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ऋग्वेद 1.2.1

 अथ नवर्चस्य द्वितीयसूक्तस्य मधुच्छन्दा ऋषिः। १-३ वायुः; ४-६ इन्द्रवायुः ७-९

मित्रावरुणौ च देवताः। १, २ पिपीलिकामध्यानिवृद्गायत्री; ३-५, ७-९ गायत्री; ६

निवृद्गायत्री च छन्दःषड्जः स्वरः॥

तत्र येन सर्वे पदार्थाः शोभिताः सन्ति सोऽर्थ उपदिश्यते।

अब द्वितीय सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में उन पदार्थों का वर्णन किया है कि जिन्होंने सब पदार्थ शोभित कर रक्खे हैं

वायवा याहि दर्शतमे सोमा अरंकृताः

तेषां पाहि श्रुधी हव॑म्॥१॥

वायो इति। आ। याहि। दर्शत। इमे। सोमाः। अरंऽकृताःतेषाम्। पाहि। श्रुधि। हवम्॥ १०॥

पदार्थः-(वायो) अनन्तबल सर्वप्राणान्तर्यामिन्नीश्वर तथा सर्वमूर्त्तद्रव्याधारो जीवनहेतुर्भोतिको वाप्र वावृजे सुप्रया बर्हिरामा विश्वपतीव बीरिट इयाते। विशामुक्तोस॒षसः पूर्वहूतौ वायुः पूषा स्व॒स्तये नियुत्वान्॥ (यजु०३३.४४) अस्योपरि निरुक्तव्याख्यानरीत्येश्वर भौतिको पुष्टिकर्त्तारो नियन्तारौ द्वावर्थो वायुशब्देन गृह्यते। तद्यथा__

अथातो मध्यस्थाना देवतास्तासां वायुः प्रथमागामी भवति वायुर्वातवेत्तेर्वा स्याद्गतिकर्मण एतेरिति स्थौलाष्ठीविरनर्थको वकारस्तस्यैषा भवति। (वायवा याहि०) वायवा याहि दर्शनीयेमे सोमा अरंकृता अलंकृतास्तेषां पिब शृणु नो ह्वानमिति। (निरु० १०.१-२)

अन्तरिक्षमध्ये ये पदार्थाः सन्ति तेषां मध्ये वायुः प्रथमागाम्यस्ति। वाति सोऽयं वायुः सर्वगत्वादीश्वरो गतिमत्त्वाद्भौतिकोऽपि गृह्यते। वेत्ति सर्वं जगत्स वायुः परमेश्वरोऽस्ति, तस्य सर्वज्ञत्वात्। मनुष्यो येन वायुना तन्नियमेन प्राणायामेन वा परमेश्वरं शिल्पविद्यामयं यज्ञं वा वेत्ति जानातीत्यर्थेन भौतिको वायुगृह्यते। एवमेवेति प्राप्नोति चराचरं जगदित्यर्थेन परमेश्वरस्यैव ग्रहणम्। तथा एति प्राप्नोति सर्वेषां लोकानां परिधीनित्यर्थेन भौतिकस्यापि। कुतः? अन्तर्यामिरूपेणेश्वरस्य मध्यस्थत्वात्प्राणवायुरूपेण भौतिकस्यापि। मध्यस्थत्वादेतद् द्वयार्थस्य वाचिका वायवा याहीत्यृक् प्रवृत्तास्तीति विज्ञेयम्। वायुः सोमस्य रक्षिता वायुमस्य रक्षितारमाह साहचर्याद्रसहरणाद्वा। (निरु०११.५) वायुः सोमस्य स्तस्योत्पन्नस्यास्य जगतो रक्षकत्वादीश्वरोऽत्र गृह्यते। कस्मात्सर्वेण जगता सह साहचर्येण व्याप्तत्वात्। सोमवल्ल्यादेरोषधिगणस्य रसहरणात्तथा समुद्रादेर्जलग्रहणाच्च भौतिको वायुरप्यत्र गृह्यते___

