ऋग्वेद 1.31.4

त्वम॑ग्ने मनवे द्याम॑वाशयः पुरूरवसे सुकृतै सुकृत्तरः।

श्त्रेण यत्पित्रोर्मुच्य॑से पर्या त्वा पूर्वमनयन्नापरं पुनः॥४॥

त्वम्। अग्ने। मनवेद्याम्। अवाशयः। पुरूरवसे। सुऽकृतसुकृत्तरः। श्वत्रेणी यत्पित्रोःमुच्य॑से। परि आ। त्वा। पूर्वम्। अनयन्। आ। अपरम्। पुनरिति॥ ४॥ ___

पदार्थ:-(त्वम्) सर्वप्रकाशकः (अग्ने) परमेश्वर (मनवे) मन्यते जानाति विद्याप्रकाशेन सर्वव्यवहारं तस्मै ज्ञानवते मनुष्याय (द्याम्) सूर्य्यलोकम् (अवाशयः) प्रकाशितवान् (पुरूरवसे) पुरवो बहवो रवा शब्दा यस्य विदुषस्तस्मै। पुरूरवा बहुधा रोरूयते। (निरु०१०.४६) पुरूरवा इति पदनामसु पठितम्। (निघं०५.४) अनेन ज्ञानवान् मनुष्यो गृह्यते। अत्र पुरूपदाद् रु शब्द इत्यस्मात् पुरूरवाः(उणा०४.२३७) इत्यसुन् प्रत्ययान्तो निपातितः। (सुकृते) यः शोभनानि कर्माणि करोति तस्मै (सुकृत्तर:) योऽतिशयेन शोभनानि करोतीति सः (श्वात्रेण) धनेन विज्ञानेन वा। श्वात्रामिति धननामसु पठितम्(निघं०२.१०) पदनामसु च। (निघं०४.२) (यत्) यं यस्य वा (पित्रोः) मातुः पितुश्च सकाशात्(मुच्यसे) मुक्तो भवसि (परि) सर्वतः (आ) अभितः (त्वा) त्वां जीवम् (पूर्वम्) पूर्वकल्पे पूर्वजन्मनि वा वर्तमानं देहम् (पुन:) पश्चादर्थे।।४।।

अन्वयः-हे अग्ने जगदीश्वर ! सुकृत्तरस्त्वं पुरूरवसे सुकृते मनवे द्यामवाशयः श्वात्रेण सह वर्त्तमानं त्वां विद्वांसः पूर्वं पुनरपरं चानयन् प्राप्नुवन्ति। हे जीव! ये त्वां श्वात्रेण सह वर्तमानं पूर्वमपरं च देहं विज्ञापयन्ति यद्यतः समन्ताद् दुःखान्मुक्तो भवसि, यस्य च नियमेन त्वं पित्रोः सकाशान्महाकल्पान्ते पुनरागच्छसि, तस्य सेवनं ज्ञानं च कुरु॥४॥

भावार्थ:-येन जगदीश्वरेण सूर्यादिकं जगद्रचितं येन विदुषा सुशिक्षा ग्राह्यते तस्य प्राप्तिः सुकृतेः कर्मभिर्भवति चक्रवर्तिराज्यादिधनस्य चेति॥४॥

पदार्थ:-हे (अग्ने) जगदीश्वर! (सुकृत्तरः) अत्यन्त सुकृत कर्म करने वाले (त्वम्) सर्व प्रकाशक आप (पुरूरवसे) जिसके बहुत से उत्तम-उत्तम विद्यायुक्त वचन हैं और (सृकृते) अच्छे-अच्छे कामों को करने वाला है, उस (मनवे) ज्ञानवान् विद्वान् के लिये (द्याम्) उत्तम सूर्यलोक को (अवाशयः) प्रकाशित किये हुए हैं। विद्वान् लोग (श्वात्रेण) धन और विज्ञान के साथ वर्तमान (पूर्वम्) पूर्वकल्प वा पूर्वजन्म में प्राप्त होने योग्य और (अपरम्) इसके आगे जन्म-मरण आदि से अलग प्रतीत होने वाले आपको (पुनः) बार-बार (अनयन्) प्राप्त होते हैं। हे जीव! तू जिस परमेश्वर को वेद और विद्वान् लोग उपदेश से प्रतीत कराते हैं, जो (त्वा) तुझे (श्वात्रेण) धन और विज्ञान के साथ वर्तमान (पूर्वम्) पिछले (अपरम्) अगले देह को प्राप्त कराता है और जिसके उत्तम ज्ञान से मुक्त दशा में (पित्रोः) माता और पिता से तू (पर्यामुच्यसे) सब प्रकार के दुःख से छूट जाता तथा जिसके नियम से मुक्ति से महाकल्प के अन्त में फिर संसार में आता है, उसका विज्ञान वा सेवन तू (आ) अच्छे प्रकार कर॥४॥ ___

भावार्थ:-जिस जगदीश्वर ने सूर्य आदि जगत् रचा वा जिस विद्वान् से सुशिक्षा का ग्रहण किया जाता है उस परमेश्वर वा विद्वान् की प्राप्ति अच्छे कर्मों से होती है तथा चक्रवर्त्ति राज्य आदि धन का सुख भी वैसे ही होता है।॥४॥

पुनः स उपदिश्यते॥

_ फिर अगले मन्त्र में उसी का प्रकाश किया है 

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