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Showing posts from September, 2019

काबे के काले पत्थर का रहस्य-हिन्दू राजा विक्रमादित्य से जुड़ा है अरब का इतिहास

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       प्रति वर्ष मक्का में हज पर काबा की परिक्रमा करने लाखों मुस्लमान आते हैं. भारत से हज जाने वालों की संख्या अब दो लाख मुस्लिम प्रति वर्ष हो गयी है | ऐसा माना जाता है कि दुनिया भर के मुसलमानों के लिए काबा मात्र एक कमरा नहीं अपितु सारी कायनात के मालिक अल्लाह का घर है. और इस काबा के एक दीवार पर संगे अस्वद नाम का एक काला पत्थर लगा हुआ है | अरब के इतिहास और भारतीयों के परम्परागत में यह स्पष्ट है कि निश्चित रूप से एक पवित्र शिवलिंग ही है. यह शिव लिंग इस्लाम के प्रारम्भ होंसे से पूर्व काबा के अन्दर प्रतिष्ठित था |        मुहम्मद के बाल्य जीवन की एक घटना में काबा की टूटी छत और फर्श के पुनर्निर्माण के बाद शिवलिंग को पुनः प्राण प्रतिष्ठित करने में कबीलों में विवाद हो गया कि किसके हाथों यह पुनीत कार्य हो | जिसे मुहम्मद की सलाह पर सभी सरदारों ने एक चादर में शिवलिंग को रखकर और फिर चादर के कोनों को सभी कबीलों के मुखियाओं ने पकड़ कर काबा के मध्य में स्थापित कर दिया | मुहम्मद के जीवनी कार इस घटना का उल्लेख करने का एक ही उद्देश्य बताते है कि छोटी आयु में भी मुहम्मद ने अपनी सूझबूझ से एक बड़ा धार्मि

जब ज्योतिष का विरोध करने वाले दयानंद ने की मृत्यु की सटीक भविष्यवाणी  

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नई दिल्ली | यह सर्वविदित तथ्य है कि 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में स्वामी दयानंद ने भारत में स्वराज्य आन्दोलन को एक नयी गति प्रदान करी | 1857 की क्रान्ति के उपरांत स्वामी दयानंद ने वेदों के प्रचार में अपना जीवन लगा दिया | स्वामी दयानंद ने मूर्ति पूजा और फलित ज्योतिष का विरोध करते हुए शेष सभी वैदिक कर्मकांडों को स्वीकार किया | यही उनकी विशेषता थी कि विदेशी धर्म इस्लाम और ईसाइयत को भारत से जड़ से उखाड़ने के लिए स्वयं के हिन्दू समाज से परम्परा से चली आ रही कुछ आगम सिद्धांतों व कर्मकांडों का खंडन करना आवश्यक समझा | इस लेख का उद्देश्य मात्र इतना है कि स्वामी दयानंद फलित ज्योतिष के विज्ञान को काल्पनिक अवश्य कहते थे, किन्तु अपनी योग विद्या से उन्होंने सहज ही अनेक बार ऐसी भविष्यवाणी कर दी जिससे प्रारब्ध कर्मों के भोग के आगे मानव जीवन परतंत्र सिद्ध हुआ |           बात 1877 की है, जब स्वामी दयानन्द सरस्वती जी सनातन धर्म के प्रचार के लिए लाहौर में प्रवास कर रहे थे |  वहां कॉलेज से कुछ  छात्र उनसे संस्कृत पढ़ने आते थे, उनमें से एक वैष्णव कुल में जन्मा ब्राह्मण छात्र गनपत भी था | गनपत उस समय क़ानून

