ऋग्वेद 1.20.4

 सं वो मासो अग्मतेन्द्रेण च मुरुत्वता।

आदित्येभिश्च राजभिः॥५॥१॥

सम्। वः। मासः। अग्मत। इन्द्रेण। च। मुरुत्वता। आदित्येभिः। च। राजऽभिः॥५॥

पदार्थ:-(सम्) सम्यगर्थे (व:) युष्मान् मेधाविनः (मदासः) विद्यानन्दाः। आज्जसेरसुग् इत्यसुक्। (अग्मत) प्राप्नुवन्ति। अत्र लडथै लुङ्। मन्त्रे घसह्वरणश० इति च्लेर्लुक्, गमहनजनखन० (अष्टा०६.४.३८) इत्युपधालोपः, समो गम्वृच्छिभ्याम् (अष्टा० १.३.२९) इत्यात्मनेपदं च। (इन्द्रेण) विद्युता (च) समुच्चये (मरुत्वता) मरुतः सम्बन्धिनो विद्यन्ते यस्य तेन। अत्र सम्बन्धे मतुप्। (आदित्येभिः) किरणैः सह। बहुलं छन्दसि इति भिसः स्थान ऐसभावः । (च) पुनरर्थे (राजभिः) राजयन्ते दीपयन्ते तैः ।।५।

अन्वयः-हे मेधाविनो येन मरुत्वतेन्द्रेण राजभिरादित्येभिश्च सह मदसो वो युष्मानग्मत प्राप्नुवन्ति भवन्तश्च तैः श्रीमन्तो भवन्तु॥५॥

भावार्थ:-ये विद्वांसो यदा वायुविधुद्विद्यामाश्रित्य सूर्यकिरणैराग्नेयास्त्रादीनि शस्त्राणि यानानि च निष्पादयन्ति तदा ते शत्रून् जित्वा राजानः सन्तः सुखिनो भवन्तीति।।५।।

इति प्रथमो वर्गः॥

पदार्थ:-हे मेधावि विद्वानो! तुम लोग जिन (मरुत्वता) जिसके सम्बन्धी पवन हैं, उस (इन्द्रेण) बिजुली वा (राजभिः) प्रकाशमान् (आदित्येभिः) सूर्य की किरणों के साथ युक्त करते हो, इससे (मदासः) विद्या के आनन्द (व:) तुम लोगों को (अग्मत) प्राप्त होते हैं, इससे तुम लोग उनसे ऐश्वर्य्यवाले हूजिये॥५॥

भावार्थ:-जो विद्वान् लोग जब वायु और विद्युत् का आलम्ब लेकर सूर्य की किरणों के समान आग्नेयादि अस्त्र, असि आदि शस्त्र और विमान आदि यानों को सिद्ध करते हैं, तब वे शत्रुओं को जीत राजा होकर सुखी होते हैं।।५।। ___

यह पहला वर्ग समाप्त हुआ।।

कस्यैतत्करणे सामर्थ्य भवतीत्युपदिश्यते।

उक्त कार्य के करने में किसका सामर्थ्य होता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है

Popular posts from this blog

क्या आपकी जन्म कुंडली में है अंगारक योग ?  अशुभ अंगारक दोष से हो सकती है जेल !!

श्री दुर्गा सप्तशती के 6 विलक्षण मंत्र, करेंगे हर संकट का अंत

चंद्रमा जन्म कुंडली में नीच या पाप प्रभाव में हो तो ये करें उपाय