ऋग्वेद 1.36.1

 अथ विशत्यूचस्य षट्त्रिंशस्य सूक्तस्य घौर: काण्वऋषिः। अग्निर्देवता। १, १२ भुरिगनुष्टप्

छन्दः। गान्धारः स्वरः। २ नित्सतः पङ्क्तिः। ४ निवृत्पङ्क्तिः। १०,१४ निद्विष्टारपङ्क्तिः।

१८ विष्टारपङ्क्तिः । २० सतः पङ्क्तिश्छन्दः। पञ्चमः स्वरः। ३,११ निवृत्पथ्याबृहती। ५,१६

निबृहती। ६ भुरिग् बृहती। ७ बृहती। ८ स्वराड् बृहती। ९ निचूदुपरिष्टाद् बृहती। १२ उपरिष्टाद् बृहती१५ विराट् पथ्या बृहती। १७ विराडुपरिष्टाद् बृहती। १९ पथ्याबृहती च

__ छन्दः। मध्यमः स्वरः॥

तत्रादावग्निशब्देनेश्वरगुणा उपदिश्यन्ते।

अब छत्तीसवें सूक्त का आरम्भ है उसके पहिले मन्त्र में अग्नि शब्द से ईश्वर के गुणों का उपदेश किया है

प्र वो यह्व पुरूणां विशां देवय॒तीनाम्।

अग्निं सूक्तेभिर्वचौभिरीमहे यं सीमिदन्य ईळते॥१॥

प्रा वः। यह्वम्। पुरूणाम्। विशाम्। देवऽयतीनाम्। अग्निम्सुऽउक्तेभिः। वच:ऽभिः। ईमहे। यम्। सीम्। इत्। अन्ये। ईळते॥ १॥

पदार्थ:-(प्र) प्रकृष्टार्थे (वः) युष्माकम् (यह्वम्) गुणैर्महान्तम्। यह इति महन्नामसु पठितम्। (निघं०३.३) (पुरूणाम्) बह्वीनाम् (विशाम्) प्रजानां मध्ये (देवयतीनाम्) आत्मनो देवान् दिव्यान् भोगान् गुणांश्चेच्छन्तीनाम् (अग्निम्) परमेश्वरम् (सूक्तेभिः) सुष्टुक्ता विद्या येषु तैः (वचोभिः) वेदार्थज्ञानयुक्तैर्वचनैः (ईमहे) याचामहेअत्र बहुलं छन्दसि इति श्यनो लुक्। ईमह इति याञ्चाकर्मसु पठितम्। (निघं०३.१९) (यम्) उक्तम् (सीम्) सर्वतः। प्र सीमादित्यो असृजत्। (ऋ०२.२८.४) प्रासृजदिति वा। प्रासृजत् सर्वत इति वा। (निरु०१.७) इति सीमव्ययं सर्वार्थ गृह्यते। (इत्) एव (अन्ये) परोपकारका बुद्धिमन्तो धार्मिका विद्वांसः (ईळते) स्तुवन्ति॥१॥

अन्वयः-वयं यथान्ये विद्वांसः सूक्तेभिर्वचोभिर्देवयतीनां पुरूणां वो युष्माकं विशां प्रजानां सुखाय यं यह्वमग्निं सीमीडते तथा तमिदेव प्रेमहे प्रकृष्टतया याचामहे प्रकाशयामश्च।।१।।

भावार्थ:-अत्र वाचकलुप्तोमालङ्कारः। हे मनुष्या! यूयं यथा विद्वांसः प्रजासुखसम्पत्तये सर्वव्यापिनं परमेश्वरं निश्चित्योपदिश्य च तद्गुणान् प्रयत्नेन विज्ञापयन्ति स्तावयन्ति, तथैव वयमपि प्रकाशयामःयथेश्वरोऽग्न्यादिपदार्थरचनपालनाभ्यां जीवेषु सर्वाणि सुखानि दधाति तथा वयमपि सर्वप्राणिसुखानि सदा निर्वर्त्तयेमेति बुध्यध्वम्॥१॥ __

पदार्थः-हम लोग जैसे (अन्ये) अन्य परोपकारी धर्मात्मा विद्वान् लोग (सूक्तेभिः) जिनमें अच्छे प्रकार विद्या कही है, उन (वचोभिः) वेद के अर्थज्ञानयुक्त वचनों से (देवयतीनाम्) अपने लियेदिव्यभोग वा दिव्यगुणों की इच्छा करने वाले (पुरूणाम्) बहुत (व:) तुम (विशाम्) प्रजा लोगों के सुख के लिये (यम्) जिस (यह्वम्) अनन्तगुण युक्त (अग्निम्) परमेश्वर की (सीम्+ईडते) सब प्रकार स्तुति करते हैं, वैसे उस (इत्) ही की (प्रेमहे) अच्छे प्रकार याचना और गुणों का प्रकाश करें॥१॥

भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जैसे तुम लोग पूर्ण विद्यायुक्त विद्वान् लोग प्रजा के सुख की सम्पत्ति के लिये सर्वव्यापी परमेश्वर का निश्चय तथा उपदेश करके प्रयत्न से जानते हैं, वैसे ही हम लोग भी उसके गुण प्रकाशित करें। जैसे ईश्वर अग्नि आदि पदार्थों के रचन और पालन से जीवों में सब सुखों को धारण करता है, वैसे हम लोग भी प्राणियों के लिये सदा सुख वा विद्या को सिद्ध करते रहें, ऐसा जानो॥१॥

पुन: स एवार्थ उपदिश्यते॥

फिर भी अगले मन्त्र में उक्त विषय का उपदेश किया है।

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