लता मंगेशकर में नहीं है कालसर्प दोष

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      जब सारे ग्रह राहू केतु के बीच में राहू के आगे होते है तो जातक कालसर्प योग के दुष्प्रभाव से पीड़ित होता है |      कुछ ज्योतिषी लता जी की कुण्डली में शेषनाग कालसर्प योग बताते हैं परन्तु राहू के वक्री पथ पर केवल शनि ग्रह ही अष्टम भाव में स्थित है | शेष सभी ग्रह राहू-केतु के बंधन से बाहर है |      28 सितम्बर 1929, मुंबई को रात्रि 11 जन्मी लता मंगेशकर के लग्न में स्थित अष्टमेशव लाभेश गुरु की स्थिति ने जातक को दीर्घायु योग प्रदान किया है | साधारणत: लग्न का बृहस्पति निरोगी, दीर्घायु बनाता है, जीवन में संघर्ष देता है मगर अंत में विजयी भी बनाता है |  वृषभ लग्न में स्थित अष्टमेश गुरु पर मारकेश व द्वादशेश मंगल की अष्टम दृष्टि जो इनके स्वास्थ्य के लिए प्रतिकूल प्रभाव देगा |    दिसम्बर 13 से गुरु की महादशा प्रारम्भ हो चुकी है | जिसमें बुध का अंतर अगस्त 18 से स्वास्थ्य को लेकर चिंताजनक समय दर्शा रहा है | पंचमस्थ बुध ( एक गणना के अनुसार बुध छठे भाव में प्रवेश कर चूका है )  स्वयं में मारकत्व का प्रभाव रखे हुए और मारकेश व द्वादशेश मंगल के नक्षत्र में होकर छठे में बैठे मंगल के साथ ही दो

मोक्ष प्राप्ति के लिए बना था-सांप-सीढ़ी का खेल

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नई दिल्ली : कुछ इतिहास-कार मानते हैं, सांप-सीढ़ी का आविष्कार 13वीं शताब्दी में संत ज्ञानदेव ने किया था. इस खेल को आविष्कार करने के पीछे का मुख्य उद्देश्य बच्चों को नैतिक मूल्य सिखाना था | सांप-सीढ़ी खेल की उत्पत्ति प्राचीन भारत में हुई थी | डेन्मार्क देश के प्रा. जेकॉब ने इंडियन कल्चरल ट्रेडिशन के अंतर्गत पूरे भारत में भ्रमण कर सांपसीढी के अनेक पट संग्रहित किए | खोजते खोजते प्रा. जेकॉब को मराठी के विख्यात साहित्यकार रामचंद्र चिन्तामण ढेरे  के हस्तलिखित संग्रह से उन्हें दो मोक्षपट मिले | इस पर लिखित पंक्तियों से जीवननिर्वाह कैसे करें, कौन सी कौडी (मोहरा) गिरी तो क्या करना चाहिए, इसका मार्गदर्शन भी किया गया है | मोक्षपट से संदेश ! मोक्षपट खेल के दोनों ही पट २० x २० इंच आकार के हैं एवं उसमें चौकोर खाने बने हुए हैं | अलग-अलग समय पर इन खानों की संख्या 50 से 100 तक हो गयी | परन्तु समान रूप से उसमें प्रथम खाना 'जनम' का और अंतिम खाना 'मोक्ष' का है | मनुष्य के जीवन की यात्रा इस खेल के द्वारा निर्धारित की जाती है  |  मोक्षपट खेलने हेतु सांपसीढी के समान ही ६ कौडियों - काम,

वृंदावन के बंदर चार चीजों को क्यूं छीनते हैं

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मथुरा : वृंदावन के बंदर चार चीजों को क्यूं छीनते हैंआइये एक भाव दृष्टिपात करें. 1. चप्पल जूते   तो भैया वृंदावन में आए हो तो वृंदावन हमारे प्रिय लालजू की नित्य क्रीडा स्थली है नित्य विहार स्थली हैं जहां श्यामा श्याम नंगे पैर विचरण करते हैं, अतः उस रज पर जूते चप्पल पहन ना चलो  पथ पर श्याम धूलि पग से छूते चलो  यही संदेश बंदर देते हैं.  2 :चश्मे को छीनते है   तो वृंदावन में पधारे प्यारे यात्री  वृंदावन को बाह्य नेत्रों से दर्शन करने की आवश्यकता न है बाह्य नेत्र से कहीं गंदगी देखोगे कहीं अपशिष्ट देखोगे  और घृणा करोगे अपराध बनेगा. अतः उस दिव्यतम श्री धाम ! वृंदावन का दर्शन आंतरिक नेत्रों से करो दिव्य यमुना रसरानी जी का दर्शन करो 3 :मोबाइल   भाव - अरे प्यारे यात्री ! बड़े बड़े योगी यति भी वृंदावन आने के लिए तरसते हैं श्री जी की चरण रज बृज रज के लिए बड़े बड़े देव तरसते हैं. . यथा,  पद में स्वामी हरिराम व्यास जू महाराज कहते हैं जो रज शिव सनकादिक याचत सो रज शीश चढाऊं तो वृंदावन मे आकर भी बाह्य जगत से संपर्क बनाने का क्या मतलब.. तन वृंदावन मे और मन कहां मोबाइल में अतः तन मन दोन