शनिवार, 21 सितंबर 2019

काबे के काले पत्थर का रहस्य-हिन्दू राजा विक्रमादित्य से जुड़ा है अरब का इतिहास

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     प्रति वर्ष मक्का में हज पर काबा की परिक्रमा करने लाखों मुस्लमान आते हैं. भारत से हज जाने वालों की संख्या अब दो लाख मुस्लिम प्रति वर्ष हो गयी है | ऐसा माना जाता है कि दुनिया भर के मुसलमानों के लिए काबा मात्र एक कमरा नहीं अपितु सारी कायनात के मालिक अल्लाह का घर है. और इस काबा के एक दीवार पर संगे अस्वद नाम का एक काला पत्थर लगा हुआ है | अरब के इतिहास और भारतीयों के परम्परागत में यह स्पष्ट है कि निश्चित रूप से एक पवित्र शिवलिंग ही है. यह शिव लिंग इस्लाम के प्रारम्भ होंसे से पूर्व काबा के अन्दर प्रतिष्ठित था |


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     मुहम्मद के बाल्य जीवन की एक घटना में काबा की टूटी छत और फर्श के पुनर्निर्माण के बाद शिवलिंग को पुनः प्राण प्रतिष्ठित करने में कबीलों में विवाद हो गया कि किसके हाथों यह पुनीत कार्य हो | जिसे मुहम्मद की सलाह पर सभी सरदारों ने एक चादर में शिवलिंग को रखकर और फिर चादर के कोनों को सभी कबीलों के मुखियाओं ने पकड़ कर काबा के मध्य में स्थापित कर दिया | मुहम्मद के जीवनी कार इस घटना का उल्लेख करने का एक ही उद्देश्य बताते है कि छोटी आयु में भी मुहम्मद ने अपनी सूझबूझ से एक बड़ा धार्मिक खून खराबा टाल दिया |


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     अब अरब के मूर्तिपूजक इतिहास को स्मरण करने में कुफ़्र के भय से उस काले पत्थर को मध्य से निकाल कर काबा की एक दीवार के कोने में इसे जड़वा दिया | अपने सनातन शैव धर्म की पहचान से खुद को बिलकुल जुदा रखने वाले  उसे अन्तरिक्ष से आया एक उल्का पिंड के रूप में प्रचारित करते हैं | मुहम्मद ने मक्का पर अपना अधिकार करने के तुरंत बाद काबा से सैकड़ों मूर्तियों को खंडित कर फिंकवा दिया, किन्तु संगे असवद को मात्र स्थानांतरित कर दीवार के कोने में लगवा दिया | 


  Image result for ठ ़लॠ फ़ा हठ ़रत ठ मर मुहम्मद की मृत्यु  के दो वर्ष बाद,  तीसरे उत्तराधिकारी ख़लीफ़ा हज़रत उमर के शासनकाल (634-645 ई॰) ने इस पर विचार किया कि कहीं आगे चलकर लोग अज्ञानतावश या भावुक होकर इस काले पत्थर को, पत्थर से 'कुछ अधिक' यानी महादेव न समझने लगें, इसलिए उसने काबा में ही 'शिवलिंग' के सामने खड़े होकर कहा: ''तू एक पत्थर है, सिर्फ़ पत्थर !  हम तुझे बस इस वजह से चूमते हैं कि हमने पैग़म्बर मुहम्मद को तुझे चूमते हुए देखा था.  इससे ज़्यादा तेरी कोई हैसियत, कोई महत्व हमारे लिए नहीं है.  हमारा विश्वास है कि तू एक निर्जीव वस्तु, हमें न कोई फ़ायदा पहुंचा सकता है, न ही हानि, हम अरब वासियों का पूज्य व उपास्य होना तो दूर की बात, असंभव बात है " |
      शारदा द्वारिका व ज्योतिर्पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी और सर्वज्ञ शारदा पीठ काश्मीर के शंकराचार्य अमृतानंद देव तीर्थ जी व अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रवि शंकर जी, जैसे संत भी घोषित कर चुके है कि काबा का संगे असवद ही शिव लिंग है | यही बात सभी हिन्दू धर्मगुरु कहने लगे और भारत के मुल्ला वर्ग भी समझ जाए तो करोड़ों मुसलामानों की कट्टरता में बदलाव आएगा | शैव मत के अरबी इतिहास व परम्परा को विश्व पटल पर लाने की आवश्यकता है |  


