सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

ऋग्वेद 1.35.10

 ये ते पाः सवितः पूर्व्यासोऽरेणवः सुकृता अन्तरिक्ष।

तेभिर्नो अद्य पथिभिः सुगेभी रक्षा च नो अधिं च ब्रूहि देव॥११॥७॥७॥

ये। ते। पन्थाः। सवितरित। पूर्व्यासः। अरेणवः। सुऽकृताः। अन्तरिक्ष। तेभिः। नःअद्यपृथिऽभिःसुऽगेभिः। रक्षा च। नः। अधि। च। ब्रूहि। देव।। ११॥ ___

पदार्थ:-(ये) वक्ष्यमाणाः (ते) तव (पन्थाः) धर्ममार्गाः। अत्र सुपां सुलुग्० इति जसः स्थाने सुः। (सवितः) सकलजगदुत्पादकेश्वर (पूर्व्यासः) पूर्वैः कृता साधिता: सेविताश्च। अत्र पूर्वेः कृतमिनियौ च। (अष्टा० ४.४.१३३) इति पूर्वशब्दाद्यः प्रत्ययः। आज्जसेरसुग् (अष्टा०७.१.५०) इत्यस्सुगागमश्च। (अरेणवः) अविद्यमाना रेणवो धूल्यंशा इव विघ्ना येषु ते। अजिबूरी० (उणा०३.३७) इति रीधातोर्णः प्रत्ययः। (सुकृताः) सुष्टु निर्मिताः (अन्तरिक्ष) स्व्याप्तिरूपे ब्रह्माण्डे (तेभिः) तैः (न:) अस्मान् (अद्य) अस्मिन्नहनि (पथिभिः) उक्तमार्गः (सुगेभिः) सुखेन गच्छन्ति येषु तैःसुदुरोरधिकरणे० (अष्टा०३.२.४८) इति वार्त्तिकेन सूपपदाद् गमधातोर्डः प्रत्ययः (रक्ष) पालय। अत्र द्वयचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (च) समुच्चये (नः) अस्मभ्यम् (अधि) ईश्वरार्थ उपरिभावे (च) अपि (ब्रूहि) उपदिश (देव) सर्वसुखप्रदातरीश्वर।।११॥

अन्वयः-हे सवितर्देव जगदीश्वर! त्वं कृपया ये ते तवारेणवः पूर्व्यासः सुकृताः पन्थानोऽन्तरिक्षे स्वव्याप्तिरूपे वर्तन्ते, तेभिः सुगेभिः पथिभिर्नोऽस्माना रक्ष च नोऽस्मभ्यं सर्वा विद्या अधिबेहि च।।११॥

भावार्थ:-हे ईश्वर! त्वया ये सूर्यादिलोकानां भ्रमणार्था मार्गा प्राणिसुखाय च धर्ममार्गा अन्तरिक्षे स्वमहिम्नि च रचितास्तेष्विमे यथानियमं भ्रमन्ति विचरन्ति च तान् सर्वेषां पदार्थानां मार्गान् गुणांश्चास्मभ्यं ब्रूहि। येन वयं कदाचिदितस्ततो न भ्रमेमेति॥११॥

अस्मिन् सूक्ते सूर्यलोकेश्वरवायुगुणानां प्रतिपादनाच्चतुस्त्रिंशसूक्तोक्तार्थेन सङ्गतिरस्तीति वेदितव्यम्।

इति सप्तमो ७ वर्ग:, अनुवाकः पञ्चत्रिंशं ३५ सूक्तं च समाप्तम्॥

पदार्थ:-हे (सवितः) सकल जगत् के रचने और (देव) सब सुख देने वाले जगदीश्वर! (ये) जो (ते) आपके (अरेणवः) जिनमें कुछ भी धूलि के अंशों के समान विघ्नरूप मल नहीं हैं तथा (पूर्व्यास:) जो हमारी अपेक्षा से प्राचीनों ने सिद्ध और सेवन किये हैं (सुकृताः) अच्छे प्रकार सिद्ध किये हुए (पन्थाः) मार्ग (अन्तरिक्ष) अपने व्यापकता रूप ब्रह्माण्ड में वर्तमान हैं (तेभिः) उन (सुगेभिः) सुखपूर्वक सेवने योग्य (पथिभिः) मार्गों से (न:) हम लोगों की (अद्य) आज (रक्ष) रक्षा कीजिये (च) और (न:) हम लोगों के लिये सब विद्याओं का (अधिब्रूहि) उपदेश (च) भी कीजिये।।११।

भावार्थ:-हे ईश्वर ! आपने जो सूर्य आदि लोकों के घूमने और प्राणियों के सुख के लिये आकाश वा अपने महिमारूप संसार में शुद्ध मार्ग रचे हैं, जिनमें सूर्यादि लोक यथानियम से घूमते और सब प्राणी विचरते हैं, उन सब पदार्थों के मार्गों तथा गुणों का उपदेश कीजिये कि जिससे हम लोग इधर-उधर चलायमान न होवें।।११॥

इस सूक्त में सूर्यलोक वायु और ईश्वर के गुणों का प्रतिपादन करने से चौंतीसवें सूक्त के साथ इस सूक्त की सङ्गति जाननी चाहिये।

यह सातवां वर्ग ७ सातवां अनुवाक ७ और पैंतीसवां सूक्त समाप्त हुआ॥ ३५॥

Featured Post

ऋग्वेद 1.37.7-जो राजा वायु के समान शीघ्र दण्ड देता है, उसको तुम पिता के समान जानो !

नि वो यामाय मानुषो ध्र प्राय॑ म॒न्यवै जिहीत पर्वतो गिरिः॥७॥ निवः। यामाया मानुषः। दु उग्राय। मन्यवैजिहीत। पर्वतःगिरिः॥७॥ पदार्थः-(नि) निश्चया...