वायुर्वा अग्नि: सुषमिद्वायुर्हि स्वयमात्मानं समिधे स्वयमिदं सर्व यदिदं किंच वायुमेव तदन्तरिक्षलोक आयातयति वायु प्रणीर्यज्ञानाम्। वायुर्वे तूर्णिहव्यावड् वायुहीदं सर्व सद्यस्तरति यदिदं किंच वायुर्देवेभ्यो हव्यं वहति। (ऐ०२.३४)

वायु तिकोऽग्निदीपनस्य सुषमिदिति ग्राह्यः। वायुसंज्ञोऽहमीश्वरः स्वयमात्मानं यदिदं किंचिज्जगद्वर्त्तते तदिदं सर्वं स्वयं समिन्धे प्रकाशयामि। तथा स एवान्तरिक्षलोके भौतिकमिमंवायुमायातयति विस्तारयति स एव वायुर्भोतिको वा यज्ञानां प्रापकोऽस्तीत्यत्र वायुशब्देनेश्वरश्च। तथा वायुर्वे तूर्णिरित्यादिना भौतिको गृह्यत इति

(आयाहि) आगच्छागच्छति वा। अत्र पक्षे व्यत्ययः। (दर्शत) ज्ञानदृष्ट्या द्रष्टुं योग्य योग्यो वा (इमे) प्रत्यक्षाः (सोमाः) सूयन्त उत्पद्यन्ते ये ते पदार्थाः (अरंकृताः) अलंकृता भूषिताः। संज्ञाछन्दसोर्वा कपिलकादीनामिति वक्तव्यम्। (अष्टा०८.२.१८) इति लत्वविकल्पः। (तेषाम्) तान्पदार्थान्। षष्ठी शेषे(अष्टा० २.३.५०) इति शेषत्वविविक्षायां षष्ठी। (पाहि) रक्षयति वा। (श्रुधि) श्रायवति वाअत्र बहुलं छन्दसि। (अष्टा०२.४.७३) इति विकरणाभावःश्रुशृणुप्रकृवृभ्यश्छन्दसि। (अष्टा०६.४.१०२) अनेन हेधिः । (हवम्) ॥१॥

अन्वयः-हे दर्शत वायो जगदीश्वर! त्वमायाहि येन त्वयेमे सोमा अरंकृता अलंकृताः सन्ति तेषां तान् पदार्थान् पाहि अस्माकं हवं श्रुधि योऽयं दर्शत द्रष्टुं योग्यो येनेमे सोमा अरंकृता अलंकृताः सन्ति, स तेषां तान् सर्वानिमान् पदार्थान् पाहि पाति श्रुधि हवं स एव वायो वायुः सर्वं शब्दव्यवहारं श्रावयति। आयाहि सर्वान् पदार्थान् स्वगत्या प्राप्नोति॥१॥

भावार्थ:-अत्र श्लेषालङ्कारेणेश्वर भौतिकावर्थों गृह्यते। ब्रह्मणा स्वसामर्थ्येन सर्वे पदार्थाः सृष्ट्वा नित्यं भूष्यन्ते तथा तदुत्पादितेन वायुना च। नैव तद्धारणेन विना कस्यापि रक्षणं सम्भवति। प्रेम्णा जीवेन प्रयुक्तां स्तुतिं वाणी चेश्वरः सर्वगतः प्रतिक्षणं शृणोति। तथा जीवो वायुनिमित्तेनैव शब्दानामुच्चारणां श्रवणं च कर्तुं शक्नोतीति॥१॥

पदार्थान्वयभाषा-(दर्शत) हे ज्ञान से देखने योग्य (वायो) अनन्त बलयुक्त, सब के प्राणरूप अन्तर्यामी परमेश्वर! आप हमारे हृदय में (आयाहि) प्रकाशित हूजियेकैसे आप हैं कि जिन्होंने (इमे) इन प्रत्यक्ष (सोमाः) संसारी पदार्थों को (अरंकृताः) अलंकृत अर्थात् सुशोभित कर रक्खा है। (तेषाम्) आप ही उन पदार्थों के रक्षक हैं, इससे उनकी (पाहि) रक्षा भी कीजिये, और (हवम्) हमारी स्तुति को (श्रुधि) सुनियेतथा (दर्शत) स्पर्शादि गुणों से देखने योग्य (वायो) सब मूर्तिमान् पदार्थों का आधार और प्राणियों के जीवन का हेतु भौतिक वायु (आयाहि) सब को प्राप्त होता है, फिर जिस भौतिक वायु ने (इमे) प्रत्यक्ष (सोमाः) संसार के पदार्थों को (अरंकृताः) शोभायमान किया है, वही (तेषाम्) उन पदार्थों की (पाहि) रक्षा का हेतु है और (हवम्) जिससे सब प्राणी लोग कहने और सुनने रूप व्यवहार को (श्रुधि) कहते सुनते हैं__