    Image result for ठ ़लॠ फ़ा हठ ़रत ठ मरअरब में मुहम्मद पैगम्बर से पूर्व शिवलिंग को 'लाट' कहा जाता था | यह शिव लिंग जिस कमरे में था वह पूरी तरह वर्गाकार नहीं है. पूर्वी दीवार 48 फुट और 6 इंच है. हतीम की ओर दीवार 33 फुट है. काले पत्थर और येमेनी कोने के बीच का अंतर 30 फुट है. पश्चिमी दीवार 46.5 फुट है | मुस्लिम जन काबा को एक बैतुल्ला यानी अल्लाह का घर और, साथ ही  इसे अल्लाह द्वारा बनाया गया बैतूल माअमूर यानी स्वर्ग के आकार भी मानते हैं |
  इस स्थान पर पैगंबर मोहम्मद के समय से पहले कई बार निर्माण किये गए थे. मुहम्मद के जीवन काल में जब ये छोटे थे, तब एक दिन अचानक आई बाढ़ के कारण काबा क्षतिग्रस्त हो गया था और इसकी दीवारें फट गयी, और जमीन भी उबड़-खाबड़ होने के कारण पानी भी भर जाता था | इसलिए इसके पुनर्निर्माण की जरूरत आकर खड़ी हो गयी थी. यह जिम्मेदारी क़ुरैश की चार जनजातियों के बीच विभाजित की गयी. जब काबा का जीर्णोंद्धार हो गया, फिर जो शिवलिंग मध्य में स्थापित था, उसकी पुनर्प्राण प्रतिष्ठा का समय आया. तो कबीलों में युद्ध छिड़ गया. उस समय एक सुलह हुई, कि जो भी शिव भक्त अगले दिन सूर्योदय से पूर्व इस काबे में आएगा, वही इसकी प्राण प्रतिष्ठा करेगा. मुहम्मद ने सबसे पहले पहुँच कर सबको चौंका दिया | किन्तु कबीलों के सरदार इस बाद के लिए तैयार नहीं हुए कि कुरैशी खानदान का यह लड़का इस धार्मिक अनुष्ठान को करें और वे देखते रहें. फिर एक और सुलह हुई, एक चादर लेकर उसमें शिवलिंग को रखकर चारों और से चार कबीलों के सरदारों ने चादर के कोने पकड़ कर काबा में प्राण प्रतिष्ठा की. ऐसा मानते हैं कि इससे कुरैशी कबीले के बीच एक खुनी टकराव होते होते बचा |
 कुरैशी व काबा के विषय में शोध करने की आवश्यकता है |


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    पुराणों की एक कथा के आधार पर वीर सावरकर ने एक लेख लिखा | जिसमें कौरवों के भारत के पश्चिमी तट से नौका द्वारा अरब जाने का उल्लेख हुआ है |  कुरुक्षेत्र के युद्ध में पांडवों से हारने के बाद बचे हुए कौरवों को भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम ने द्वारिका से समुद्री मार्ग से अर्ब मरुस्थल में सुरक्षित स्थान में बसाया. जिस स्थान 'काबा' में आज विश्व भर से मुस्लिम लोग हज करने जाते हैं |


  Image result for शॠ ठ ॠ राठ ारॠ य दॠ तॠ य ठ ॠ रॠ द्वापर युग में उस स्थान पर गुरु शुक्राचार्य की तपस्थली 'काव्याः पीठ' थी. शुक्राचार्य के निर्देशन में निरंतर यज्ञ, मन्त्र सिद्धि व अनेक रहस्यमय देवताओं की साधना के लिए उनके शिष्यों ने उस 'काव्याः पीठ' के संरक्षण हेतु 'मुख' नाम से एक शैव ग्राम की स्थापना की | शुक्राचार्य ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की और शिव लोक से एक विशिष्ट दिव्य ज्योतिर्लिंग प्राप्त किया, जिसको देखने मात्र से सर्व कष्ट दूर हो जाते है, यह आज भी भूलवश  'काबा' के कक्ष के बाहरी दीवार के कोण में लगा हुआ, जबकि इसे कक्ष के मध्य में ही होना चाहिए |


   संग-ए -असवद अर्थात् अश्वेत  शिला खंड की विधिवत पूजा अर्चना मुख्य रूप से  कुरैशी कबीले के नियंत्रण में थी, जो कौरवों के ही वंशज हैं. इस काव्याः ज्योतिलिंग मंदिर के चारों ओर कौरव वंश और उनके राज भक्त परिवार द्वारा  बसाया हुआ 'मुख' ग्राम आज मक्का शहर के रूप में प्रसिद्ध है |
वैदिक इतिहास के विलुप्त हो चुके अनेक पन्नों में इस बात के भी अनेक प्रमाण होंगे कि दिव्य शक्ति पाने के लिए  व अमर होने के लिए संजीविनी विद्या की सिद्धि भी महादेव के श्रीचरणों में हुई होगी | यह ज्योतिर्लिंग देखने में अत्यंत विलक्षण है | 


Image result for ठ ाबा ठ ॠ  पॠ रानॠ  ठ ितॠ रशुक्राचार्य ने भगवान शिव के आशीर्वाद से प्राप्त एक विशिष्ट ज्योतिर्लिंग को अपने जिस प्रकार भीम ने दुशासन का रक्त पान किया, और सभी भाइयों का वध कर हस्तिनापुर की सत्ता पर अधिकार किया, उससे कौरव राजपरिवार की गर्भिणी स्त्रियां व बचे हुए बुजुर्ग अपमानित जीवन जीने को विवश हो गए. विजयी सेना के अनेक संकट खड़े हो गए. अर्ब ही वर्तमान का सऊदी अरब है, हिन्दू इतिहासकारों के अनुसार वर्तमान के सऊदी अरब में स्थित मक्का की काबाः में शिवलिंग था, जिसे भगवान शिव की उपासना होती थी |
Image result for सठ ठ ॠ  ठ सवदविष्य पुराण के अनुसार, "शालिवाहन  अर्थात् सात वाहन वंशी राजा भोज दिग्विजय करते हुए समुद्र पार मरुस्थल तक पहुंचे, फिर मक्का में जाकर वहां स्थित प्रसिद्ध शिव लिंग मक्केश्वर महादेव का पूजन किया था, इसका वर्णन भविष्य-पुराण में निम्न प्रकार है :-
"नृपश्चैवमहादेवं मरुस्थल निवासिनं !
गंगाजलैश्च संस्नाप्य पंचगव्य समन्विते :
चंद्नादीभीराम्भ्यचर्य तुष्टाव मनसा हरम !
इतिश्रुत्वा स्वयं देव: शब्दमाह नृपाय तं!
गन्तव्यम भोज राजेन महाकालेश्वर स्थले !! 
इसके पश्चात् वहां महादेव ने स्वयं दर्शन दिए और कहा कि यहाँ मलेच्छों के इस क्षेत्र मै कैद हूँ, यहाँ से लौट जाओ ! " इस शास्त्रीय प्रमाण हमें संकेत करते हैं, कि मुहम्मदी मत के मानने वालों से हमें निश्चित दूरी बनाकर रखनी चाहिए. इस धरती पर देवासुर संग्राम तो चलता ही आ रहा है. किसी एक नास्त्रेदमस नामक व्यक्ति की प्रसिद्ध भविष्यवाणी है कि सागर और चाँद को मानने वाले धर्म के बीच निर्णायक युद्ध होगा | इस विश्व युद्ध में सागर के नाम वाले यानी हिन्दू ही विजयी होंगे. 


