शनिवार, 28 दिसंबर 2019

गुरुकुल बोर्ड बनने से होगा हिंदुत्व का विकास- स्वामी बालाकानंद

नई दिल्ली |  गुरुकुल बोर्ड बनने से होगा हिंदुत्व का विकास और भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए युवा पीढ़ी को संस्कृत निष्ठ बनाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे | ये विचार गत मंगलवार को कांगड़ी विश्वविद्यालय और हिंदू महासभा के संस्थापक हुतात्मा स्वामी श्रद्धानंद जी  के बलिदान दिवस और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय तथा हिंदू महासभा के संस्थापक पं. मदन मोहन  मालवीय जी के जन्मदिवस के अवसर पर आनंद पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर परम् पूज्य स्वामी श्री बालकानंद जी महाराज ने रखे |  कार्यक्रम "श्रेष्ठ" और भारत रक्षा मंच, युवा प्रकोष्ठ के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित हुआ |


  मुख्य अतिथि श्री सूर्यकांत केलकर जी ने कहा कि अलग अलग भाषा और खानपान के बावजूद भारत की संस्कृति एक है और दोनों महापुरूषों ने राष्ट्र और संस्कृति को बचाए रखने के लिए, सभी भारतीयों को सूत्रबद्ध करने के लिए विश्वविद्यालयों और हिंदू महासभा का गठन किया। देश की स्वतन्त्रता में इन संस्थानों का बहुत बडा योगदान है। 
विशिष्ट अतिथि श्री डी. के शर्मा जी, को चेयरमैन- दिल्ली बार कोंसिल ने कहा कि दोनों महापुरूषों की सोच से ही स्वतंत्रता के लिए प्रमुखता से कार्य करने वाली आर्य समाज, सनातन, बौद्ध, सिक्ख और अन्य हिंदू समाज हिंदू महासभा के संयुक्त मंच पर एकत्रित हो पाए। 


कार्यक्रम में श्रेष्ठ के महामंत्री वरिष्ठ अधिवक्ता सतेंद्र वशिष्ठ ने घर वापसी आन्दोलन को राष्ट्र स्तर पर चलाने पर जोर देते हुए कहा कि जो लोग भारतीय धर्म में वापस आना चाहते हैं हमारी संस्था उनकी हर संभव सहायता करेगी |


श्रेष्ठ के अध्यक्ष लोकेश शर्मा ने कहा कि स्वामी श्रद्धानंद को सनातन वैदिक धर्म के लिए एक आदर्श पुरुष हैं आज की युवा पीढ़ी को उनके सिद्धांतों का अनुसरण करना चाहिए | 



कार्यक्रम में विश्व हिन्दू पीठ के अध्यक्ष आचार्य मदन ने कहा कि स्वामी श्रद्धानंद एक महान त्यागी तपस्वी आर्यसमाजी थे, पुरानी दिल्ली की जामा मस्जिद में भी उन्होंने मुस्लिम समुदाय को संबोधित किया | वेद व वैदिक धर्म के सच्चे प्रचारक के रूप में स्वामी श्रद्धानंद का जीवन हम सब के लिए प्रेरणीय हैं |


कार्यक्रम में युवा वर्ग की उपस्थिति के बीच शशांक चोपडा, गोविंद मालवीय, प्रवीण चतुर्वेदी ने भी शुद्धि आन्दोलन को प्रचंड करने के समर्थन में विचार रखे। देश में शांतिपूर्ण वातावरण और सर्वसमाज की सुख शांति के लिए आचार्य मदन और मिश्रा जी द्वारा यज्ञ भी किया गया। सहदेव चौधरी ने कार्यक्रम का संचालन 


शुक्रवार, 13 दिसंबर 2019

द्विराष्ट्र सिद्धांत का सच : सावरकर से पहले मुस्लिम लीग ने ही द्वि राष्ट्र सिद्धांत को मानकर पाकिस्तान की मांग की थी


     सन् 1930 में जब मुहम्मद इकबाल  ने भारत के उत्तर पश्चिमी भाग में दक्षिण एशिया के मुसलमानों के लिए एक अलग मुस्लिम राज्य के निर्माण की बात की, तभी से पाकिस्तान के निर्माण की मांग उठी | इकबाल ने कहा कि उत्तर-पश्चिम भारत का संगठित मुस्लिम राज्य के रुप में निर्माण ही मुझे मुसलमानों की अंतिम नियति प्रतीत होती है ​|


     इसके बाद मुस्लिम लीग ने मुसलमानों को भड़काना शुरू कर दिया | मुस्लिम राज्य के नए नाम पाकिस्तान का नाम कैंब्रिज( इंग्लैंड) विश्वविद्यालय के कट्टर मुस्लिम छात्र चौधरी रहमत अली ने दिया |


     प्रोफेसर बलराज मधोक ने अपनी पुस्तक पाकिस्तान का आदि और अंत के पृष्ठ 26 में लिखा है कि  "शब्द पाकिस्तान का सबसे पहले प्रयोग लन्दन में चौधरी रहमत अली ने किया | वहां 1930 में हुए राउंड टेबल कांफ्रेंस के समय उसने मुस्लिम लीग के नेताओं से मिलकर उन्हें भारत के उत्तर-पश्चिम में पाकिस्तान का एक अलग मुस्लिम राज्य बनाने की योजना बनाई | उसके अनुसार पाकिस्तान नाम में अक्षर - पंजाब, - अफगानिस्तान, - काश्मीर, - सिंध और स्तान- बलूचिस्तान के द्योतक है " |


