ऋग्वेद 1.20.3

 युाना पितरा पुनः सत्यमन्त्रा ऋजूयवः

ऋभवौ विष्टयक्रत॥४॥

युाना। पितरापुनरितिसत्यऽमन्त्राःऋजूऽयवःभवः। विष्टीअक्रत॥ ४॥

पदार्थ:-(युवाना) मिश्रामिश्रगुणस्वभावौ। अत्रोभयत्र सुपां सुलुग्० इत्याकारादेशः। (पितरा) शरीरात्मपालनहेतू (सत्यमन्त्राः) सत्यो यथार्थो मन्त्रो विचारो येषां ते (ऋजूयवः) कर्मभिरात्मन ऋजुत्वमिच्छन्तस्तच्छीलाःअत्र क्याच्छन्दसि इत्युः प्रत्ययः। (ऋभव:) मेधाविनः। ऋभव इति मेधाविनामसु पठितम्। (निघं०३.१५) (विष्टी) व्यापनशीलावश्विनौअत्र क्तिच् क्तौ च संज्ञायाम्। (अष्टा०३.१७४) अनेन क्तिच् प्रत्ययः। (अक्रत) कुर्वन्ति। अत्र लडथै लुङ्। मन्त्रे घसह्वरणश० (अष्टा० २.४.८०) इति च्लेर्लुक् च।।४।

अन्वयः-य ऋजूयवः सत्यमन्त्रा ऋभवस्ते हि विष्टी युवाना पितराऽश्विनौ क्रियासिद्धयर्थं पुनः पुनरक्रत सम्प्रयुक्तौ कुर्वन्ति।।४।।

भावार्थ:-येऽनलसाः सन्तः सत्यप्रिया आर्जवयुक्ता मनुष्याः सन्ति त एवाग्निजलादिपदार्थेभ्य उपकारं ग्रहीतुं शक्नुवन्तीति।।४।।

पदार्थ:-जो (ऋजूयवः) कर्मों से अपनी सरलता को चाहने और (सत्यमन्त्राः) सत्य अर्थात् यथार्थ विचार के करनेवाले (ऋभवः) बुद्धिमान् सज्जन पुरुष हैं, वे (विष्टी) व्याप्त होने (युवाना) मेल अमेल स्वभाव वाले तथा (पितरा) पालनहेतु पूर्वोक्त अग्नि और जल को क्रिया की सिद्धि के लिये वारम्वार (अक्रत) अच्छी प्रकार प्रयुक्त करते हैं।॥४॥

भावार्थ:-जो आलस्य को छोड़े हुए सत्य में प्रीति रखने और सरल बुद्धिवाले मनुष्य हैं, वे ही अग्नि और जल आदि पदार्थों से उपकार लेने को समर्थ हो सकते हैं।॥४॥

पुनरिमे केन कि कुर्युरित्युपदिश्यते

फिर ये किससे क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है

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