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ऋग्वेद 1.28.9

उच्छिष्टं चम्वोर्भर सोमं पवित्र आ सृज

नि धेहि गोरधि त्वचि।। ९॥२६॥

उत्। शिष्टम्। चुम्वोभर। सोम॑म्। पवित्रे। आसृज। नि। धेहि। गोःअधि। त्वचि॥९॥

पदार्थ:-(उत्) उत्कृष्टार्थे क्रियायोगे (शिष्टम्) शिष्यते यस्तम् (चम्वोः) पदातिहस्त्यश्वादिरूढयोः सेनयोरिव (भर) धर (सोमम्) सर्वरोगनाशकबलपुष्टिबुद्धिवर्द्धकमुत्तमौषध्यभिषवम् (पवित्रे) शुद्धे सेविते (आ) समन्तात् (सृज) निष्पादय (नि) नितराम् (धेहि) संस्थापय (गो:) पृथिव्याः। गौरिति पृथिवीनामसु पठितम्। (निघं०१.१) (अधि) उपरि (त्वचि) पृष्ठे।।९।।

अन्वयः-हे विद्वंस्त्वं चम्बोरिव शिष्टं सोममुद्भर तेनोभे सेने पवित्रे आसृज गोः पृथिव्या अधि त्वचि ते निधेहि नितरां संस्थापय॥९॥

भावार्थ:-राजपुरुषादिभिर्द्विविधे सेने सम्पादनीये एका यानारूढा द्वितीया पदातिरूपा तदर्थमुत्तमा रसाः शस्त्रादिसामग्रयश्च सम्पादनीयाः सुशिक्षयौषधादिदानेन च शुद्धबले सर्वरोगरहिते सगृह्य पृथिव्या उपरि चक्रवर्तिराज्यं नित्यं सेवनीयमिति।।९।__

सप्तविंशेन सूक्तेनाग्निर्विद्वाँसश्चोक्तास्तैर्मुसलोलूखलादीनि साधनानि गृहीत्वौषध्यादिभ्यो जगत्स्थपदार्थेभ्यो बहुविधा उत्तमाः पदार्थाः सम्पादनीया इत्यस्मिन्सूक्ते प्रतिपादनात् सप्तविंशसूक्तोक्तार्थेन सहास्याष्टाविंशसूक्तार्थस्य सङ्गतिरस्तीति बोध्यम्॥९॥ ___

इति प्रथमाष्टके द्वितीयाध्याये षड्विंशो वर्गः॥

प्रथमण्डले षष्ठेऽनुवाकेऽष्टाविशं सूक्तं च समाप्तम्।। २८॥

पदार्थ:-हे विद्वान् तुम (चम्वोः) पैदल और सवारों की सेनाओं के समान (शिष्टम्) शिक्षा करने योग्य (सोमम्) सर्व रोगविनाशक बलपुष्टि और बुद्धि को बढ़ाने वाले उत्तम ओषधि के रस को (उद्भर) उत्कृष्टता से धारण कर उस से दो सेनाओं को (पवित्रे) उत्तम (आसृज) कीजिये (गोः) पृथिवी के (अधि) ऊपर अर्थात् (त्वचि) उस की पीठ पर सेनाओं को (निधेहि) स्थापन करो।।९॥

भावार्थ:-राजपुरुषों को चाहिये कि दो प्रकार की सेना रक्खें अर्थात् एक तो सवारों की दूसरी पैदलों की, उनके लिये उत्तम रस और शस्त्र आदि सामग्री इकट्ठी करें अच्छी शिक्षा और औषधि देकर शुद्ध बलयुक्त और नीरोग कर पृथिवी पर एक चक्रराज्य नित्य करें।।९॥

सत्ताईसवें सूक्त से अग्नि और विद्वान् जिस-जिस गुण को कहे हैं, वे मूसल और ऊखली आदि साधनों को ग्रहण कर औषध्यादि पदार्थों से संसार के पदार्थों से अनेक प्रकार के उत्तम-उत्तम पदार्थ उत्पन्न करें, इस अर्थ का इस सूक्त में सम्पादन करने से सत्ताईसवें सूक्त के कहे हुए अर्थ के साथ अट्ठाईसवें सूक्त की सङ्गति है, यह जानना चाहिये।।९।।

इति प्रथमाष्टके द्वितीयाध्याये षड्विशो वर्गः ॥२६॥ प्रथमण्डले षष्ठेऽनुवाकेऽष्टाविशं सूक्तं च समाप्तम्॥२८॥ [प्रथम अष्टक के द्वितीय अध्याय में छब्बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ तथा प्रथम मण्डल में छठे अनुवाक में

