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ऋग्वेद 1.36.4

 देवासस्त्वा वरुणो मित्रो अर्यमा सं दूतं प्रत्नमिधते।

विश्वं सो अग्ने जयति त्वया धनं यस्तै ददाश मर्त्यः॥४॥

दे॒वासः। त्वा। वरुणः। मित्रः। अर्यमा। सम्। दूतम्। प्र॒त्नम्। दृद्धते। विश्वम्। सः। अग्ने। जयति। त्वया। धनम्। यः। ते। ददाशा मर्त्यः॥४॥

पदार्थ:-(देवासः) सभ्या विद्वांसः (त्वा) त्वाम् (वरुणः) उत्कृष्टः (मित्रः) मित्रवत्प्राणप्रदः (अर्यमा) न्यायकारी (सम्) सम्यगर्थे (दूतम्) यो दुनोति सामादिभिः शत॒स्तम्। दुतनिभ्यां दीर्घश्च। (उणा०३.८८)। (प्रत्नम्) कारणरूपेणानादिम्। नश्च पुराणे प्रादूक्तव्याः। (अष्टा०५.४.३०) इति पुराणार्थे प्रशब्दात् तनप् प्रत्ययः। (इग्धते) शुभगुणैः प्रकाशन्ते (विश्वम्) सर्वम् (सः) (अग्ने) धर्मविद्या श्रेष्ठगुणैः प्रकाशमानसभापते (जयति) उत्कर्षयति (त्वया) (धनम्) विद्यासुवर्णादिकम् (यः) (ते) तव (ददाश) दाशति। अत्र लडथै लिट। (मर्त्यः) मनुष्यः।।४।।

अन्वयः-हे अग्ने सभेश! यस्ते दूतो मा धनं ददाश यस्त्वया सह शत्रूञ्जयति मित्रो वरुणोऽर्यमा देवासो यं दूतं समिन्धते यस्त्वा त्वां प्रजाञ्च प्रीणाति स प्रत्नं विश्वं राज्यं रक्षितुमर्हति॥४॥

भावार्थ:-नहि केचिदपि सर्वशास्त्रविशारदै राजधर्मवित्तमैः परावरज्ञैर्धार्मिकै: प्रगल्भैः शूरैर्दूतैः सराजभिः सभासद्भिश्च विना राज्यं लब्धं रक्षितुमुन्नेतुमुपकर्तुं शक्नुवन्ति तस्मादेवमेव सर्वैः सदा विधेयमिति॥४॥

पदार्थ:-हे (अग्ने) धर्म विद्या श्रेष्ठ गुणों से प्रकाशमान सभापते! (यः) जो (ते) तेरा (दूतः) दूत (मर्त्यः) मनुष्य तेरे लिये (धनम्) विद्या, राज्य, सुवर्णादि श्री को (ददाश) देता है तथा जो (त्वया) तेरे साथ शत्रुओं को (जयति) जीतता है (मित्रः) सबका सुहृद् (वरुणः) सब से उत्तम (अर्यमा) न्यायकारी (देवासः) ये सब सभ्य विद्वान् मनुष्य जिसको (समिन्धते) अच्छे प्रकार प्रशंसित जान कर स्वीकार के लिये शुभगुणों से प्रकाशित करें जो (त्वा) तुझ और सब प्रजाको प्रसन्न रक्खे (सः) वह दूत (प्रत्नम्) जो कि कारणरूप से अनादि है (विश्वम्) सब राज्य को सुरक्षित रखने को योग्य होता है।॥४॥

भावार्थ:-कोई भी मनुष्य सब शास्त्रों में प्रवीण, राजधर्म को ठीक-ठीक जानने, पर-अपर इतिहासों के वेत्ता, धर्मात्मा, निर्भयता से सब विषयों के वक्ता, शूरवीर, दूतों और उत्तम राजा सहित सभासदों के विना राज्य को पाने, पालने, बढ़ाने और परोपकार में लगाने को समर्थ नहीं हो सकते, इससे पूर्वोक्त प्रकार ही से राज्य की प्राप्ति आदि का विधान सब लोग सदा किया करें।॥४॥

__पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते॥

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।