    Image result for ठ ाबा ठ ॠ  पॠ रानॠ  ठ ितॠ रImage result for ठ ाबा ठ ॠ  पॠ रानॠ  ठ ितॠ रमुहम्मद और मुसलमानों के विषय में भविष्य पुराण के प्रतिसर्ग पर्व 3, अध्याय 3, खंड 3, कलियुगीयेतिहास समुच्चय में कहा गया है—
लिंड्गच्छेदी शिखाहीनः श्मश्रुधारी स दूषकः।
उच्चालापी सर्वभक्षी भविष्यति जनो मम ।25।
विना कौलं च पशवस्तेषां भक्ष्या मता मम।
मुसलेनैव संस्कारः कुशैरिव भविष्यति।26।।
तस्मान्मुसलवन्तो हि जातयो धर्मदूषकाः।
इति पैशाचधर्मश्च भविष्यति मया कृतः।। (श्लोक 25-27)


इन तीन श्लोकों का सार यह है कि —" यहाँ के मनुष्यों का ख़तना होगा, वे शिखाहीन होंगे, वे दाढ़ी रखेंगे, ऊंचे स्वर में आलाप करेंगे यानी अज़ान देंगे. शाकाहारी होंगे, किन्तु उनके लिए बिना कौल यानी बिस्मिल्ला बोले बिना कोई पशु खाने योग्य नहीं होगा. ईश्वर के नाम पर अनुयायियों का मुस्लिम संस्कार होगा. उन्हीं से मुसलवन्त यानी ईमानवालों का दूषित धर्म फैलेगा और ऐसा मेरे यानी भगवान शिव के कहने से पैशाच धर्म का अंत भी होगा"
अब विचारणीय बात यह है कि राजा भोज को महादेव ने मरुस्थल से लौटा दिया. किन्तु वर्तमान में 1400 वर्ष के बाद क्या महाकाल द्वारा मुसलमानों के धर्म का अंत का समय आ गया है. क्या किसी शिव शक्ति की प्रेरणा से इस कार्य की शुरुआत हो चुकी है ? 
     अभी हाल ही में ईरान में वहां के निवासियों ने इस्लाम को त्यागकर स्वयं को 'आर्य' होने की घोषणा की. इस्लाम के प्रसार से पहले इजराइल और अन्य यहूदियों द्वारा भी वैदिक देवी-देवताओं की पूजा किए जाने के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं. इराक और सीरिया में सुबी नाम से एक जाति -साईबेरियन को अरब के लोग बहुदेववादी मानते थे.  ठीक से यदि प्राचीन इतिहास पर शोध हो तो विश्व भर में वैदिक काल के चिन्ह निश्चित प्राप्त होंगे | 


      Image result for मठ ॠ ठ ा मॠ ठ  ठ ॠ र मॠ सॠ लिमॠ ठ  ठ ा पॠ रवॠ श निषॠ धइसके बाद मक्का के गेट पर साफ-साफ लिखा था कि काफिरों का अंदर जाना गैर-कानूनी है | मक्का शहर के मार्गों में स्पष्ट रूप से आज भी लिखा गैर-मुस्लिम का प्रवेश वर्जित है. इसका मतलब है कि ईसाई, जैनी या बौद्ध धर्म को भी मानने वाले इसके अंदर नहीं जा सकते हैं |
      Image result for   हिशम ठ बॠ न ठ ल-ठ लबॠ  ठ िताबImage result for   हिशम ठ बॠ न ठ ल-ठ लबॠ  ठ िताब  Image result for   हिशम ठ बॠ न ठ ल-ठ लबॠ  ठ िताब


