गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

ऋग्वेद 1.24.8

 शतं ते राजन् भषजः सहस्रमुर्वी गभीरा सुमतिष्टै अस्तु।

बाधस्व दूरे निरृति पराचैः कृतं चिदेनः प्र मुमुध्य॒स्मत्॥९॥

शतम्। ते। राजन्। भिषजः। सहस्रम्। उर्वी। गभीरा। सुऽमतिः। ते। अस्तु। बाधस्व। दूरे। निःऽर्ऋतिम्। पराचैः। कृतम्। चित्। एनः। प्रा मुमुग्धि। अस्मत्॥९॥

पदार्थ:-(शतम्) असंख्यातान्यौषधानि (ते) तव राज्ञः प्रजापुरुषस्य वा (राजन्) प्रकाशमान (भिषजः) सर्वरोगनिवारकस्य वैद्यस्य (सहस्रम्) असंख्याता (उी) विस्तीर्णा भूमिः (गभीराः) अगाधा (सुमतिः) शोभना चासो मतिर्विज्ञानं यस्य सः (ते) तव। अत्र युष्मत्तत्ततक्षु० (अष्टा०८.३.१०३) अनेन मूर्द्धन्यादेशः (अस्तु) भवतु (बाधस्व) दुष्टशत्रून् दोषान् वा निवारय (दूरे) विप्रकृष्टे (निर्ऋतिम्) भूमिम्। निर्ऋतिरिति पृथिवीनामसु पठितम्। (निघ०१.१) (पराचैः) धर्मात् पराङ्मुखैः। अत्र बहुलं छन्दसि इति भिस ऐस्भावः कृतः (कृतम्) आचरितम् (चित्) एव (एनः) पापम् (प्र) प्रकृष्टार्थे (मुमुग्धि) त्यज मोचय वा। अत्र बहुलं छन्दसि इति शप:श्लु। (अस्मत्) अस्माकं सकाशात्॥९॥

अन्वयः-हे राजन् प्रजाजन वा! यस्य भिषजस्ते तव शतमौषधानि सहस्रसंख्याता गम्भीरो: भूमिरस्ति, तां त्वं सुमतिर्भूत्वा निर्ऋतिं भूमि रक्ष, दुष्टस्वभावं प्राणिनं दुष्कर्मणः प्रमुमुग्धि, यत्पराचैः कृतमेनोऽस्ति तदस्मद्दूरे रक्षैतान् पराचो दुष्टान् स्वस्वकर्मानुसारफलदानेन बाधस्वास्मान् शत्रुचोरदस्युभयाख्यात् पापात् प्रमुमुग्धि सम्यग् विमोचय॥९॥

भावार्थ:-अत्र श्लेषालङ्कारः। मनुष्यैर्यो राजप्रजाजनौ पापसर्वरोगनिवारको पृथिव्याधारकावुत्कृष्टबुद्धिप्रदातारौ धार्मिकेभ्यो बलप्रदानेन दुष्टानां बाधनहेतूभवतस्तावेव नित्यं सङ्गन्तव्यौ नैव कस्यचित् पापं भोगेन विना निवर्त्तते, किन्तु यद्भूतवर्तमानभविष्यत्काले च पापं कृतवान् करोति करिष्यति वा तन्निवारणार्थाः खलु प्रार्थनोपदेशपुरुशषार्था भवन्तीति वेदितव्यम्॥९॥ ____

पदार्थः-(राजन्) हे प्रकाशमान प्रजाध्यक्ष प्रजाजन वा जिस (भिषजः) सर्व रोग निवारण करने वाले (ते) आपकी (शतम्) असंख्यात औषधि और (सहस्रम्) असंख्यात (गभीरा) गहरी (उर्वी) विस्तारयुक्त भूमि है, उस (निर्ऋतिम्) भूमि की (त्वम्) आप (सुमतिः) उत्तम बुद्धिमान् होके रक्षा करो,जो दुष्ट स्वभावयुक्त प्राणी को (प्रमुमुग्धि) दुष्ट कर्मों को छुड़ादे और जो (पराचैः) धर्म से अलग होने वालों ने (कृतम्) किया हुआ (एनः) पाप है, उसको (अस्मत्) हम लोगों से (दूरे) दूर रखिये और उन दुष्टों को उनके कर्म के अनुकूल फल देकर आप (बाधस्व) उनकी ताड़ना और हम लोगों के दोषों को भी निवारण किया कीजिये।।९।

भावार्थ:-इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को जानना चाहिये कि जो सभाध्यक्ष और प्रजा के उत्तम मनुष्य पाप वा सर्वरोग निवारण और पृथिवी के धारण करने, अत्यन्त बुद्धि बल देकर दुष्टों को दण्ड दिलवाने वाले होते हैं, वे ही सेवा के योग्य हैं और यह भी जानना कि किसी का किया हुआ पाप भोग के विना निवृत्त नहीं होता और इसके निवारण के लिये कुछ परमेश्वर की प्रार्थना वा अपना पुरुषार्थ करना भी योग्य ही है, किन्तु यह तो है जो कर्म जीव वर्तमान में करता वा करेगा, उसकी निवृत्ति के लिये तो परमेश्वर की प्रार्थना वा उपदेश भी होता है।॥९॥ ___य उपरि लोका दृश्यन्ते ते कस्योपरि सन्ति केन धार्यन्त इत्युपदिश्यते।।

जो लोक अन्तरिक्ष में दिखाई पड़ते हैं, वे किस के ऊपर वा किसने धारण किये हैं, इस विषय ___ का उपदेश अगले मन्त्र में किया है

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