शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

ऋग्वेद 1.19.8

 आ ये तन्वन्ति रश्मिभिस्तिरः समुद्रमोजसा। मुरुद्भिरग्न आ गहि॥८॥

आ। ये। तन्वन्ति। रश्मिभिः। तरःसमुद्रम्। ओजसा। मुरुत्ऽभिः। अग्ने। आगृहि।

पदार्थ:-(आ) अनुगतार्थे क्रियायोगे (ये) वायवः (तन्वन्ति) विस्तारयन्ति (रश्मिभिः) सूर्यकिरणैः सह (तिरः) तिरस्करणे (समुद्रम्) अन्तरिक्षं जलमयं वा (ओजसा) बलेन वेगेन वा (मरुद्भिः) तैर्धनञ्जयाख्यैः सूक्ष्मैः सह (अग्ने) अग्निः (आ) सर्वत: (गहि) प्राप्नोति। अत्र व्यत्ययो लडर्थे लोट् च॥८॥

अन्वयः-ये वायव ओजसा समुद्रमन्तरिक्षमागच्छन्ति जलमयं सागरं तिरस्कुर्वन्ति ये च रश्मिभिः सह तन्वन्ति तैर्मरुद्भिः सहाग्ने अग्निरागहि प्राप्तोऽस्ति॥८॥ ___

भावार्थः-एतेषां वायूनां प्राप्त्या सर्वे पदार्था वर्धित्वा बलहेतवो भवन्ति, तस्मान्मनुष्यैर्वाय्वग्नियोगेनानेका कार्यसिद्धिर्विभावनीयेति॥८॥

पदार्थ:-(ये) जो वायु अपने (ओजसा) बल वा वेग से (समुद्रम्) अन्तरिक्ष को प्राप्त होते तथा जलमय समुद्र का (तिरः) तिरस्कार करते हैं, तथा जो (रश्मिभिः) सूर्य की किरणों के साथ (आतन्वन्ति) विस्तार को प्राप्त होते हैं, उन (मरुद्भिः) पवनों के साथ (अग्ने) भौतिक अग्नि (आगहि) कार्य्य की सिद्धि को देता है॥८॥ __

भावार्थ:-इन पवनों की व्याप्ति से सब पदार्थ बढ़कर बल देनेवाले होते हैं, इससे मनुष्यों को वायु और अग्नि के योग से अनेक प्रकार कार्यों की सिद्धि करनी चाहिये॥८॥

पुनस्तैः कि साधनीयमित्युपदिश्यते

फिर उनसे क्या सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है

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