हिशम इब्न अल-कलबी के पृष्ठ 25-26 में लिखा है कि  अल-उज्जा, अल-लाट  और मनात नाम की तीन देवियों के मंदिरों को नष्ट करने का आदेश भी महम्मद ने दिया और आज मक्का में उन मंदिरों का नामो निशान भी नहीं है. 
   अरबी लोगों के पुर्वज हिन्दू थे, मुहम्मद के चाचा भी शिव के परम भक्त थे | उनकी लिखी शिव की स्तुति आज भी 'सेरुल ओकुल' नामक अरबी ग्रन्थ संग्रह में उपलब्ध है. इसका 1742 ईस्वी में तुरकी के सुलतान सलीम के हुक्म पर संकलन किया गया था और यह तुर्की के इस्तांबुल शहर की मकतबे सुलतानिया लाईब्रेरी में मौजूद है. बीसवी शती के तीसरे दशक में यह जर्मनी में भी छपी गई | 
उसी ग्रन्थ संग्रह में एक अरबी कविता में चारों वेदों की चर्चा हुई हैं |
 1. हे हिन्द की दिव्य भूमि कैसी धन्य तू है क्यूंकि तुम्हें चुना गया है परमेश्वर द्वार, तू ज्ञान की धनी है.
2. वह ईश्वरीय ज्ञान जो चार ज्योतियों के माध्यम से इतने तेज के साथ चमकता है जिसको भारतीय संतों ने चारगुना ज्योतिवान कर दिया है.
3. ईश्वर चाहता है कि सभी मनुष्य वेदों में दिखाये गये दिव्य पथ का अनुसरण करें.
4. नूरानी ज्ञान से सम्पूर्ण सम और यजुर मनुष्य को दिये गये हैं, इसलिए भाईयों वेदों का सम्मान और अनुसरण करो जो मोक्ष यानी निजात की राह दिखाने वाले हैं.
5. दो अन्य ऋग और अथर हमें सिखाते हैं भाईचारा और यकजहती, जिनके नूर की छाया में आकर जुलमत यानी अंधकार हमेशा के लिये दूर हो जाता है. 
  इस बात की उल्लेख नई दिल्ली के बिरला मंदिर वाटिका की यज्ञशाला के स्तम्भ में किया गया | यह कविता 'लबी बिन अख्ताब बिन तुरफा' ने लिखी थी जो अरब में 1850 ईसा पूर्व के लगभग रहता था. यह पैगम्बर मौहम्मद से करीब 2300 साल पूर्व था |
राजा विक्रमादित्य के एक शिलालेख का भी उल्लेख इस ग्रन्थ में है जो मुहम्मद के समय में स्वर्ण प्लेट पर लिखा हुआ मक्का में काबा के अन्दर टंगा हुआ था | यह कविता अरब के कवि जिररहम बिनतोई द्वारा लिखी गयी है जो पैगम्बर मौहम्मद से 165 वर्ष पूर्व मक्का में रहता था और यह राजा विक्रामादित्य की तारीफ यानी प्रशंसा में लिखी गयी है जो बिनतोई से करीब 500 साल पहले थे | इस कविता  का पी एन ओक ने अपने लेख काबा शिवलिंग है में इसका अनुवाद छापा है | 
-  किस्मत वाले हैं वे जो राजा विक्रम के राज्य में पैदा हुए और जिन्दगी गुजारी. वह एक महान, उदार और कर्तव्य परायण शासक था जो प्रजा के कल्याण के लिये समर्पित थे.  लेकिन उस समय हम अरब ईश्वर को भुलाये, कामुक सुख में खोये हुये थे. साजिश रचना और जुल्म करना आम बात थी. अज्ञान का अंधकार हमारे देश पर छा चुका था. जिस प्रकार एक भेड़ का बच्चा क्रूर भेडि़ये के पंजे में अपने जीवन के लिये संघर्ष करता है वैसे ही हम अरबों को अंधेरे ने जकड़ा हुआ था. समूचे देश को अंधेरे ने जकड़ा हुआ था जो इतना गहरा था जैसे नये चाँद  की रात को होता है. परन्तु वर्तमान सुबह और ज्ञान की सुखद रौशनी महान राजा विक्रमादित्य की कोशिशों का परिणाम था जिनकी उदार निगाहों से हम विदेशी भी बचे नहीं रहे. उन्होंने हमारे बीच अपने पवित्र धर्म को फैलाया और हमारे बीच उन विद्वानों को भेजा जिनकी चमक उनके देश से हमारे देश को प्रजव्लित करती थी. उन विद्वानों का परोपकार था कि हम एक बार फिर ईश्वर की उपस्थिति को पहचान पाये; उन्होंने खुदा की पवित्र उपस्थिति से हम को रूशिनास कराया और हम को सत्य मार्ग पर लगाया. वे अपने देश से हमारे देश विक्रमादित्य के हुक्म पर आये थे ताकि अपने धर्म का प्रचार कर सकें और हमें शिक्षित कर सकें.
  Image result for ठ ाबा ठ ॠ  पॠ रानॠ  ठ ितॠ रImage result for ठ ाबा ठ ॠ  पॠ रानॠ  ठ ितॠ रपूर्व काल में भारतीय राजाओं को हिन्दू इतिहास की सही जानकारी होती थी, जिससे वे सीमा पार देशों व सम्पूर्ण भूगोल के शासनकर्ताओं से यथायोग्य व्यवहार कर सके.  मक्का को पवित्र स्थल मानने वाले मुस्लिम लूटेरों का भारत पर सबसे पहला आक्रमण 712 ईसवी में हुआ.



