट्) वीरान् ज्ञानवतः प्राप्तिशीलान् जीवान् सहते सः। अत्र वर्णव्यत्ययेन दीर्घकारस्य स्थाने ह्रस्वकारोऽकारस्थान आकारश्च स्फायितञ्चि० (उणा०२.१३) इत्यजधातोरक् प्रत्ययः। छन्दसि सहः। (अष्टा०३.२.६३) इति ण्विः। सहेः साढः सः। (अष्टा०८.३.५६) इति षत्वम् (आणिम्) संग्रामम्। आणाविति संग्रामनामसु पठितम्। (निघं०२.१७) (न) इव (रथ्यम्) रथान् वहति तम् (अमृता) अमृतानि (अधि) उपरिभावे (तस्थुः) तिष्ठन्ति। अत्र लडथै लिट। (इह) अस्मिन् संसारेऽस्यां विद्यायां वा (ब्रवीतु) उपदिशतु (यः) मनुष्यः (ॐ) वितर्के (तत्) ज्ञानम् (चिकेतत्) विजानीयात्अयं कितज्ञाने धातोर्लेट प्रथमैकवचनप्रयोगः । बहुलं छन्दसि इति शप: श्लुः ॥६॥

अन्वयः-हे विव॑स्त्वं रथ्यमाणिं भृत्यानेवाऽस्य सवितुः सूर्यलोकस्य प्रकाशे यास्तिस्रो द्यावोऽधितस्थुस्तत्र द्वौ सवितृमण्डलस्योपस्था वर्तेते। एका विराषाट विद्युदाख्या दीप्तिर्यमस्य नियन्तुर्वायोर्भुवनेऽन्तरिक्षे हि तिष्ठति। यान्यमृता कारणरूपेण नाशरहितानि चन्द्रतारकादीनि भुवनानि सन्ति तान्यन्तरिक्षेऽधितस्थुरधितिष्ठन्ति य उ एतानि चिकेतत् जानीयात् स तज्ज्ञानं ब्रवीतु तथा भूत्वेमां विद्यामुपादिश॥६॥

भावार्थ:-अत्रोपमालङ्कारः। ईश्वरेण या अग्न्याख्यात् कारणात् तिस्रो दीप्तयः सूर्याग्निविद्युदाख्या रचिताः सन्ति, तद्वारा सर्वाणि कार्याणि सिध्यन्ति। यदा ये जीवाः। शरीराणि त्यक्त्वा यस्य यमस्य स्थानं गच्छन्ति स कोऽस्तीति पृच्छयते। अत्रोत्तरमन्तरिक्षस्थं वायुं यमाख्यं गच्छन्तीति ब्रूयात्। यथा युद्धे रथस्य भृत्यादीन्यङ्गान्युपतिष्ठन्ति। तथैव मृता जीविताश्च जीवा वायुमाश्रित्य तिष्ठन्ति। पृथिवीचन्द्रतारकादयो लोकाः सूर्यप्रकाशमुपाश्रित्य वर्तन्ते। यो विद्वान् स एव प्रश्नोत्तराणि वदेन्नेतरो मूढः। नैव मनुष्यैरविद्वत्कथने विश्वसितव्यं न किलाप्तशब्दऽ श्रद्धातव्यं चेति॥६॥

पदार्थ:-हे विद्वान्! तू (रथ्यम्) रथ आदि के चलाने योग्य (आणिम्) संग्राम को जीतने वाले राजभृत्यों के (न) समान इस (सवितुः) सूर्यलोक के प्रकाश में जो (तिस्रः) तीन अर्थात् (द्यावः) सूर्य, अग्नि और विद्युत् रूप के साधनों से युक्त (अधितस्थुः) स्थित होते हैं उनमें से (द्वौ) दो प्रकाश वा भूगोल सूर्य मण्डल के (उपस्था) समीप में रहते हैं और (एका) एक (विराषाट्) शूरवीर ज्ञानवान् प्राप्ति स्वभाव वाले जीवों को सहने वाली बिजुली रूप दीप्ति (यमस्य) नियम करने वाले वायु के (भुवने) अन्तरिक्ष में ही रहती है और जो (अमृता) कारणरूप से नाशरहित चन्द्र, तारे आदि लोक हैं, वे इस सूर्य लोक के प्रकाश में प्रकाशित होकर (अधितस्थुः) स्थित होते हैं (यः) जो मनुष्य (ॐ) वाद-विवाद से इनको (चिकेतत्) जाने और इस ज्ञान को (ब्रवीतु) अच्छे प्रकार उपदेश करे, उसी के समान हो के हम को सद्गुणों का उपदेश किया कर॥६॥

भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिस ईश्वर ने अग्निरूप कारण से सूर्य अग्नि और बिजुली रूप तीन प्रकार की दीप्ति रची है, जिनके द्वारा सब कार्य सिद्ध होते हैं। जब कोई ऐसा पूछे कि जीव अपने शरीरों को छोड़ के जिस यम के स्थान को प्राप्त होते हैं, वह कौन है, तब उत्तर देने वाला अन्तरिक्ष में रहने वाले वायु को प्राप्त होते हैं, ऐसा कहे। जैसे युद्ध में रथ, भृत्य आदि सेना के अङ्गों में स्थित होते हैं, वैसे मरे और जीते हुए जीव वायु के अवलम्ब से स्थित होते हैं। पृथिवी चन्द्रमा और नक्षत्रादि लोक सूर्य प्रकाश के आश्रय से स्थित होते हैं, जो विद्वान् हो, वही प्रश्नों के उत्तर कह सकता है, मूर्ख नहीं। इसलिये मनुष्यों को मूर्ख अर्थात् अनाप्तों के कहने में विश्वास और विद्वानों के कथन में अश्रद्धा कभी न करनी चाहिये॥६॥

पुनरस्य सूर्यलोकस्य गुणा उपदिश्यन्ते॥

फिर इस सूर्यलोक के गुणों का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

ऋग्वेद 1.35.6

 Vति॒स्रो द्यावः सवितुर्दा उपस्था एका य॒मस्य॒ भुव॑ने विराषाट्।

आणि न रथ्य॑म॒मृताधि तस्थुरिह ब्रवीतु य उ तच्चिकैतत्॥६॥

ति॒िस्रः। द्यावः। सवितुः। द्वौ। उपऽस्था। एका। यमस्य। भुवने। विराषाट्। आणिम्। न। रथ्य॑म्। अमृता। अधि। तस्थुः। इह। ब्रवीतु। यः। ऊँ इति। तत्। चिकैतत्॥६॥

पदार्थ:-(तिस्रः) त्रित्वसंख्याकाः (द्यावः) सूर्याग्निविधुदूपाः (सवितुः) सूर्यलोकस्य (द्वौ) स्वप्रकाशभूगोलौ (उपस्था) उपतिष्ठन्ति यस्मिँस्तत्र। अत्र आडयाजयाराणां चोपसङ्ख्यानम्। (अष्टा० वा०७.१.३९) इति वार्त्तिकेन : स्थाने आङादेशः। आडोऽनुनासिकश्छन्दसि। (अष्टा०६.१.१२६) इति प्रकृतिभावादसंधिः। (एका) विद्युदाख्यदीप्तिः (यमस्य) वायोः (भुवने) अन्तरिक्षस्थाने (विराषाट्) वीरान् ज्ञानवतः प्राप्तिशीलान् जीवान् सहते सः। अत्र वर्णव्यत्ययेन दीर्घकारस्य स्थाने ह्रस्वकारोऽकारस्थान आकारश्च स्फायितञ्चि० (उणा०२.१३) इत्यजधातोरक् प्रत्ययः। छन्दसि सहः। (अष्टा०३.२.६३) इति ण्विः। सहेः साढः सः। (अष्टा०८.३.५६) इति षत्वम् (आणिम्) संग्रामम्। आणाविति संग्रामनामसु पठितम्। (निघं०२.१७) (न) इव (रथ्यम्) रथान् वहति तम् (अमृता) अमृतानि (अधि) उपरिभावे (तस्थुः) तिष्ठन्ति। अत्र लडथै लिट। (इह) अस्मिन् संसारेऽस्यां विद्यायां वा (ब्रवीतु) उपदिशतु (यः) मनुष्यः (ॐ) वितर्के (तत्) ज्ञानम् (चिकेतत्) विजानीयात्अयं कितज्ञाने धातोर्लेट प्रथमैकवचनप्रयोगः । बहुलं छन्दसि इति शप: श्लुः ॥६॥

