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ऋग्वेद 1.30.10

  तं त्वा वयं विश्ववारा शास्महे पुरुहूत

सखै वसो जरितृभ्यः॥१०॥२९॥

तम्। त्वा। व॒यम्। विश्वऽवार। आ। शास्महे। पुरुऽहूत। सखै। वो इति। ज़रितृऽभ्यः॥ १०॥

पदार्थ:-(तम्) पूर्वोक्तं परमेश्वरम् (त्वा) त्वाम् (यम्) उपासनामभीप्सवः (विश्ववार) विश्वं वृणीते सम्भाजयति तत्सम्बुद्धौ (आ) समन्तात् (शास्महे) इच्छामः (पुरुहूत) पुरुभिर्बहुभिराहूयते स्तूयतेयस्तत् सम्बुद्धौ (सखे) मित्र (वसो) वसन्ति सर्वाणि भूतानि यस्मिन् यो वा सर्वेषु भूतेषु वसति तत्सम्बुद्धौ (जरितृभ्यः) स्तावकेभ्यो धार्मिकेभ्यो विद्वद्भयो मनुष्येभ्यः॥१०॥ ___

अन्वयः-हे विश्ववार पुरुहूत वसो सखे जगदीश्वर! पूर्वप्रतिपादितं त्वां वयं जरितृभ्य आशास्महे भवद्विज्ञानप्रकाशमिच्छाम इति यावत्।।१०।।

भावार्थ:-मनुष्यैर्विदुषां सङ्गमेनैवास्य सर्वरचकस्य सर्वपूज्यस्य सर्वमित्रस्य सर्वाधारस्य पूर्वमन्त्रप्रतिपादितस्य परमेश्वरस्य विज्ञानमुपासनं नित्यमन्वेष्टव्यम्, कुतो नैव विदुषामुपदेशेन विना कस्यापि यथार्थतया विज्ञानं भवितमर्हति।।१०।।

पदार्थ-हे (विश्ववार) संसार को अनेक प्रकार सिद्ध करने (पुरुहूत) सब से स्तुति को प्राप्त होने (वसो) सब में रहने वा सबको अपने में बसाने वाले (सखे) सबके मित्र जगदीश्वर! (तम्) पूर्वोक्त (त्वा) आपकी (वयम्) हम लोग (जरितृभ्यः) स्तुति करने वाले धार्मिक विद्वानों से (आ) सब प्रकार से (शास्महे) आशा करते हैं अर्थात् आपके विशेष ज्ञान प्रकाश की इच्छा करते हैं।॥१०॥

भावार्थ:-मनुष्यों को विद्वानों के समागम ही से सब जगत् के रचने, सबके पूजने योग्य, सबके मित्र, सबके आधार, पिछले मन्त्र से प्रतिपादित किये हुए परमेश्वर के विज्ञान वा उपासना की नित्य इच्छा करनी चाहिये, क्योंकि विद्वानों के उपदेश के विना किसी को यथायोग्य विशेष ज्ञान नहीं हो सकता है।॥१०॥

पुनः सभासेनाध्यक्षप्राप्तीच्छाकरणमुपदिश्यते।।

फिर सभा सेनाध्यक्ष के प्राप्त होने की इच्छा करने का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।।