गुरुवार, 19 सितंबर 2019

जब ज्योतिष का विरोध करने वाले दयानंद ने की मृत्यु की सटीक भविष्यवाणी  


Image result for swami dyanandनई दिल्ली | यह सर्वविदित तथ्य है कि 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में स्वामी दयानंद ने भारत में स्वराज्य आन्दोलन को एक नयी गति प्रदान करी | 1857 की क्रान्ति के उपरांत स्वामी दयानंद ने वेदों के प्रचार में अपना जीवन लगा दिया | स्वामी दयानंद ने मूर्ति पूजा और फलित ज्योतिष का विरोध करते हुए शेष सभी वैदिक कर्मकांडों को स्वीकार किया | यही उनकी विशेषता थी कि विदेशी धर्म इस्लाम और ईसाइयत को भारत से जड़ से उखाड़ने के लिए स्वयं के हिन्दू समाज से परम्परा से चली आ रही कुछ आगम सिद्धांतों व कर्मकांडों का खंडन करना आवश्यक समझा | इस लेख का उद्देश्य मात्र इतना है कि स्वामी दयानंद फलित ज्योतिष के विज्ञान को काल्पनिक अवश्य कहते थे, किन्तु अपनी योग विद्या से उन्होंने सहज ही अनेक बार ऐसी भविष्यवाणी कर दी जिससे प्रारब्ध कर्मों के भोग के आगे मानव जीवन परतंत्र सिद्ध हुआ |


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      बात 1877 की है, जब स्वामी दयानन्द सरस्वती जी सनातन धर्म के प्रचार के लिए लाहौर में प्रवास कर रहे थे |  वहां कॉलेज से कुछ  छात्र उनसे संस्कृत पढ़ने आते थे, उनमें से एक वैष्णव कुल में जन्मा ब्राह्मण छात्र गनपत भी था | गनपत उस समय क़ानून की पढ़ाई कर रहा था और स्वामी दयानन्द के पास वेदों के अध्ययन के लिए नियमित रूप से आता था |


   एक दिन सहज ही स्वामी जी ने अपनी दिव्य दृष्टि से उसको देखा और उसकी मृत्यु की भविष्यवाणी करते हुए कह दिया कि वह तीस की आयु से अधिक जीवित नहीं रहेगा, इसलिए वह विवाह ना करे | इस घटना की चर्चा  गनपत के बड़े भाई प० तारा चंद के द्वारा गनपत की मृत्यु के बाद सामने आई | प० ताराचंद मुज्जफरगढ़ जिले (तब अखंड भारत था, जो वर्तमान में पाकिस्तान ) में  पुलिस विभाग में क्लर्क थे |
  अपने जीवनकाल में शायद ही स्वामी दयानन्द ने किसी व्यक्ति की मृत्यु सम्बन्धी विषय में पूर्व ही भविष्यकथन किया हो | इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वामी जी ज्योतिष के खगोल व मेदिनी ज्योतिष विद्या का ही समर्थन करते थे, लग्न कुंडली व नवग्रह पुजन इत्यादि को नहीं मानते थे |  स्वामी जी योगी थे, नित्य समाधि का अभ्यास करते थे, और उन्हें योग की कुछ विशेष सिद्धियाँ भी थी | अन्यथा किसी की अकाल मृत्यु के विषय में तो भगवान ही जानते है, मृत्यु योग में ज्योतिष में सूत्र बहुत ही गूढ़ है | इस शापित विद्या में सर्वज्ञ होना किसी भी ब्राह्मण ज्योतिषी के लिए संभव  नहीं है |


      Image result for मॠ तॠ यॠ  ठ ॠ  दॠ वताएक दिन लाहौर में संस्कृत पढ़ने वाले एक ब्राह्मण शिष्य गनपतराय  को देखकर स्वामी जी को कुछ पूर्वाभास हुआ, उन्होंने गनपतराय को एकांत में बुला कर पूछा कि - "तुम्हारा विवाह तो नहीं हुआ ?"
 उत्तर में गनपत ने कहा- "गुरुदेव महाराज जी  विवाह तो अभी नहीं हुआ, परन्तु सगाई हो गई है " | 
स्वामी जी ने कहा, " तुम विवाह मत करना "|
फिर जब गनपत ने कारण पूछा तो स्वामी जी ने उसे स्पष्ट कहा, " तुम्हारी आयु कुछ कम प्रतीत होती है, तीस वर्ष से अधिक का जीवन नहीं है "| 
             स्वामी जी की इस भविष्यवाणी का गनपतराय पर गहरा असर पड़ा | उसने विवाह ना करने का फैसला किया और  अपने साथ पड़ने वाले सहपाठी मित्रों को भी इस बात से अवगत कराया, परन्तु घर पर स्वामी जी द्वारा अल्प मृत्यु की बात नहीं बताई गनपत राय के होने वाले स्वसुर ने विवाह के लिए दबाव बनाया तो पहले उसने साफ़ इनकार कर दिया, परन्तु कुछ समय बाद वह लाहौर से अपने बीमार पिता के पास शाहपुर आया | वहां  काफी समझाने के बाद और कन्या को बदनामी से बचाने के विचार से विवाह कर लिया | 
    गनपत ने मान लिया था कि जीवन थोड़ा सा ही है इसलिए शेष जीवन को आनंद से बिताने के विचार से कॉलेज की पढ़ाई छोड़कर इधर-उधर व्यर्थ समय व्यतीत करने लगा | जब घर के बुजुर्गों को मृत्यु की भविष्यकथन वाली बात पता चली तो गनपत को समझाया गया कि ज्योतिषी और साधू लोग सच्चे नहीं होते, तुम्हारी कोई अकाल मृत्यु नहीं होगी, इसलिए कोई आजीविका शुरू करो | साथी ही यह भी कहा कि गृहस्थी बिना धनार्जन के नहीं चलती और बेरोजगार मनुष्य की कोई प्रतिष्ठा नहीं होती | गणपतराय ने बात मान ली और सिफारिश करके वो जिला मुल्तान के लोधरा और शुजाआबाद तहसील में नायब तहसीलदार हो गए |
   फिर स्वामी जी की भविष्यवाणी का समय आया, गनपत राय 28 की अवस्था में भयंकर रोगग्रस्त होकर मृत्यु को प्राप्त हुए | मरने से पूर्व गनपत ने अपने सभी सगे-सम्बन्धियों को बताया कि -"कॉलेज के दिनों में ही स्वामी दयानन्द ने तीस वर्ष के भीतर ही मृत्यु की भविष्यवाणी कह दी, इसलिए मैंने विवाह करने से इनकार किया था |" 
स्वामी दयानन्द जी के पास दिव्य दृष्टि थी, परन्तु वे इस ज्योतिष विद्या के  प्रदर्शन के खेल में ना पड़कर सभी हिन्दुओं को सर्व ग्रह के उपचारार्थ पञ्च महायज्ञ व संस्कारों के प्रचार पर ही जोर देते थे |


