शनिवार, 30 जनवरी 2021

ऋग्वेद 1.1.10

 स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव

सर्चस्वा नः स्वस्तये॥९॥२॥

सः। नः। पिताऽइव। सूनवै। अग्न। सुऽउपायनः। भव। सचस्वा नः। स्वस्तये।। ९॥

पदार्थ:-(सः) जगदीश्वरः (न:) अस्मभ्यम् (पितेव) जनकवत् (सूनवे) स्वसन्तानाय (अग्ने) ज्ञानस्वरूप (सूपायन:) सुष्टु उपगतमयनं ज्ञानं सुखसाधनं पदार्थप्रापणं यस्मात्सः (भव, सचस्व) समवेतान् कुरु। अन्येषामपि दृश्यते। (अष्टा०६.३.१३७) इति दीर्घः। (न:) अस्मान् (स्वस्तये) सुखाय कल्याणाय च॥९॥

अन्वयः-हे अग्ने! स त्वं सूनवे पितेव नोऽस्मभ्यं सूपायनो भव। एवं नोऽस्मान् स्वस्तये सचस्व॥९॥

भावार्थ:-अत्रोपमालङ्कारः। सर्वैरवं प्रयत्नः कर्तव्य ईश्वरः प्रार्थनीयश्च-हे भगवन्! भवानस्मान् रक्षयित्वा शुभेषु गुणकर्मसु सदैव नियोजययथा पिता स्वसन्तानान्सम्यक् पालयित्वा सुशिक्ष्य शुभगुणकर्मयुक्तान् श्रेष्ठकर्मकृत॒श्च सम्पादयति, तथैव भवानपि स्वकृपयाऽस्मानिष्पादयत्विति।।९।। प्रथमसूक्ते पञ्चभिर्मन्त्रैः श्लेषालङ्कारेण व्यवहारपरमार्थविद्याद्वयसाधनं प्रकाशितमेवं चतुर्भिर्मन्त्ररीश्वरस्योपासना स्वभावश्चास्तीति। इदं सूक्तं सायणाचार्यादिभियूरोपाख्यदेशनिवासिभिश्चान्यथैव व्याख्यातम्॥९॥

इति प्रथमं सूक्तं समाप्तं वर्गश्च द्वितीयः॥

पदार्थ:-हे (सः) उक्त गुणयुक्त (अग्ने) ज्ञानस्वरूप परमेश्वर! (पितेव) जैसे पिता (सूनवे) अपने पुत्र के लिये उत्तम ज्ञान का देनेवाला होता है, वैसे ही आप (न:) हम लोगों के लिये (सूपायनः) शोभन ज्ञान, जो कि सब सुखों का साधक और उत्तम पदार्थों का प्राप्त करनेवाला है, उसके देनेवाले होकर (न:) हम लोगों को (स्वस्तये) सब सुख के लिये (सचस्व) संयुक्त कीजिये॥९॥

भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। सब मनुष्यों को उत्तम प्रयत्न और ईश्वर की प्रार्थना इस प्रकार से करनी चाहिये कि-हे भगवन्! जैसे पिता अपने पुत्रों को अच्छी प्रकार पालन करके और प्रकार से करनी चाहिये कि-हे भगवन्! जैसे पिता अपने पुत्रों को अच्छी प्रकार पालन करके और उत्तम-उत्तम शिक्षा देकर उनको शुभ गुण और श्रेष्ठ कर्म करने योग्य बना देता है, वैसे ही आप हम लोगों को शुभ गुण और शुभ कर्मों में युक्त सदैव कीजिये।।९॥ __

इस प्रथम सूक्त में पहिले पाँच मन्त्रों करके श्लेषालङ्कार से व्यवहार और परमार्थ की विद्याओं का प्रकाश किया, और चारो मन्त्रों से ईश्वर की उपासना और स्वभाव वर्णन किया है। सायणाचार्य आदि और यूरोपदेशवासी डाक्टर विलसन आदि ने इस सूक्त की व्याख्या उलटी की है, सो मेरे इस भाष्य और उनकी व्याख्या को मिलाकर देखने से सबको विदित हो जायगा।यह पहला सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ।।

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