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ऋग्वेद 1.31.6

 यः शूरसाता परितक्म्ये धने भेभिश्चित्समृता हंसि भूय॑सः॥६॥

त्वम्। अ॒ग्ने। वृजिनऽवर्तनिम्। नरम्। समन्। पिपर्षि। विदथे। विचर्षणे। यः। शूरऽसातापरिऽतक्म्ये। धने। भेभिः। चित्। सम्ऽऋता। हंसि। भूय॑सः॥ ६॥

पदार्थ:-(त्वम्) प्रजापालनेऽधिकृतः (अग्ने) सर्वतोऽभिरक्षक (वृजिनवर्त्तनिम्) वृजिनस्य बलस्य वर्त्तनिर्मार्गो यस्य तम्अत्र सह सुपेति समासः । वृजिनमिति बलनामसु पठितम्। (निघ०२.९) (नरम्) मनुष्यम् (सक्मन्) यः सचति तत्सम्बुद्धी (पिपर्षि) पालयसि (विदथे) धर्म्य युद्धे यज्ञे। विदथ इति संग्रामनामसु पठितम्। (निघं०३.१७) (विचर्षणे) विविधपदार्थानां यथार्थद्रष्टा तत्सम्बुद्धौ (यः) (शूरसाता) शूराणां साति: सम्भजनं यस्मिन् तस्मिन् संग्रामे। शूरसाताविति संग्रामनामसु पठितम्। (निघं०२.१७) अत्र सुपां सुलुग्० इति डे: स्थाने डादेशः । (परितक्म्ये) परितः सर्वतो हर्षनिमित्ते (धने) सुवर्णविद्या चक्रवर्त्तिराज्यादियुक्तद्रव्ये (दभ्रेभिः) अल्पैयुद्धसाधनैः सह। दभ्रमिति ह्रस्वनामसु पठितम्। (निघं०३.२) दभ्रमर्भकमित्यल्पस्य दभ्रं दभ्नातेः। सुदम्भं भवति। अर्भकमवहृतं भवति। (निरु०३.२०) अत्र बहुलं छन्दसि इति भिस ऐस् न। (चित्) अपि (समृता) सम्यक् ऋतं सत्यं येषु तानि। अत्र शे स्थाने डादेशः। (हंसि) (भूयसः) बहून्॥६॥ __

अन्वयः-हे सक्मन् विचर्षणेऽग्नेसेनापते! यो न्यायविद्यया प्रकाशमानस्त्वं विदथे शूरसातौ युद्धे दभ्रेभिरल्पैरपि साधनैर्वृजिनवर्त्तनिं नरं भूयसः शत्रूश्च हंसिसमृता समृतानि कर्माणि पिपर्षि स त्वं नः सेनाध्यक्षो भव॥६॥

भावार्थ:- परमेश्वरस्यायं स्वभावोऽस्ति ये ह्यधर्म त्युक्तुं धर्म च सेवितुमिच्छति, तान् कृपया धर्मस्थान् करोति, ये च धर्म्य युद्धं धर्मसाध्यं धनं चिकीर्षन्ति तान् रक्षित्वा तत्तत्कर्मानुसारेण तेभ्यो धनमपि प्रयच्छति। ये च दुष्टाचारिणस्तान् तत्तत्कर्मानुकूलफलदानेन ताडयति य ईश्वराज्ञयां वर्तमाना धर्मात्मानोऽल्पैरपि युद्धसाधनैयुद्धं कर्तुं प्रवर्त्तन्ते तेभ्यो विजयं ददाति नेतरेषामिति॥६॥ ___

पदार्थ:-हे (सक्मन्) सब पदार्थों का सम्बन्ध कराने (विचर्षणे) अनेक प्रकार के पदार्थों को अच्छे प्रकार देखने वाले (अग्ने) राजनीतिविद्या से शोभायमान सेनापति! (यः) जो तू (विदथे) धर्मयुक्त यज्ञरूपी (शूरसातौ) संग्राम में (दभ्रेभिः) थोड़े ही साधनों से (वृजिनवर्त्तनिम्) अधर्म मार्ग में चलने वाले (नरम्) मनुष्य और (भूयसः) बहुत शत्रुओं का (हंसि) हननकर्ता है और (समृता) अच्छे प्रकार सत्य कर्मों को (पिपर्षि) पालनकर्त्ता है। जो चोर पराये पदार्थों के हरने की इच्छा से (परितक्म्ये) सब ओर से देखने योग्य (धने) सुवर्ण विद्या और चक्रवर्त्ति राज्य आदि धन की रक्षा करने के निमित्त आप हमारे सेनापति हूजिये॥६॥ ___

भावार्थ:-परमेश्वर का यह स्वभाव है कि जो पुरुष अधर्म छोड़ धर्म करने की इच्छा करते हैं, उनको अपनी कृपा से शीघ्र ही धर्म में स्थिर करता है जो धर्म से युद्ध वा धन को सिद्ध कराना चाहतेहैं, उनकी रक्षा कर उनके कर्मों के अनुसार उनके लिये धन देता और जो खोटे आचरण करते हैं, उनको उनके कर्मों के अनुसार दण्ड देता है, जो ईश्वर की आज्ञा में वर्तमान धर्मात्मा थोड़े भी युद्ध के पदार्थों से युद्ध करने को प्रवृत्त होते हैं, ईश्वर उन्हीं को विजय देता है, औरों को नहीं॥६॥

पुनरीश्वरो जीवेभ्यः कि करोतीत्युपदिश्यते॥

फिर वह ईश्वर जीवों के लिये क्या करता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।।