ऋग्वेद 1.37.3

 इहेव शृण्व एषां कशा हस्तेषु यद्वान्।

नि यामचित्रम॒ञ्जते॥३॥

दुहऽईवा शृण्व। एषाम्। कशाः। हस्तेषु। यत्। वान्। नि। याम॑न्। चित्रम्। ऋञ्जते॥३॥

पदार्थः-(इहेव) यथाऽस्मिन् स्थाने स्थित्वा तथा (शृण्वे) शृणोमि। अत्र व्यत्ययेनात्मनेपदम्। (एषाम्) वायूनाम् (कशाः) चेष्टासाधनरज्जुवन्नियमप्रापिकाः क्रियाः (हस्तेषु) हस्ताद्यङ्गेषुबहुवचनादङ्गानीति ग्राह्यम्। (यत्) व्यावाहारिकं वचः (वदान्) वदेयुः (नि) नितराम् (यामन्) यान्तिप्राप्नुवन्ति सुखहेतुपदार्थान् यस्मिंस्तस्मिन् मार्गे। अत्र सुपां सुलुग्० इति डेर्लुक्। (चित्रम्) अद्भुतं कर्म (ऋञ्जते) प्रसाध्नोति। ऋञ्जतिः प्रसाधनकर्मा। (निरु०६.२१)॥३॥ ___

अन्वयः-अहं यदेषां वायूनां कशा हस्तेषु सन्ति प्राणिनो वदान् वदेयुस्तदिहेव शृण्वे सर्वः प्राण्यप्राणी यद्यामन् यामनि चित्रं कर्म न्य॒ञ्जते तदहमपि कर्तुं शक्नोमि।।३।।

भावार्थ:-अत्रोपमालङ्कारःपदार्थविद्यामभीप्सुभिर्विद्वद्भिर्यानि कर्माणि जडचेतनाः पदार्थाः कुर्वन्ति, तद्वेतवो वायवः सन्ति। यदि वायुर्न स्यात्तर्हि कश्चित् किञ्चदपि कर्म कर्तुं न शक्नुयात्दूरस्थेनोच्चारिताञ्छब्दान् समीपस्थानिव वाचेष्टामन्तरेण कश्चिदपि श्रोतुं वक्तुं च न प्रभवेत्। वीरा युद्धादिकार्येषु यावन्तो बलपराक्रमो कुर्वन्ति, तावत्तौ सर्वो वायुयोगादेव भवतः। न तेन विना नेत्रस्पन्दनमपि कर्तुं शक्यमतोऽस्य सर्वदेव शुभगुणाः सर्वैः सदान्चेष्टव्याः॥३॥

मोक्षमूलरोक्तिः। अहं सारथिना कशाशब्दाञ्च्छृणोमि। अतिनिकटे हस्तेषु तान् प्रहरन्ति ते स्वमार्गेष्वतिशोभां प्राप्नुवन्ति। यामन्निति मार्गस्य नाम येन मार्गेण देवा गच्छन्ति यस्मान् मार्गाद् बलिदानानि प्राप्नुवन्ति। यथास्माकं प्रकरणे मेघावयवानामपि ग्रहणं भवतीत्यशुद्धास्ति। कुतः? अत्र कशाशब्देन वायुहेतुकानां क्रियाणां ग्रहणाद् यामन्निति शब्देन सर्वव्यवहारसुखप्रापिकस्य कर्मणो ग्रहणाच्च॥३॥ __

पदार्थ:-मैं (यत्) जिस कारण (एषाम्) इन पवनों की (कशा:) रज्जु के समान चेष्टा के साधन नियमों को प्राप्त कराने वाली क्रिया (हस्तेषु) हस्त आदि अङ्गो में हैं, इससे सब चेष्टा और जिससे प्राणी व्यवहार सम्बन्धी वचन को (वदान्) बोलते हैं, उसको (इहेव) जैसे इस स्थान में स्थित होकर वैसे करता और (शृण्वे) श्रवण करता हूं और जिससे सब प्राणी और अप्राणी (यामन्) सुख हेतु व्यवहारों के प्राप्त कराने वाले मार्ग में (चित्रम्) आश्चर्य्यरूप कर्म को (न्यूञ्जते) निरन्तर सिद्ध करते हैं, उसके करने को समर्थ उसी से मैं भी होता हूं॥३॥ ___

भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। वायु, पदार्थ-विद्या की इच्छा करने वाले विद्वानों को चाहिये कि मनुष्य आदि प्राणी जितने कर्म करते हैं, उन सभी के हेतु पवन हैं। जो वायु न हों तो कोई मनुष्य कुछ भी कर्म करने को समर्थ न हो सके और दूरस्थित मनुष्य ने उच्चारण किये हुए शब्द निकट के उच्चारण के समान, वायु की चेष्टा के विना, कोई भी कह वा सुन न सके और मनुष्य मार्ग में चलने आदि जितने बल वा पराक्रमयुक्त कर्म करते हैं, वे सब वायु ही के योग से होते हैं। इससे यह सिद्ध है कि वायु के बिना कोई नेत्र के चलाने को भी समर्थ नहीं हो सकता, इसलिये इसके शुभगुणों का खोज सर्वदा किया करें।॥३॥

___मोक्षमूलर साहिब कहते हैं कि मैं सारथियों के कशा अर्थात् चाबुक के शब्दों को सुनता हूं तथा अति समीप हाथों में उन पवनों को प्रहार करते हैं, वे अपने मार्ग में अत्यन्त शोभा को प्राप्त होते हैं और'यामन्' यह मार्ग का नाम है, जिस मार्ग से देव जाते हैं वा जिस मार्ग से बलिदानों को प्राप्त होते हैं, जैसे हम लोगों के प्रकरण में मेघ के अवयवों का भी ग्रहण होता है। यह सब अशुद्ध है, क्योंकि इस मन्त्र में 'कशा' शब्द से सब क्रिया और 'यामन्' शब्द से मार्ग में सब व्यवहार प्राप्त करने वाले कर्मों का ग्रहण है॥३॥

पुनरेते वायोः कस्मै प्रयोजनाय किं कुर्युरित्युपदिश्यते।

फिर वे विद्वान् लोग वायु से किस-किस प्रयोजन के लिये क्या-क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

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