    Image result for मॠ तॠ यॠ गनपत की मृत्यु की भविष्यवाणी तो ईश्वरीय प्रेरणा से ही संभव हुई, योग के एक नियम के अनुसार यदि सिद्धि के पीछे भागो के तो सिद्धि प्राप्त होने में सन्देह हो सकता है,   किन्तु सिद्धि के फेर में साधक ईश्वर के साक्षात्कार से चूक जाते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है | हाँ ईश्वर को  लक्ष्य करने वालों को अनेक सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती है, इसमें भी तनिक संदेह नहीं करना चाहिए | 


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बुधवार, 18 सितंबर 2019

लता मंगेशकर में नहीं है कालसर्प दोष








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      जब सारे ग्रह राहू केतु के बीच में राहू के आगे होते है तो जातक कालसर्प योग के दुष्प्रभाव से पीड़ित होता है |


     कुछ ज्योतिषी लता जी की कुण्डली में शेषनाग कालसर्प योग बताते हैं परन्तु राहू के वक्री पथ पर केवल शनि ग्रह ही अष्टम भाव में स्थित है | शेष सभी ग्रह राहू-केतु के बंधन से बाहर है |


     28 सितम्बर 1929, मुंबई को रात्रि 11 जन्मी लता मंगेशकर के लग्न में स्थित अष्टमेशव लाभेश गुरु की स्थिति ने जातक को दीर्घायु योग प्रदान किया है | साधारणत: लग्न का बृहस्पति निरोगी, दीर्घायु बनाता है, जीवन में संघर्ष देता है मगर अंत में विजयी भी बनाता है |  वृषभ लग्न में स्थित अष्टमेश गुरु पर मारकेश व द्वादशेश मंगल की अष्टम दृष्टि जो इनके स्वास्थ्य के लिए प्रतिकूल प्रभाव देगा |


   दिसम्बर 13 से गुरु की महादशा प्रारम्भ हो चुकी है | जिसमें बुध का अंतर अगस्त 18 से स्वास्थ्य को लेकर चिंताजनक समय दर्शा रहा है | पंचमस्थ बुध ( एक गणना के अनुसार बुध छठे भाव में प्रवेश कर चूका है )  स्वयं में मारकत्व का प्रभाव रखे हुए और मारकेश व द्वादशेश मंगल के नक्षत्र में होकर छठे में बैठे मंगल के साथ ही दो अंशों के निकट होकर पीड़ित है | बुध के बाद भी दिसम्बर 20 से केतु के अंतर में स्वास्थ्य को लेकर संतोषजनक स्थिति का होना और कठिन हो जाएगा |


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    अपनी जीवन यात्रा में जातिका ने गायन विद्या की प्राप्ति कर उसी को व्यवसाय बनाया | लग्न में बैठा गुरु ने जातिका को विद्या में रूचि पैदा की | लग्न का गुरु विद्या की प्यास तो जगाता ही है, साथ ही उसे एक अच्छे स्वाभाव का व्यक्तित्व भी प्रदान करता है | जातिका के अन्दर हर परिस्थिति में स्वयं को ढाल कर आगे बढ़ने की अद्भुत ताकत होती है |


  Image result for लता मंगेशकर जीवन     केतु के संघर्षमय दशा के उपरान्त दिसम्बर 52 से शुक्र की महादशा से फ़िल्मी गायन का कैरियर ने नयी रफ़्तार पकड़ी | लग्नेश शुक्र चतुर्थ भाव में स्थित होकर दशम भाव पर दृष्टि डाल रहा है | 


      तृतीय भाव का स्वामी चन्द्रमा अपनी ही राशि में स्थित होकर गायन कला से जुड़े वाणी भाव के स्वामी बुध के नक्षत्र अश्लेशा में स्थित है | नवांश का स्वामी ग्रह बुध लग्नेश व दशमेश होकर उच्च भाव कन्या में स्थित है | नवांश में दशम भाव पर चंद्रमा की दृष्टि भी है | दशमांश कुंडली में भी दशमेश और तृतीयेश की एकादश भाव में युति कला क्षेत्र में व्यवसाय को दर्शा रही है | दशमांश के कर्मेश चन्द्र के साथ बैठे गुरु की बुध पर बुध के राशीश जो गुरु की राशि तृतीय भाव पर बैठे शनि पर दृष्टि है | 


