ऋग्वेद 1.30.9

  अनु प्र॒त्नस्यौकसो हुवे तुविप्रति नरम्यं

ते पूर्व पता हुवे॥९॥

अनु। प्रत्नस्या ओकसः। हुवे। तुवऽप्रतिम्। नरम्। यम्। ते। पूर्वम्। पिता। हुवे॥९॥

पदार्थः-(अनु) पश्चादर्थे (प्रत्नस्य) सनातनस्य कारणस्य। प्रत्नमिति पुराणनामसु पठितम्(निघं०३.२७) अत्र त्नप् प्रगस्य छन्दसि गलोपश्च। (अष्टा० वा० ४.३.२३) अनेन प्रशब्दात्तनप् प्रत्ययः

(ओकस:) सर्वनिवासार्थस्याकाशस्य (हुवे) स्तौमि (तुविप्रतिम्) तुवीनां बहूनां पदार्थानां प्रतिमातरम्। अत्रैकदेशेन प्रतिशब्देन प्रतिमातृशब्दार्थो गृह्यते। (नरम्) सर्वस्य जगतो नेतारम् (यम्) जगदीश्वरं सभासेनाध्यक्ष वा (ते) तव (पूर्वम्) प्रथमम् (पिता) जनक आचार्यो वा (हुवे) गृह्णात्याह्वयति। अत्र बहुलं छन्दसि इति शपो लुगात्मनेपदं च॥९॥ ___

अन्वयः-हे मनुष्य! ते पिता यं प्रत्नस्यौकसः सनातनस्य कारणस्य सकाशात् तुविप्रति बहुकार्यप्रतिमातारं नरं परमेश्वरं सभासेनाध्यक्ष वा पूर्व हुवे तमेवाहमनुकूलं हुवे स्तौमि॥९॥ ___

भावार्थ:-ईश्वरो मनुष्यानुपदिशति। हे मनुष्या! युष्माभिरेवमन्यान् प्रत्युपदेष्टव्यं योऽनादिकारणस्य सकाशादनेकविधानि कार्याण्युत्पादयति। किञ्च यस्योपासनं पूर्वे कृतवन्तः कुर्वन्ति करिष्यन्ति च तस्येवोपासनं नित्यं कर्त्तव्यमिति। अत्र कञ्चित्प्रति कश्चित् पृच्छेत्त्वं कस्योपासनं करोषीति तस्मा उत्तरं दद्यात् यस्योपासनं तव पिता करोति यस्य च सर्वे विद्वांसः। यं वेदा निराकारं सर्वव्यापिनं सर्वशक्तिमन्तमजमनादिस्वरूपं जगदीश्वरं प्रतिपादयन्ति तमेवाहं नित्यमुपासे॥९॥

पदार्थ:-हे मनुष्य! (ते) तेरा (पिता) जनक वा आचार्य (यम्) जिस (प्रत्नस्य) सनातन कारण वा (ओकसः) सबके ठहरने योग्य आकाश के सकाश से (तुविप्रतिम्) बहुत पदार्थों को प्रसिद्ध करने और (नरम्) सबको यथायोग्य कार्यों में लगाने वाले परमेश्वर वा सभाध्यक्ष का (पूर्वम्) पहिले (हुवे) आह्वान करता रहा उन का मैं भी (अनुहुवे) तदनुकूल आह्वान वा स्तवन करता हूं॥९॥

भावार्थ:-ईश्वर मनुष्यों को उपदेश करता है कि हे मनुष्यो! तुम को औरों के लिये ऐसा उपदेश करना चाहिये कि जो अनादि कारण से अनेक प्रकार के कार्यों को उत्पन्न करता है तथा जिस की उपासना पहिले विद्वानों ने की वा अब के करते और अगले करेंगे, उसी की उपासना नित्य करनी चाहिये। इस मन्त्र में ऐसा विषय है कि कोई किसी से पूछे कि तुम किस की उपासना करते हो? उसके लिये ऐसा उत्तर देवे कि जिसकी तुम्हारे पिता वा सब विद्वान् जन करते तथा वेद जिस निराकर, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, अज और अनादि स्वरूप जगदीश्वर का प्रतिपादन करते हैं, उसी की उपासना मैं निरन्तर करता हूं॥९॥

अथोक्तस्येश्वरस्य प्रार्थनाविषय उपदिश्यते।।

अब ईश्वर की प्रार्थना के विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।। 

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