अट्ठाईसवाँ सूक्त समाप्त हुआ।]उच्छिष्टं चम्वोर्भर सोमं पवित्र आ सृज

नि धेहि गोरधि त्वचि।। ९॥२६॥

उत्। शिष्टम्। चुम्वोभर। सोम॑म्। पवित्रे। आसृज। नि। धेहि। गोःअधि। त्वचि॥९॥

पदार्थ:-(उत्) उत्कृष्टार्थे क्रियायोगे (शिष्टम्) शिष्यते यस्तम् (चम्वोः) पदातिहस्त्यश्वादिरूढयोः सेनयोरिव (भर) धर (सोमम्) सर्वरोगनाशकबलपुष्टिबुद्धिवर्द्धकमुत्तमौषध्यभिषवम् (पवित्रे) शुद्धे सेविते (आ) समन्तात् (सृज) निष्पादय (नि) नितराम् (धेहि) संस्थापय (गो:) पृथिव्याः। गौरिति पृथिवीनामसु पठितम्। (निघं०१.१) (अधि) उपरि (त्वचि) पृष्ठे।।९।।

अन्वयः-हे विद्वंस्त्वं चम्बोरिव शिष्टं सोममुद्भर तेनोभे सेने पवित्रे आसृज गोः पृथिव्या अधि त्वचि ते निधेहि नितरां संस्थापय॥९॥

भावार्थ:-राजपुरुषादिभिर्द्विविधे सेने सम्पादनीये एका यानारूढा द्वितीया पदातिरूपा तदर्थमुत्तमा रसाः शस्त्रादिसामग्रयश्च सम्पादनीयाः सुशिक्षयौषधादिदानेन च शुद्धबले सर्वरोगरहिते सगृह्य पृथिव्या उपरि चक्रवर्तिराज्यं नित्यं सेवनीयमिति।।९।__

सप्तविंशेन सूक्तेनाग्निर्विद्वाँसश्चोक्तास्तैर्मुसलोलूखलादीनि साधनानि गृहीत्वौषध्यादिभ्यो जगत्स्थपदार्थेभ्यो बहुविधा उत्तमाः पदार्थाः सम्पादनीया इत्यस्मिन्सूक्ते प्रतिपादनात् सप्तविंशसूक्तोक्तार्थेन सहास्याष्टाविंशसूक्तार्थस्य सङ्गतिरस्तीति बोध्यम्॥९॥ ___

इति प्रथमाष्टके द्वितीयाध्याये षड्विंशो वर्गः॥

प्रथमण्डले षष्ठेऽनुवाकेऽष्टाविशं सूक्तं च समाप्तम्।। २८॥

पदार्थ:-हे विद्वान् तुम (चम्वोः) पैदल और सवारों की सेनाओं के समान (शिष्टम्) शिक्षा करने योग्य (सोमम्) सर्व रोगविनाशक बलपुष्टि और बुद्धि को बढ़ाने वाले उत्तम ओषधि के रस को (उद्भर) उत्कृष्टता से धारण कर उस से दो सेनाओं को (पवित्रे) उत्तम (आसृज) कीजिये (गोः) पृथिवी के (अधि) ऊपर अर्थात् (त्वचि) उस की पीठ पर सेनाओं को (निधेहि) स्थापन करो।।९॥

भावार्थ:-राजपुरुषों को चाहिये कि दो प्रकार की सेना रक्खें अर्थात् एक तो सवारों की दूसरी पैदलों की, उनके लिये उत्तम रस और शस्त्र आदि सामग्री इकट्ठी करें अच्छी शिक्षा और औषधि देकर शुद्ध बलयुक्त और नीरोग कर पृथिवी पर एक चक्रराज्य नित्य करें।।९॥

सत्ताईसवें सूक्त से अग्नि और विद्वान् जिस-जिस गुण को कहे हैं, वे मूसल और ऊखली आदि साधनों को ग्रहण कर औषध्यादि पदार्थों से संसार के पदार्थों से अनेक प्रकार के उत्तम-उत्तम पदार्थ उत्पन्न करें, इस अर्थ का इस सूक्त में सम्पादन करने से सत्ताईसवें सूक्त के कहे हुए अर्थ के साथ अट्ठाईसवें सूक्त की सङ्गति है, यह जानना चाहिये।।९।।

इति प्रथमाष्टके द्वितीयाध्याये षड्विशो वर्गः ॥२६॥ प्रथमण्डले षष्ठेऽनुवाकेऽष्टाविशं सूक्तं च समाप्तम्॥२८॥ [प्रथम अष्टक के द्वितीय अध्याय में छब्बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ तथा प्रथम मण्डल में छठे अनुवाक में

अट्ठाईसवाँ सूक्त समाप्त हुआ।]