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ऋग्वेद 1.2.8

 ऋतेन मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा।

क्रतुं बृहन्तमाशाथे॥८॥

ऋतेन। मित्रावरुणो। ऋतऽवृधौ। ऋतस्पृशा। क्रतुम्। बृहन्तम्। आशाथे॥८॥

पदार्थः-(ऋतेन) सत्यस्वरूपेण ब्रह्मणा। ऋतमिति सत्यनामसु पठितम्। (निघं०३.१०) अनेनेश्वरस्य ग्रहणम्। ऋतमित्युदकनामसु च। (निघं०१.१२) (मित्रावरुणौ) पूर्वोक्तौ। देवताद्वन्द्वे च। (अष्टा०६.३.२६) अनेनानङादेशः(ऋतावृधौ) ऋतं ब्रह्म तेन वर्धयितारौ ज्ञापको जलाकर्षणवृष्टिनिमित्ते वा। अत्रान्येषामपि दृश्यत इति दीर्घः। (ऋतस्पृशा) ऋतस्य ब्रह्मणो वेदस्य स्पर्शयितारौ प्रापको जलस्य च (क्रतुम्) सर्व सङ्गतं संसाराख्यं यज्ञम्। (बृहन्तम्) महान्तम् (आशाथे) व्याप्नुतः। छन्दसि लुङ्ललिटः। (अष्टा०३.४.६) इति वर्तमाने लिट्। वा छन्दसि सर्वे विधयो भवन्तीति नुडभावः॥८॥

अन्वयः-ऋतेनोत्पादितावृतावृधावृतस्पृशो मित्रावरुणो बृहन्तं क्रतुमाशाथे।॥८॥

भावार्थ:-ब्रह्मसहचर्य्ययैतौ ब्रह्मज्ञाननिमित्ते जलवृष्टिहेतू भूत्वा सर्वमग्न्यादिमू-मूर्तं जगद्व्याप्य वृद्धिक्षयकर्त्तारो व्यवहारविद्यासाधकौ च भवत इति॥८॥

इमावस्माकं कि कि धारयत इत्युपदिश्यते

वे हम लोगों के कौन-कौन पदार्थों के धारण कनरेवाले हैं, इस बात का प्रकाश अगले मन्त्र में किया है

पदार्थ:-(ऋतेन) सत्यस्वरूप ब्रह्म के नियम में बंधे हुए (ऋतावृधौ) ब्रह्मज्ञान बढ़ाने, जल के खींचने और वर्षाने (ऋतस्पृशा) ब्रह्म की प्राप्ति कराने में निमित्त तथा उचित समय पर जलवृष्टि के करनेवाले (मित्रावरुणौ) पूर्वोक्त मित्र और वरुण (बृहन्तम्) अनेक प्रकार के (क्रतुम्) जगत्रूप यज्ञ को (आशाथे) व्याप्त होते हैं॥८॥ भावार्थ:-परमेश्वर के आश्रय से उक्त मित्र और वरुण ब्रह्मज्ञान के निमित्त जल वर्षानेवाले सब मूर्त्तिमान् वा अमूर्तिमान् जगत् को व्याप्त होकर उसकी वृद्धि विनाश और व्यवहारों की सिद्धि करने में हेतु होते हैं।॥८॥

भावार्थ:-परमेश्वर के आश्रय से उक्त मित्र और वरुण ब्रह्मज्ञान के निमित्त जल वर्षानेवाले सब मूर्त्तिमान् वा अमूर्तिमान् जगत् को व्याप्त होकर उसकी वृद्धि विनाश और व्यवहारों की सिद्धि करने में हेतु होते हैं।॥८॥