अन्वयः-हे विव॑स्त्वं रथ्यमाणिं भृत्यानेवाऽस्य सवितुः सूर्यलोकस्य प्रकाशे यास्तिस्रो द्यावोऽधितस्थुस्तत्र द्वौ सवितृमण्डलस्योपस्था वर्तेते। एका विराषाट विद्युदाख्या दीप्तिर्यमस्य नियन्तुर्वायोर्भुवनेऽन्तरिक्षे हि तिष्ठति। यान्यमृता कारणरूपेण नाशरहितानि चन्द्रतारकादीनि भुवनानि सन्ति तान्यन्तरिक्षेऽधितस्थुरधितिष्ठन्ति य उ एतानि चिकेतत् जानीयात् स तज्ज्ञानं ब्रवीतु तथा भूत्वेमां विद्यामुपादिश॥६॥

भावार्थ:-अत्रोपमालङ्कारः। ईश्वरेण या अग्न्याख्यात् कारणात् तिस्रो दीप्तयः सूर्याग्निविद्युदाख्या रचिताः सन्ति, तद्वारा सर्वाणि कार्याणि सिध्यन्ति। यदा ये जीवाः। शरीराणि त्यक्त्वा यस्य यमस्य स्थानं गच्छन्ति स कोऽस्तीति पृच्छयते। अत्रोत्तरमन्तरिक्षस्थं वायुं यमाख्यं गच्छन्तीति ब्रूयात्। यथा युद्धे रथस्य भृत्यादीन्यङ्गान्युपतिष्ठन्ति। तथैव मृता जीविताश्च जीवा वायुमाश्रित्य तिष्ठन्ति। पृथिवीचन्द्रतारकादयो लोकाः सूर्यप्रकाशमुपाश्रित्य वर्तन्ते। यो विद्वान् स एव प्रश्नोत्तराणि वदेन्नेतरो मूढः। नैव मनुष्यैरविद्वत्कथने विश्वसितव्यं न किलाप्तशब्दऽ श्रद्धातव्यं चेति॥६॥

पदार्थ:-हे विद्वान्! तू (रथ्यम्) रथ आदि के चलाने योग्य (आणिम्) संग्राम को जीतने वाले राजभृत्यों के (न) समान इस (सवितुः) सूर्यलोक के प्रकाश में जो (तिस्रः) तीन अर्थात् (द्यावः) सूर्य, अग्नि और विद्युत् रूप के साधनों से युक्त (अधितस्थुः) स्थित होते हैं उनमें से (द्वौ) दो प्रकाश वा भूगोल सूर्य मण्डल के (उपस्था) समीप में रहते हैं और (एका) एक (विराषाट्) शूरवीर ज्ञानवान् प्राप्ति स्वभाव वाले जीवों को सहने वाली बिजुली रूप दीप्ति (यमस्य) नियम करने वाले वायु के (भुवने) अन्तरिक्ष में ही रहती है और जो (अमृता) कारणरूप से नाशरहित चन्द्र, तारे आदि लोक हैं, वे इस सूर्य लोक के प्रकाश में प्रकाशित होकर (अधितस्थुः) स्थित होते हैं (यः) जो मनुष्य (ॐ) वाद-विवाद से इनको (चिकेतत्) जाने और इस ज्ञान को (ब्रवीतु) अच्छे प्रकार उपदेश करे, उसी के समान हो के हम को सद्गुणों का उपदेश किया कर॥६॥

भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिस ईश्वर ने अग्निरूप कारण से सूर्य अग्नि और बिजुली रूप तीन प्रकार की दीप्ति रची है, जिनके द्वारा सब कार्य सिद्ध होते हैं। जब कोई ऐसा पूछे कि जीव अपने शरीरों को छोड़ के जिस यम के स्थान को प्राप्त होते हैं, वह कौन है, तब उत्तर देने वाला अन्तरिक्ष में रहने वाले वायु को प्राप्त होते हैं, ऐसा कहे। जैसे युद्ध में रथ, भृत्य आदि सेना के अङ्गों में स्थित होते हैं, वैसे मरे और जीते हुए जीव वायु के अवलम्ब से स्थित होते हैं। पृथिवी चन्द्रमा और नक्षत्रादि लोक सूर्य प्रकाश के आश्रय से स्थित होते हैं, जो विद्वान् हो, वही प्रश्नों के उत्तर कह सकता है, मूर्ख नहीं। इसलिये मनुष्यों को मूर्ख अर्थात् अनाप्तों के कहने में विश्वास और विद्वानों के कथन में अश्रद्धा कभी न करनी चाहिये॥६॥

पुनरस्य सूर्यलोकस्य गुणा उपदिश्यन्ते॥

फिर इस सूर्यलोक के गुणों का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

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