ऋग्वेद 1.34.2

त्रयः प॒वयौ मधुवाहने रथे सोमस्य वेनामनु विश्व इद्विदुः

त्रयः स्कुम्भासः स्कभितास आरभे बिर्नक्तं याथस्त्रिर्वश्विना दिवा॥२॥

त्रयः प॒वयः। मधुऽवाहने। रथे। सोमस्य। वेनाम्। अनु। विश्वे। इत्। विदुः। त्रयः। स्कम्भासः। स्कृभितासः। आऽरभ। त्रिः। नक्तम्। याथः। त्रिः। ऊँ इति। अश्विना। दिवा॥ २॥

पदार्थः-(त्रयः) त्रित्वसंख्याविशिष्टाः (पवयः) वज्रतुल्यानि चालनार्थानि कलाचक्राणि। पविरिति वज्रनामसु पठितम्। (निघ०२.२०) (मधुवाहने) मधुरगुणयुक्तानां द्रव्याणां वेगानां वा वाहनं प्रापणं यस्मात् तस्मिन् (रथे) रमन्ते येन यानेन तस्मिन् (सोमस्य) ऐश्वर्यस्य चन्द्रलोकस्य वा। अत्र षु प्रसवैश्वर्ययोरित्यस्य प्रयोगः(वेनाम्) कमनीयां यात्रांधावस्यज्यतिभ्यो नः। (उणा०३.६) इत्यजधातोर्नः प्रत्ययः ।22 (अनु) आनुकूल्ये (विश्वे) सर्वे (इत्) एव (विदुः) जानन्ति (त्रयः) त्रित्वसंख्याकाः (स्कम्भासः) धारणार्थाः स्तम्भविशेषाः (स्कभितासः) स्थापिता धारिताः। अत्रोभयत्र आज्जसेरसुग् (अष्टा०७.१.५०) इत्यसुगागमः। (आरभे) आरब्धव्ये गमनागमने (त्रिः) त्रिवारम् (नक्तम्) रात्रौ। नक्तमिति रात्रिनामसु पठितम्। (निघं०१.७) (याथः) प्राप्नुतम् (त्रिः) त्रिवारम् (ॐ) वितर्के (अश्विना) अश्विनाविव सकलशिल्पविद्याव्यापिनौ। अत्र सुपां सुलुग्० इत्याकारादेशः। (दिवा) दिवसे।।२॥

अन्वयः-हे अश्विनाविवसमग्रशिल्पविद्याव्यापिनौ पुरुषो! युवां यस्मिन् मधुवाहने रथे त्रयः पवयस्त्रयः स्कम्भासः स्कभितासो भवन्ति तस्मिन् स्थित्वा त्रिनक्तं रात्रौ त्रिर्दिवा दिवसे चाभीष्टं स्थानं याथो गच्छथस्तत्रापि युवाभ्यां विना कार्यसिद्धिर्न जायते। मनुष्या यस्य मध्ये स्थित्वा सोमस्य चन्द्रस्य वा वेनां कमनीयां कान्तिं सद्यः प्राप्नुवन्ति। यं चारभे विश्वेदेवा इदेव विदुर्जानन्ति तमु रथं संसाध्य यथावदभीष्टं क्षिप्रं प्राप्नुतम्।।२।__

भावार्थ:-भूमिसमुद्रान्तरिक्षगमनं चिकीर्षुभिर्मनुष्यस्त्रिचक्राग्न्यागारस्तम्भयुक्तानि विमानादीनि यानानि रचयित्वा तत्र स्थित्वैकस्मिन् दिन एकस्यां रात्रौ भूगोलसमुद्रान्तरिक्षमार्गेण त्रिवारं गन्तुं शक्येरन्। तत्रेदशास्त्रयस्स्कम्भा रचनीया, यत्र सर्वे कलावयवाः काष्ठलोष्ठादिस्तम्भावयवा वा स्थितिं प्राप्नुयुः । तत्राग्निजले सम्प्रयोज्य चालनीयानि। नैतैर्विना कश्चित्सद्यो भूमौ समुद्रेऽन्तरिक्षे वा गन्तुमागन्तुं च शक्नोति, तस्मादेतेषां सिद्धये विशिष्टाः प्रयत्ना: कार्या इति।।२।। ___

पदार्थ:-हे अश्वि अर्थात् वायु और बिजुली के समान सम्पूर्ण शिल्प विद्याओं को यथावत् जानने वाले विद्वान् लोगो! आप जिस (मधुवाहने) मधुर गुणयुक्त द्रव्यों की प्राप्ति होने के हेतु (रथे) विमान में (त्रयः) तीन (पवयः) वज्र के समान कला घूमने के चक्र और (त्रयः) तीन (स्कम्भासः) बन्धन के लिये खंभ (स्कभितासः) स्थापित और धारण किये जाते हैं, उसमें स्थित अग्नि और जल के समान कार्यसिद्धि करके (त्रिः) तीन वार (नक्तम्) रात्रि और (त्रिः) तीन वार (दिवा) दिन में इच्छा किये हुए स्थान को (उपयाथः) पहुंचो, वहाँ भी आपके विना कार्यसिद्धि कदापि नहीं होती। मनुष्य लोग जिसमें बैठ के (सोमस्य) ऐश्वर्य की (वेनाम्) प्राप्ति को करती हुई कामना वा चन्द्रलोक की कान्ति को प्राप्त होते और जिसको (आरभे) आरम्भ करने योग्य गमनागमन व्यवहार में (विश्वे) सब विद्वान् (इत्) ही (विदुः) जानते हैं, उस (ॐ) अद्भुत रथ को ठीक-ठीक सिद्ध कर अभीष्ट स्थानों में शीघ्र जाया आया करो॥२॥

भावार्थ:-भूमि समुद्र और अन्तरिक्ष में जाने की इच्छा करने वाले मनुष्यों को योग्य है कि तीनतीन चक्र युक्त अग्नि के घर और स्तम्भयुक्त यान को रच कर उसमें बैठ कर एक दिन-रात में भूगोल, समुद्र, अन्तरिक्ष मार्ग से तीन-तीन वार जाने को समर्थ हो सकें, उस यान में इस प्रकार के खंभ रचने चाहिये कि जिसमें कलावयव अर्थात् काष्ट, लोष्ट आदि खंभों के अवयव स्थित हों, फिर वहाँ अग्नि जल का सम्प्रयोग कर चलावें। क्योंकि इनके विना कोई मनुष्य शीघ्र भूमि, समुद्र, अन्तरिक्ष में जाने-आने को समर्थ नहीं हो सकताइस से इनकी सिद्धि के लिये सब मनुष्यों को बड़े-बड़े यत्न अवश्य करने चाहिये।।२॥

पुनस्ताभ्यां कृतैर्यानैः कि कि साधनीयमित्युपदिश्यते।

फिर उनसे सिद्ध किये हुए यानों से क्या-क्या सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है 

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