शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

ऋग्वेद 1.19.7

 य ईय॑न्ति पर्वतान् तरः समुद्रमर्णवम्म

रुद्भिरग्न आ गहि॥७॥

ये। ईड्डय॑न्ति। पर्वतान्। तरः। समुद्रम्। अर्णवम्। मरुत्ऽभिःअग्ने। आ। गहि॥७॥

पदार्थ:-(ये) वायवः (ईडयन्ति) छेदयन्ति निपातयन्ति (पर्वतान्) मेघान्। पर्वत इति मेघनामसु पठितम्। (निघं०१.१०) (तिरः) तिरस्करणे (समुद्रम्) सम्यगुद्द्वन्त्यापो यस्मिन् तदन्तरिक्षम्समुद्र इत्यन्तरिक्षनामसु पठितम्। (निघं०१.३) (अर्णवम्) पृथिवीस्थं सागरम् (मरुद्भिः) उपर्यधोगमनशीलैर्वायुभिः (अग्ने) अग्निर्विादाख्यः (आ) अभितः (गहि) प्राप्नोति। अत्र व्यत्ययो लडर्थे लोट् च॥७॥

अन्वयः-ये वायवः पर्वतादीनीङ्खयन्ति, अर्णवं तिरस्कुर्वन्ति समुद्रं प्रपूरयन्ति तैर्मरुद्भिः सहाग्नेऽयमग्निर्विादागह्यागच्छति॥७॥ भावार्थ:-वायुयोगेनैव वृष्टिर्भवति जलं रेणवश्चोपरि गत्वाऽऽगच्छन्ति, तैः सह तन्निमित्तेन वा विद्युदुत्पद्य गृह्यते॥७॥ ____

पदार्थ:-(ये) जो वायु (पर्वतान्) मेघों को (ईङ्खयन्ति) छिन्न-भिन्न करते और वर्षाते हैं, (अर्णवम्) समुद्र का (तिरः) तिरस्कार करते वा (समुद्रम्) अन्तरिक्ष को जल से पूर्ण करते हैं, उन (मरुद्भिः) पवनों के साथ (अग्ने) अग्नि अर्थात् बिजुली (आगहि) प्राप्त होती अर्थात् सन्मुख आती जाती है।।७॥ ___

भावार्थ:-वायु के संयोग से ही वर्षा होती है और जल के कण वा रेणु अर्थात् सब पदार्थों के अत्यन्त छोटे-छोटे कण पृथिवी से अन्तरिक्ष को जाते तथा वहां से पृथिवी को आते हैं, उनके साथ वा उनके निमित्त से बिजुली उत्पन्न होती और बद्दलों में छिप जाती है।।७।

एत एव प्रकाशादिकं विस्तारयन्तीत्युपदिश्यते

ये ही प्रकाश आदि गुणों का विस्तार करते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है

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