   लग्न कुंडली में  भाग्येश व कर्मेश शनि की अष्टम भाव से दशम भाव में दृष्टि से कर्म भाव को मजबूत करने के साथ भाग्यशाली होने का योग भी देता है | 


   विवाह के मामले में सप्मेश की छठे भाव में राहू केतू के धुरी में पीड़ित होना इस भाव के सुखद फलों की हानि करता हैं | वाणी का कारक बुध इनकी कुण्डली में द्वितीयेश व पंचमेश होकर स्वराशि के होकर पंचम भाव में केंद्र के स्वामी के साथ राजयोग बना रहे हैं |
    वक्री बुध स्वतंत्र आजीविका के कारक भाव सप्तमेश मंगल के नक्षत्र चित्रा में हैं | नवांश में बुध लग्न में स्व राशि के होकर एक सशक्त स्थिति बना रहे हैं | बुध लग्न के अंशों के अति निकट होकर प्रभावी फल देने में सक्षम हैं|


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    संघर्ष के भाव में स्थित केतु जो लाभेश व अष्टमेश गुरु के नक्षत्र में स्थित है की महादशा 1946 - 1953 के बीच भारतीय सिनेमा में अपनी पहचान स्थापित करने में सफल रही | 


    बुध इनकी कुंडली में सर्वाधिक अंशों का होकर आत्मकारक ग्रह है | 1969 में लग्नेश शुक्र की महादशा के अंतर बुध में पद्म भूषण और भी कई भारतीय सिनेमा के संगीत अवार्ड हासिल किये |


     लग्नेश शुक्र के नक्षत्र में स्थित राहू की महादशा 1996 से प्रारम्भ हुई | बारहवें भाव में स्थित राहू को द्वादेश मंगल छठे भाव से देखता हैं और राहू लग्नेश शुक्र के नक्षत्र में हैं | नवांश में शुक्र लाभ स्थान में और लाभेश चन्द्र चतुर्थ भाव में चतुर्थेश व सप्तमेश गुरु से दृष्ट है |


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    इसी राहू की महादशा के अंतर राहू में ही इन्हें महाराष्ट्र भूषण अवार्ड मिला | राहू- गुरु में इन्हें भारत सरकार ने पद्म विभूषण, और राहू- केतु के पथ में आए भाग्येश शनि की अंतर दशा में भारत-रत्न के सम्मान की प्राप्ति हुई |


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सोमवार, 16 सितंबर 2019

मोक्ष प्राप्ति के लिए बना था-सांप-सीढ़ी का खेल

Image result for moksha patam gameनई दिल्ली : कुछ इतिहास-कार मानते हैं, सांप-सीढ़ी का आविष्कार 13वीं शताब्दी में संत ज्ञानदेव ने किया था. इस खेल को आविष्कार करने के पीछे का मुख्य उद्देश्य बच्चों को नैतिक मूल्य सिखाना था | सांप-सीढ़ी खेल की उत्पत्ति प्राचीन भारत में हुई थी | डेन्मार्क देश के प्रा. जेकॉब ने इंडियन कल्चरल ट्रेडिशन के अंतर्गत पूरे भारत में भ्रमण कर सांपसीढी के अनेक पट संग्रहित किए | खोजते खोजते प्रा. जेकॉब को मराठी के विख्यात साहित्यकार रामचंद्र चिन्तामण ढेरे के हस्तलिखित संग्रह से उन्हें दो मोक्षपट मिले | इस पर लिखित पंक्तियों से जीवननिर्वाह कैसे करें, कौन सी कौडी (मोहरा) गिरी तो क्या करना चाहिए, इसका मार्गदर्शन भी किया गया है |


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मोक्षपट से संदेश !


मोक्षपट खेल के दोनों ही पट २० x २० इंच आकार के हैं एवं उसमें चौकोर खाने बने हुए हैं | अलग-अलग समय पर इन खानों की संख्या 50 से 100 तक हो गयी | परन्तु समान रूप से उसमें प्रथम खाना 'जनम' का और अंतिम खाना 'मोक्ष' का है | मनुष्य के जीवन की यात्रा इस खेल के द्वारा निर्धारित की जाती है  |  मोक्षपट खेलने हेतु सांपसीढी के समान ही ६ कौडियों -काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं द्वेष के नाम से खेला जाता रहा |  पट की हर सीढी को उन्नति की सीढी संबोधित कर उन्हें सत्संग, दया एवं सद्बुद्धि ऐसे नाम से प्रेरणा और अच्छे संस्कार देने का चलन रहा |


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   मनुष्य सांसारिक जीवन को पुरुषार्थ चतुष्टय -धर्म, अर्थ व काम के साथ परम लक्ष्य जिसमें सांसारिक दुःख समाप्त हो जाता है मोक्ष को प्राप्त करने के लिए संकल्पित हो यही इस खेल का उद्देश्य है |


