ऋग्वेद.1.36.9

 सं सीदस्व महाँ असि शोचस्व देववीतमः।

वि धूममग्ने अरुषं मियेध्य सृज प्रशस्त दर्शतम्॥९॥

सम्। सीदस्व। महान्। असि। शोचस्वा देवऽवीतमः। वि। धूमम्। अग्ने। अरुषम्। मियेध्या सृज। प्रऽशस्त। दर्शतम्॥९॥

पदार्थ:-(सम्) सम्यगर्थे (सीदस्व) दोषान् हिन्धि। व्यत्येनात्रत्मनेपदम् (महान्) महागुणविशिष्टः (असि) वर्त्तसे (देववीतमः) देवान् पृथिव्यादीन् वेत्ति व्याप्नोति (शोचस्व) प्रकाशस्वशुचिदीप्तावित्यस्माल्लोट् (देववीतमः) यो देवान् विदुषो व्याप्नोति सोऽतिशयतः (वि) (धूमम्) धूमसदृशमलरहितम् (अग्ने) तेजस्विन् सभापते (अरुषम्) सुन्दररूपयुक्तम्। अरुषमिति रूपनामसु पठितम्। (निघं०३.७) (मियेध्य) मेधार्ह। अयं प्रयोगः पृषोदरादिना अभीष्टः सिद्धयति। (सृज) (प्रशस्त) प्रशंसनीय (दर्शतम्) द्रष्टुमर्हम्॥९॥

अन्वयः-हे तेजस्विन् मियेध्याग्ने सभापते! यस्त्वं महानसि स सभापते देववीतमः सन्न्याये संसीदस्व शोचस्व। हे प्रशस्त राज॑स्त्वमत्र विधूमं दर्शतमरुषं सृजोत्पादय॥९॥

भावार्थ:-मेधाविनो राजपुरुषा अग्निवत् तेजस्विनो महागुणाढ्या भूत्वा दिव्यगुणानां पृथिव्यादिभूतानां तत्त्वं विज्ञाय प्रकाशमानाः सन्तो निर्मलं दर्शनीयं रूपमुत्पादयेयुः।।९।।

पदार्थ:-हे (तेजस्विन्) विद्याविनययुक्त (मियेध्य) प्राज्ञ (अग्ने) विद्वन् सभापते! जो आप (महान्) बड़े-बड़े गुणों से युक्त (असि) हैं सो (देववीतमः) विद्वानों को व्याप्त होने हारे आप न्यायधर्म में स्थित होकर (संसीदस्व) सब दोषों का नाश कीजिये और (शोचस्व) प्रकाशित हूजिये हे (प्रशस्त)प्रशंसा करने योग्य राजन्! आप (विधूमम्) धूमसदृश मल से रहित (दर्शतम्) देखने योग्य (अरुषम्) रूप को (सृज) उत्पन्न कीजिये।९।

भावार्थ:-प्रशंसित बुद्धिमान् राजपुरुषों को चाहिये कि अग्नि के समान तेजस्वि और बड़े-बड़े गुणों से युक्त हों और श्रेष्ठ गुणवाले पृथिवी आदि भूतों के तत्त्व को जान के प्रकाशमान होते हुए निर्मल देखने योग्य स्वरूपयुक्त पदार्थों को उत्पन्न करें॥९॥

___मनुष्याः कीदृशं सभेशं कुर्युरित्याह॥

मनुष्य किस प्रकार के पुरुष को सभाध्यक्ष करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।।

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