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ऋग्वेद 1.36.15

 पाहि नौ अग्ने रक्षसः पाहि धूर्तेरराव्णः।

पाहि रीषत उत वा जिघांसतो बृहद्भानो यविष्ठ्य॥१५॥१०॥

पाहि। नः। अग्ने। रक्षसः। पाहि। धूर्तेः। अराव्णः। पाहि। रिपतः। उता वा। जिघांसतः। बृहद्भानो इति बृहत्ऽभानो। यविष्ठ्य॥ १५॥

पदार्थ:-(पाहि) रक्ष (न:) अस्मान् (अग्ने) सर्वाग्रणी: सर्वाभिरक्षक (रक्षसः) महादुष्टान्मनुष्यात् (पाहि) (धूर्तेः) विश्वासघातिनः। अत्र धुर्वी धातोर्बाहुलकादाणौदिकस्तिः प्रत्ययः। (अराव्णः) राति ददाति स रावा न अरावा रावा तस्मात्कृपणाददानशीलात्। (पाहि) रक्ष (रिषतः) हिंसकाद् व्याघ्रादे: प्राणिनः। अत्रान्येषामपि दृश्यत इति दीर्घः। (उत) अपि (वा) पक्षान्तरे (जिघांसतः) हन्तुमिच्छतः शत्रोः (बृहद्भानो) बृहन्ति भानवो विद्याद्यैश्वर्यतेजांसि यस्य तत्सम्बुद्धौ (यविष्ठ्य) अतितरुणावस्थायुक्त॥१५॥

अन्वयः-हे बृहद्भानो यविष्टयाग्ने सभाध्यक्ष महाराज! त्वं धूर्तेरराव्यणो रक्षसो नः पाहि। रिषतः पापाचाराज्जनात् पाहि। उत वा जिघांसत: पाहि।।१५।।

भावार्थ:-मनुष्यैः सर्वतोभिरक्षणाय सर्वाभिरक्षको धर्मोन्नतिं चिकीर्षुदयालुः सभाध्यक्षः सदा प्रार्थनीयःस्वैरपि दुष्टस्वभावेभ्यो मनुष्यादिप्राणिभ्यः सर्वपापेभ्यश्च शरीरवचोमनोभिर्दूरे स्थातव्यं नैवं विना कश्चित्सदा सुखी भवितुमर्हति।।१५।___

पदार्थ:-हे (बृहद्भानो) बड़े-बड़े विद्यादि ऐश्वर्या के तेजवाले (यविष्ठ्य) अत्यन्त तरुणावस्थायुक्त (अग्ने) सब से मुख्य सब की रक्षा करने वाले मुख्य सभाध्यक्ष महाराज! आप (धूर्तेः) कपटी, अधर्मी (अराव्णः) दानधर्मरहित कृपण (रक्षसः) महाहिंसक दुष्ट मनुष्य से (नः) हमको (पाहि) बचाइये (रिषतः) सबको दुःख देने वाले सिंह आदि दुष्ट जीव दुष्टाचारी मनुष्य से हम को पृथक् रखिये (उत) और (वा) भी (जिघांसतः) मारने की इच्छा करते हुए शत्रु से हमारी रक्षा कीजिये।।१५॥ ___

भावार्थ:-सब मनुष्यों को चाहिये कि सब प्रकार रक्षा के लिये सर्वरक्षक धर्मोन्नति की इच्छा करने वाले सभाध्यक्ष की सर्वदा प्रार्थना करें और अपने आप भी दुष्ट स्वभाव वाले मनुष्य आदि प्राणियों और सब पापों से मन वाणी और शरीर से दूर रहें, क्योंकि इस प्रकार रहने के विना कोई मनुष्य सर्वदा सुखी नहीं रह सकता।१५॥

पुनस्तदेवाह॥

फिर भी अगले मन्त्र में उसी सभाध्यक्ष का उपदेश किया है।