  इस मोक्षपट खेल के मूल संरचना में  एक सौ चोकोर खाने हैं |  जिसमें, 12 वां खाना विश्वास था, 51वां  खाना विश्वसनीयता थी, 57 वां खाना वीरता, 76 वां खाना  ज्ञान था, और 78वें  खाना तपस्या थी  | ये वे खाने थे जहां सीढ़ी मिली और खेलने वाला  तेजी से ऊपर उठता है | 


इसे तरह मानव जीवन को पतन की राह में ले जाने वाले अवगुणों से बचने के लिए अहंकार के लिए 44 वां खाना, चंचलता के लिए 49 वां, चोरी के लिए 2 रा खाना, झूठ बोलने के लिए 58 वां, कर्ज के लिए 69 वां, क्रोध के लिए 84 वां, इसी तरह  लालच, गर्व आदि के लिए अलग-अलग खानों बने होते हैं, जिसमें कदम रखते ही खिलाड़ी पतन कर नीचे गिर जाता है | फिर इसी क्रम में संसार की वासना के लिए 99 वां खाना है, जहां सांप अपने मुंह से खुले हुए इंतजार कर रहा था | यहाँ से खिलाड़ी एकदम नीचे आ गिरता है | मनुष्य को अंतिम लक्ष्य 'मोक्ष' को पाने के लिए अपने अवगुणों पर विजय पानी होगी, अवगुणों को लांघ कर ही मनुष्य पतन से बच सकता है |


100 वां खाना निर्वाण या मोक्ष का प्रतिनिधित्व करता है | 


Image result for snake and ladder in englandImage result for मोकॠष पट खेल की शॠरॠआत


    भारत के बाहर भी है प्रचलन में 


  पहले यह कपड़ों पर ही बना हुआ होता था, लेकिन 18वीं शताब्दी के बाद यह बोर्ड पर बनने लगा | 19वीं शताब्दी के दौरान, भारत में उपनिवेशकाल के समय यह खेल इंग्लैंड में जा पहुंचा था. अंग्रेज अपने साथ यह खेल अपने देश में भी लेकर गए | नये नाम 'स्नेक एंड लैडरर्स' से मशहूर हुआ | अंग्रेजों ने अब इसके पीछे के नैतिक और धार्मिक रूप से जुड़े हुए विचार को हटा दिया था |


Image result for snake and ladder in englandइंग्लैंड के बाद यह खेल अब संयुक्त राज्य अमेरिका में भी जा पहुंचा. साल 1943 में यह अमेरिका में प्रचलन में आया | वहां इस खेल का नाम अब हो गया था 'शूट एंड लैडरर्स' |


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सोमवार, 9 सितंबर 2019

वृंदावन के बंदर चार चीजों को क्यूं छीनते हैं


Image result for बांके बिहारी में बनॠदरमथुरा : वृंदावन के बंदर चार चीजों को क्यूं छीनते हैंआइये एक भाव दृष्टिपात करें.


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1. चप्पल जूते
 
तो भैया वृंदावन में आए हो तो वृंदावन हमारे प्रिय


लालजू की नित्य क्रीडा स्थली है


नित्य विहार स्थली हैं


जहां श्यामा श्याम नंगे पैर विचरण करते हैं, अतः


उस रज पर जूते चप्पल पहन ना चलो


 पथ पर श्याम धूलि पग से छूते चलो 


यही संदेश बंदर देते हैं.


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 2 :चश्मे को छीनते है
 
तो वृंदावन में पधारे प्यारे यात्री 
वृंदावन को बाह्य नेत्रों से दर्शन करने की आवश्यकता न है बाह्य नेत्र से कहीं गंदगी देखोगे कहीं अपशिष्ट देखोगे  और घृणा करोगे अपराध बनेगा. अतः


उस दिव्यतम श्री धाम !


वृंदावन का दर्शन आंतरिक नेत्रों से करो


दिव्य यमुना रसरानी जी का दर्शन करो


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3 :मोबाइल
 
भाव - अरे प्यारे यात्री !


बड़े बड़े योगी यति भी वृंदावन आने के लिए तरसते हैं


श्री जी की चरण रज बृज रज के लिए बड़े बड़े देव तरसते हैं..


यथा, 
पद में स्वामी हरिराम व्यास जू महाराज कहते हैं
जो रज शिव सनकादिक याचत सो रज शीश चढाऊं


तो वृंदावन मे आकर भी बाह्य जगत से संपर्क बनाने का क्या मतलब..


तन वृंदावन मे और मन कहां मोबाइल में


अतः तन मन दोनो को वृंदावन में केन्द्रित कर


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4 :पर्स


भाव-  


भजन की भूमि ये,


माया संग चलने की आवश्यकता नही 

माला झोली पर्याप्त है,


व्यर्थ पर्स दिखाने की आवश्यकता नही 


उस त्रिलोकी से है जग का वैभव,


निज प्रदर्शन करने की आवश्यकता नही. क्यूंकि


ये शुद्ध,


माधुर्य लीला की भूमि है.


प्रत्येक कण प्रिया लाल


जू के रस से आप्लावित है.. 


चूंकि भाव बहुत से हैं..


परंतु प्रमुख भावों पर चर्चा की..


तो ये बंदर कुछ संदेश देते हैं 
परंतु उनके साथ इस प्रकार का बर्ताव सर्वथा अनुचित एवं जघन्य अपराध है...


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धन धन वृंदावन के बंदर.. 


☘💞जै जै श्री वृंदावन ☘💞j


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