आगे ईश्वर और भौतिक वायु के पक्ष में प्रमाण दिखलाते हैं-(प्रवावृजे०) इस प्रमाण में वायु शब्द से परमेश्वर और भौतिक वायु पुष्टिकारी और जीवों को यथायोग्य कामों में पहुँचाने वाले गुणों से ग्रहण किये गये हैं। (अथातो०) जो-जो पदार्थ अन्तरिक्ष में हैं, उनमें प्रथमागामी वायु अर्थात् उन पदार्थों में रमण करनेवाला कहाता है, तथा सब जगत् को जानने से वायु शब्द करके परमेश्वर का ग्रहण होताहै। तथा मनुष्य लोग वायु से प्राणायाम करके और उनके गुणों के ज्ञान द्वारा परमेश्वर और शिल्पविद्यामय यज्ञ को जान सकता है। इस अर्थ से वायु शब्द करके ईश्वर और भौतिक का ग्रहण होता है। अथवा जो चराचर जगत् में व्याप्त हो रहा है, इस अर्थ से वायु शब्द करके परमेश्वर का तथा जो सब लोकों को परिधिरूप से घेर रहा है, इस अर्थ से भौतिक का ग्रहण होता है, क्योंकि परमेश्वर अन्तर्यामिरूप और भौतिक प्राणरूप से संसार में रहनेवाले हैं। इन्हीं दो अर्थों की कहने वाली वेद की (वायवायाहि०) यह ऋचा जाननी चाहिये।

इसी प्रकार से इस ऋचा का (वायवा याहि दर्शनीये०) इत्यादि व्याख्यान निरुक्तकार ने भी किया है, सो संस्कृत में देख लेनावहां भी वायु शब्द से परमेश्वर और भौतिक इन दोनों का ग्रहण हैजैसे-(वायुः सोमस्य०) वायु अर्थात् परमेश्वर उत्पन्न हुए जगत् की रक्षा करनेवाला और उसमें व्याप्त होकर उसके अंश-अंश के साथ भर रहा है। इस अर्थ से ईश्वर का तथा सोमवल्ली आदि ओषधियों के रस हरने और समुद्रादिकों के जल को ग्रहण करने से भौतिक वायु का ग्रहण जानना चाहिये। (वायुर्वा अ०) इत्यादि वाक्यों में वायु को अग्नि के अर्थ में भी लिया है। परमेश्वर का उपदेश है कि मैं वायुरूप होकर इस जगत् को आप ही प्रकाश करता हूं, तथा मैं ही अन्तरिक्ष लोक में भौतिक वायु को अग्नि के तुल्य परिपूर्ण और यज्ञादिकों को वायुमण्डल में पहुँचाने वाला हूं॥१॥

भावार्थ:-इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जैसे परमेश्वर के सामर्थ्य से रचे हुए पदार्थ नित्य ही सुशोभित होते हैं, वैसे ही जो ईश्वर का रचा हुआ भौतिक वायु है, उसकी धारणा से भी सब पदार्थों की रक्षा और शोभा तथा जैसे जीव की प्रेमभक्ति से की हुई स्तुति को सर्वगत ईश्वर प्रतिक्षण सुनता है, वैसे ही भौतिक वायु के निमित्त से भी जीव शब्दों के उच्चारण और श्रवण करने को समर्थ होता है।।१।

कथमेतौ स्तोतव्यावित्युपदिश्यते।

उक्त परमेश्वर और भौतिक वायु किस प्रकार स्तुति करने योग्य है, सो अगले मन्त्र में उपदेश ___ किया है