गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

ऋग्वेद 1.24.14

 उर्दुत्तमं वरुण पाशम॒स्मदाधुमं वि मध्यमं श्रथाय

अा वयादित्य व्रते तवानागो अदितये स्याम।। १५॥१५॥

उत्। उत्तमम्। वरुण। पार्शम्। अस्मत्। अव। अधमम्। वि। मध्यमम्। श्रृथाय। अ। वयम्। आदित्य। वृते। तवा अागसः। अदितये। स्याम।। १५॥

पदार्थ:-(उत्) अपि (उत्तमम्) उत्कृष्टं दृढम् (वरुण) स्वीकर्तुमर्हेश्वर (पाशम्) बन्धनम् (अस्मत्) अस्माकं सकाशात् (अव) क्रियार्थे (अधमम्) निकृष्टम् (वि) विशेषार्थे (मध्यमम्) उत्तमाधमयोर्मध्यस्थम् (श्रथाय) शिथिली कुरु। अत्र छन्दसि शायजपि। (अष्टा०३.१.८४) अनेन शायजादेशः। (अथ) अनन्तरार्थे। अत्र निपातस्य च इति दीर्घः। (वयम्) मनुष्यादयः प्राणिनः (आदित्य) विनाशरहित (व्रते) सत्याचरणादावचरिते सति (तव) सत्योपदेष्टुस्सर्वगुरोः (अनागसः) अविद्यमान आगोऽपराधो येषां ते (अदितये) अखण्डितसुखाय (स्याम) भवेम॥१५॥

_अन्वयः-हे वरुण! त्वमस्मदधमं मध्यममुदुत्तमं पाशं व्यवश्रथाय दूरतो विनाशयाथेत्यनन्तरं हे आदित्य! तव व्रत आचरिते सत्यनागसः सन्तो वयमदितये स्याम भवेम।।१५॥ भावार्थ:-य ईश्वराज्ञां यथावत्पालयन्ति ते पवित्रास्सन्तः सर्वेभ्यो दुःखबन्धनेभ्यः पृथग्भूत्वा नित्यं सुखं प्राप्नुवन्ति नेतर इति।।१५॥

त्रयोविंशसूक्तोक्तार्थानां वाय्वादीनामनुयोगिनां प्राजापत्यादीनामर्थानामत्र कथनादेतस्य चतुर्विंशस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गति रस्तीति बोध्यम्॥

इति प्रथमाष्टके द्वितीयाध्याये पञ्चदशो वर्गः॥

___प्रथम मण्डले षष्ठेऽनुवाके चतुर्विंशं सूक्तं च समाप्तिमगमत्॥

पदार्थ:-हे (वरुण) स्वीकार करने योग्य ईश्वर! आप (अस्मत्) हम लोगों से (अधमम्) निकृष्ट (मध्यमम्) अर्थात् निकृष्ट से कुछ विशेष (उत्) और (उत्तमम्) अति दृढ़ अत्यन्त दुःख देने वाले (पाशम्) बन्धन को (व्यवश्रथाय) अच्छे प्रकार नष्ट कीजिये (अथ) इसके अनन्तर हे (आदित्य) विनाशरहित जगदीश्वर (तव) उपदेश करने वाले सब के गुरु आपके (व्रते) सत्याचरणरूपी व्रत को करके (अनागसः) निरपराधी होके हम लोग (अदितये) अखण्ड अर्थात् विनाशरहित सुख के लिये (स्याम) नियत होवें।। १५॥

भावार्थ:-जो ईश्वर की आज्ञा को यथावत् नित्य पालन करते हैं, वे ही पवित्र और सब दुःख बन्धनों से अलग होकर सुखों को निरन्तर प्राप्त होते हैं।।१५।

तेईसवें सूक्त के कहे हुए वायु आदि अर्थों के अनुकूल प्रजापति आदि अर्थों के कहने से इस चौबीसवें सूक्त की उक्त सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये।

प्रथमाष्टक के प्रथमाध्याय में यह १५ पन्द्रहवां वर्ग तथा प्रथम मण्डल के षष्ठानुवाक में चौबीसवां सूक्त समाप्त हुआ।। २४॥

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