शनिवार, 30 जनवरी 2021

ऋग्वेद 1.2.7

 


मित्रम्। हुवे। पूतऽदक्षम्। वरुणम्। च। रिशादसम्।

धियम्। घृताचीम्। साधन्ता॥७॥

पदार्थ:-(मित्रम्) सर्वव्यवहारसुखहेतुं ब्रह्माण्डस्थं सूर्यं शरीरस्थं प्राणं वा। मित्र इति पदनामसु पठितम्। (निघं०५.४) अतः प्राप्त्यर्थः। मित्रो जनान्यातयति ब्रुवाणो मित्रो दाधार पृथिवीमुत द्याम्। मित्रः कृष्टीरनिमिाभिचष्टे मित्राय हव्यं घृतवज्जुहोत॥ (ऋ०३.५९.१) अत्र मित्रशब्देन सूर्य्यस्य ग्रहणम्। प्राणो वै मित्रोऽपानो वरुणः। (श०ब्रा०८.२.५.६) अत्र मित्रवरुणशब्दाभ्यां प्राणापानयोर्ग्रहणम्। (हुवे) तन्निमित्तां बाह्याभ्यन्तरपदार्थविद्यामादद्याम्। बहुलं छन्दसीति विकरणाभावो व्यत्ययेनात्मनेपदं लिडर्थे लट् च(पूतदक्षम्) पूतं पवित्रं दक्षं बलं यस्मिन् तम्। दक्ष इति बलनामसु पठितम्। (निघं०२.९) (वरुणं च) बहिःस्थं प्राणं शरीरस्थमपानं वा। (रिशादसम्) रिशा रोगाः शत्रवो वा हिंसिता येन तम्। (धियम्) कर्म धारणावती बुद्धि वा (घृताचीम्) घृतं जलमञ्चति प्रापयतीति तां क्रियाम्। घृतमित्युदकनामसु पठितम्। (निघ०१.१२) (साधन्ता) सम्यक् साधयन्तौ। अत्र सुपां सुलुगित्याकारादेशः॥७॥

अन्वयः-अहं शिल्पविद्यां चिकीर्षुर्मनुष्यो यौ घृताची धियं साधन्तौ वर्तेते तो पूतदक्षं मित्रं रिशादसं वरुणं च हुवे॥७॥

भावार्थ:-अत्र लुप्तोपमालङ्कारः। यथा सूर्य्यवायुनिमित्तेन समुद्रादिभ्यो जलमुपरि गत्वा तवृष्ट्या सर्वस्य वृद्धिरक्षणे भवतः, एवं प्राणापानाभ्यां च शरीरस्य। अतः सर्वैर्मनुष्यैराभ्यां निमित्तीकृताभ्यां व्यवहारविद्यासिद्धेः सर्वोपकारः सदा निष्पादनीय इति॥७॥

 पदार्थ:-मैं विद्या का चाहने (पूतदक्षम्) पवित्रबल सब सुखों के देने वा (मित्रम्) ब्रह्माण्ड और शरीर में रहनेवाले सूर्य-'मित्रो०' इस ऋग्वेद के प्रमाण से मित्र शब्द करके सूर्य का ग्रहण है-तथा (रिशादसम्) रोग और शत्रुओं के नाश करने वा (वरुणं च) शरीर के बाहर और भीतर रहनेवाला प्राणऔर अपानरूप वायु को (हवे) प्राप्त होऊ अर्थात् बाहर और भीतर के पदार्थ जिस-जिस विद्या के लिये रचे गये हैं, उन सबों को उस-उस के लिये उपयोग करूं।।७।

भावार्थ:-इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। जैसे समुद्र आदि जलस्थलों से सूर्य के आकर्षण से वायु द्वारा जल आकाश में उड़कर वर्षा होने से सब की वृद्धि और रक्षा होती है, वैसे ही प्राण और अपान आदि ही से शरीर की रक्षा और वृद्धि होती है। इसलिये मनुष्यों को प्राण अपान आदि वायु के निमित्त से व्यवहार विद्या की सिद्धि करके सब के साथ उपकार करना उचित है॥७॥

केनैतावेतत्कर्म कर्तुं समर्थो भवत इत्युपदिश्यते।

किस हेतु से ये दोनों सामर्थ्यवाले हैं, यह विद्या अगले मन्त्र में कही है

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