ऋग्वेद 1.8.4

 महाँ इन्द्रः पुरश्च नु महत्वम॑स्तु वज्रिणे।

द्यौर्न प्रथिना शवः॥५॥१५॥

महान्। इन्द्रः। परः। च। नु। महिऽत्वम्। अस्तु। वज्रिणे। द्यौः। ना प्रथिना। शवः॥५॥

पदार्थ:-(महान्) सर्वथाऽनन्तगुणस्वभावसामर्थ्येन युक्तः (इन्द्रः) सर्वजगद्राजः (पर:) अत्यन्तोत्कृष्टः (च) पुनरर्थे (नु) हेत्वपदेशे। (निरु०१.४) (महित्वम्) मह्यते पूज्यते सर्वेर्जनेरिति महिस्तस्य भावः। अत्रौणादिकः सर्वधातुभ्य इन्नितीन् प्रत्ययः। (अस्तु) भवतु (वज्रिणे) वज्रो न्यायाख्यो दण्डोऽस्यास्तीति तस्मैवज्रो वै दण्डः। (श०ब्रा०३.१.५.३२) (द्यौः) विशालः सूर्यप्रकाशः (न) उपमार्थेउपसृष्टादुपचारस्तस्य येनोपमिमीते। (निरु०१.४) यत्र कारकात्पूर्वं नकारस्य प्रयोगस्तत्र प्रतिषेधार्थीयः, यत्र च परस्तत्रोपमा यः। (प्रथिना) पृथोर्भावस्तेन। पृथुशब्दादिमनिच्। छान्दसो वर्णलापो वेति मकारलोपः। (शवः) बलम्। शव इति बलनामसु पठितम्। (निघं०२.९)॥५॥

अन्वयः-यो मूर्त्तिमतः संसारस्य द्यौः सूर्यः प्रथिना न सुविस्तृतेन स्वप्रकाशेनेव महान् पर इन्द्रः परमेश्वरोऽस्ति, तस्मै वज्रिणे इन्द्रायेश्वराय न्वस्मत्कृतस्य विजयस्य महित्वं शवश्चास्तु॥५॥

भावार्थ:-अत्रोपमालङ्कारोऽस्ति। धार्मिकैयुद्धशीलैः। शूर्योदृभिर्मनुष्यैः स्वनिष्पादितस्य दुष्टशत्रुविजयस्य धन्यवादा अनन्तशक्तिमते जगदीश्वरायैव देयाः। यतो मनुष्याणां निरभिमानतया राज्योन्नतिः सदैव वर्धतेति॥५॥

इति पञ्चदशो वर्गः समाप्तः॥

पदार्थः-(न) जैसे मूर्तिमान् संसार को प्रकाशयुक्त करने के लिये (द्यौः) सूर्यप्रकाश (प्रथिना) विस्तार से प्राप्त होता है, वैसे ही जो (महान्) सब प्रकार से अनन्तगुण अत्युत्तम स्वभाव अतुल सामर्थ्ययुक्त और (परः) अत्यन्त श्रेष्ठ (इन्द्रः) सब जगत् की रक्षा करनेवाला परमेश्वर है, और (वज्रिणे)न्याय की रीति से दण्ड देनेवाले परमेश्वर (नु) जो कि अपने सहायरूपी हेतु से हमको विजय देता है, उसी की यह (महित्वम्) महिमा (च) तथा बल है।।५।

भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। धार्मिक युद्ध करनेवाले मनुष्यों को उचित है कि जो शूरवीर युद्ध में अति धीर मनुष्यों के साथ होकर दुष्ट शत्रुओं पर अपना विजय हुआ है, उसका धन्यवाद अनन्त शक्तिमान् जगदीश्वर को देना चाहिये कि जिससे निरभिमान होकर मनुष्यों के राज्य की सदैव बढ़ती होती रहे॥५॥

यह पन्द्रहवां वर्ग समाप्त हुआ।

__ मनुष्यैः कीदृशा भूत्वा युद्धं कर्त्तव्यमित्युपदिश्यते

मनुष्यों को कैसे होकर युद्ध करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में प्रकाश किया है

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