शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

ऋग्वेद 1.29.1

 अथ सप्तर्चस्यैकोनत्रिंशस्य सूक्तस्याजीगर्त्तिः शुन:शेप ऋषिः। इन्द्रो देवता। पङ्क्तिश्छन्दः।

पञ्चमः स्वरः॥

अथेन्द्रशब्देन न्यायाधीशगुणा उपदिश्यन्ते।

अब उनतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उस के पहिले मन्त्र में इन्द्र शब्द से न्यायाधीश के गुणों का प्रकाश किया है।

यच्चिद्धि सत्य सोमपा अनाशस्ताइव स्मसि

आ तू न इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्व॑षु शुभ्रिषु स॒हस्रेषु तुवीमघा॥ १॥

यत्। चित्। हि। सत्य। सोमऽपाः। अनाशस्ताऽइव। स्मसि। आतु। नः। इन्द्र। शंसय। गोषु। अश्वेषुशुभ्रषु। सहस्रेषु। तुविऽमघ॥ १॥

पदार्थः-(यत्) येषु (चित्) अपि (हि) खलु (सत्य) अविनाशिस्वरूप सत्सु साधो (सोमपाः) सोमानुत्पन्नान् सर्वान् पदार्थान् पाति रक्षति तत्सम्बुद्धो (अनाशस्ताइव) अप्रशस्तगुणसामर्थ्या इव (स्मसि) भवामः । इदन्तो मसि इति इदागमः। (आ) समन्तात् (तु) पुनरर्थे। ऋचि तुनु० इति दीर्घः। (न:) अस्मान् (इन्द्र) प्रशस्तैश्वर्यप्राप्त (शंसय) प्रशस्तान् कुरु (गोषु) पश्विन्द्रियपृथिवीषु (अश्वेषु) वेगाग्निहयेषु (शुभ्रिषु) शोभनसुखप्रदेषु (सहस्रेषु) असंख्यातेषु (तुविमघ) तुवि बहुविधं मघं पूज्यतमं धनं विद्यते यस्य तत्सम्बुद्धौ अन्येषामपि दृश्यत इति पूर्वपदस्य दीर्घः॥१॥ __

अन्वयः-हे सोमपास्तुविमघ सत्येन्द्रन्यायाधीशत्वमनाशस्ताइव वयं यच्चित् स्मसि तू (न:) तानस्माँश्चतुःसहस्रेषु शुभ्रिषु गोष्वश्वेषु हि खल्वाशंसय।।१॥

भावार्थ:-अत्रोपमालङ्कारः। यथाऽऽलस्येनाश्रेष्ठामनुष्या भवन्ति, तद्वद्वयमपि यदि कदाचिदलसा भवेम तानस्मान् प्रशस्तपुरुषार्थगुणान् सम्पादयतु, यतो वयं पृथिव्यादिराज्यं बहूनुत्तमान् हस्त्यश्वगवादिपशून् प्राप्य पालित्वा वर्द्धिवा तेभ्य उपकारेण प्रशस्ता भवेमेति॥१॥

पदार्थ:-हे (सोमपाः) उत्तम पदार्थों की रक्षा करने वाले (तुविमघ) अनेक प्रकार के प्रशंसनीय धनयुक्त (सत्य) अविनाशिस्वरूप (इन्द्र) उत्तम ऐश्वर्य प्रापक न्यायाधीश! आप (यच्चित्) जो कभी हम लोग (अनाशस्ताइव) अप्रशंसनीय गुण सामर्थ्य वालों के समान (स्मसि) हों (तु) तो (नः) हम लोगों को (सहस्रेषु) असंख्यात (शुभ्रिषु) अच्छे सुख देने वाले (गोषु) पृथिवी इन्द्रियाँ वा गो बैल (अश्वेषु) घोड़े आदि पशुओं में (हि) ही (आशंसय) प्रशंसा वाले कीजिये।१।।

भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे आलस्य के मारे अश्रेष्ट अर्थात् कीर्तिरहित मनुष्य होते हैं, वैसे हम लोग भी जो कभी हों तो यह न्यायाधीश हम लोगों को प्रशंसनीय पुरुषार्थ और गुणयुक्त कीजिये, जिससे हम लोग पृथिवी आदि राज्य और बहुत उत्तम-उत्तम हाथी, घोड़े, गौ, बैलआदि पशुओं को प्राप्त होकर उनका पालन वा उनकी वृद्धि करके उनके उपकार से प्रशंसा वाले हों॥१॥ ___

पुनः स ऐश्वर्ययुक्तः कीदृश इत्युपदिश्यते।।

फिर वह विभूतियुक्त सभाध्यक्ष कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है

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