शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

ऋग्वेद 1.31.12

 त्वं नौ अग्ने तव देव पायुभिर्मघोनौ रक्ष तन्व॑श्च वन्द्य।

ाता तोकस्य तनये गामस्य निमेषं रक्षमाणस्तव व्रते॥१२॥

त्वम्। नःअग्नेतवा देवा पायुऽभिःमघोनः। रक्षा तन्वः। च। वन्द्या वाता। तोकस्य। तनये। गाम्। असि। अनिऽमेषम्। रक्षमाणः। तव। वृते।। १२॥

पदार्थ:-(त्वम्) सभेशः (नः) अस्माकमस्मान् वा (अग्ने) सर्वाभिरक्षक (तव) सर्वाधिपतेः (देव) सर्वसुखदातः (पायुभिः) रक्षादिव्यवहारैः (मघोनः) मघं प्रशस्तं धनं विद्यते येषां तान्। अत्र प्रशंसार्थे मतुप्। मघमिति धननामधेयम्। (निघं०२.१०) (रक्ष) पालय (तन्व:) शरीराणि। अत्र सुपां सुलुग्० इति शसः स्थाने जस्। (वन्द्य) स्तोतुमर्ह (त्राता) रक्षक (तोकस्य) अपत्यस्य। तोकमित्यपत्यनामसु पठितम्। (निघं०२.२) (तनये) विद्याशरीरबलवर्धनाय प्रवर्त्तमाने पुत्रे। तनयमित्यपत्यनामसु पठितम्। (निघं०२.२) (गवाम्) मनआदीन्द्रियाणां चतुष्पदां वा (अस्य) प्रत्यक्षाप्रत्यक्षस्य संसारस्य (अनिमेषम्) प्रतिक्षणम् (रक्षमाणः) रक्षन् सन्। अत्र व्यत्ययेन शानच् (तव) प्रजेश्वरस्य (व्रते) सत्यपालनादिनियम।।१२।।

अन्वयः-हे देव वन्द्याग्ने सभेश्वर ! तव व्रते वर्तमानान् मघोनो नोस्मान् अस्माकं वा तन्वस्तपूँश्च पायुभिस्त्वमनिमेषं रक्ष तथा रक्षमाणस्त्वं तव व्रते वर्तमानस्य तोकस्य गवामस्य संसारस्य चानिमेषं च तनये त्राता भव॥१२॥

भावार्थ:-सभापती राजा परमेश्वरस्य जगद्धारणपालनादिगुणैरिवोत्तमगुणे राज्यनियमप्रवृत्ताञ्जनान् सततं रक्षेत्।।१२॥ ___

पदार्थ:-हे (देव) सब सुख देने और (वन्द्य) स्तुति करने योग्य (अग्ने) तथा यथोचित सबकी रक्षा करने वाले सभेश्वर! (तव) सर्वाधिपति आपके (व्रते) सत्य पालन आदि नियम में प्रवृत्त और (मघोनः) प्रशंसनीय धनयुक्त (न:) हम लोगों को और हमारे (तन्व:) शरीरों को (पायुभिः) उत्तम रक्षादि व्यवहारों से (अनिमेषम्) प्रतिक्षण (रक्ष) पालिये (रक्षमाणः) रक्षा करते हुए आप जो कि आपके उक्त नियम में वर्तमान (तोकस्य) छोटे-छोटे बालक वा (गवाम्) प्राणियों की मन आदि इन्द्रियाँ और गाय बैल आदि पशु हैं उनके तथा (अस्य) सब चराचर जगत् के प्रतिक्षण (त्राता) रक्षक अर्थात् अत्यन्त आनन्द देने वाले हूजिये।।१२॥

भावार्थ:-सभापति राजा ईश्वर के जो संसार की धारणा और पालना आदि गुण हैं उनके तुल्य उत्तम गुणों से अपने राज्य के नियम में प्रवृत्तजनों को निरन्तर रक्षा करे।।१२।___

पुनरग्निगुणः सभापतिरुपदिश्यते॥

अब अगले मन्त्र में भौतिक अग्नि गुणयुक्त सभा स्वामी का उपदेश किया है।।

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