   


 मुहम्मद इक़बाल चौधरी रहमत अली और कट्टर मुस्लिम युवाओं के साथ 


चौधरी रहमत अली नामक एक मुस्लिम छात्र ने एक पर्चा जारी कर पृथक राज्य पाकिस्तान की परिकल्पना को जन्म दिया था | फिर आगे भी अधिवेशनों व मुस्लिम सम्मेलनों में 1933 और 1935 में लिखे गए दो पर्चो में रहमत अली ने मुस्लिम अस्मिता के लिए अलग राष्ट्रीय दर्जे की मांग की थी जिसे उसने पाकिस्तान नाम दिया था |


और मुस्लिम लीग के नेता इकबाल ने सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा गीत लिखकर बाद में सारे जहाँ से अच्छा पाकिस्तान हमारा लिखा | हिन्दू महासभा पर द्वि राष्ट्र सिद्धांत का आरोप निराधार है | सावरकर अखंड भारत में हिन्दू राष्ट्र के पक्षधर थे, इसलिए बंटवारे का विरोध केवल हिन्दू महासभा ने ही किया | मुस्लिम लीग की लगातार पाकिस्तान की मांग को देखकर वीर सावरकर ने 1937 के अधिवेशन में हिन्दुओं को मजबूत करने के लिए हिन्दू राष्ट्र के नारे को बुलंद किया |



सन 1944 में जिन्ना के साथ मोहनदास गांधी, तबतक मुस्लिम लीग ने अपने अधिवेशनों में पाकिस्तान का नक्शा प्रस्तुत कर दिया था 


    प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी ताराचंद ने भी अपनी पुस्तक - दि हिस्ट्री ऑफ़ फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया के पृष्ठ 154 में मुस्लिम लीग के 1930 में हुए अधिवेशन में मुस्लिम राज्य के निर्माण का उल्लेख किया है, जो बाद में पाकिस्तान के रूप में देश तोड़कर बना | 


 


Image result for मुहम्मद इक़बाल पाकिस्तान झंडामुस्लिम लीग के 1930 अधिवेशन लाहौर का रिकॉर्ड 


  मुस्लिम लीग के 1930 अधिवेशन का रिकॉर्ड - दी एनुअल रजिस्टर २, 1930 के पृष्ठ 338 में छपे मुहम्मद इक़बाल के भाषण का अंश इस प्रकार है -


" I would like to see the Punjab, N. W. F. P. , Sindh and Baluchistan  amalgamated into a single self-government state within the British Empire. The formation of a consolidated North West Indian Muslim state appears to me to be final destiny of the Muslims at least in North-West India..... I therefore demand the formation of a consolidated Muslim State in the best interest of India and Islam."


"मैं पंजाब, N. W. F. P., सिंध और बलूचिस्तान को 
ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर एक एकल स्व-मुस्लिम
राज्य में
समाहित करना चाहूंगा। मुझे उत्तर पश्चिम
भारतीय मुस्लिम राज्य का गठन एक परिपूर्ण तरीके से
करना है जो कम से कम
मुसलमानों का
अंतिम नियति ही प्रतीत होता है। उत्तर-पश्चिम भारत .....

इसलिए मैं भारत और इस्लाम के हित में एक
परिपूर्ण मुस्लिम राज्य के गठन की माँग करता हूँ। "

कांग्रेसी नेता का प्रलाप 


संसद में  एक कांग्रेसी नेता ने प्रलाप करते हुए नागरिक संशोधन बिल पर वीर सावरकर को देश विभाजन का जिम्मेदार माना, यह एक भ्रामक तथ्य है कि देश के बंटवारे के लिए हिन्दू महासभा जिम्मेदार है यदि ऐसा होता तो पाकिस्तान के निर्माण के साथ शेष भारत हिन्दू राष्ट्र घोषित होता | वास्विकता यही है कि कांग्रेस ने अंग्रेजों के साथ मिलकर भारत के पूर्व और पश्चिम भू भाग पर मुस्लिम राज्य का गठन करा दिया और शेष भारत को सेकुलर राज्य बनवा कर हिन्दू आन्दोलन को कुचलने का प्रयास किया |


     यदि खंडित भारत में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना होती तो निश्चित ही भारतीय कुछ वर्षों में अपनी हिन्दू सैन्य शक्ति को एकत्रित करके पूर्वी और पश्चिमी पाकितान व अफगानिस्तान और बलूचिस्तान को  नक़्शे से मिटाकर भगवा ध्वज तले पुनः अखंड भारत के मानचित्र में जोड़ लेते | दुर्भाग्य रहा कि नेहरू गांधी और पटेल ने बंटवारे को स्वीकार करने के बाद भी भारत को पुनः अखंड बनाने के लिए हिन्दुओं का सैनिकरण नहीं किया | हम सेकुलर राजनीति से मुस्लिम तुष्टिकरण राजनीति के शिकार होते चले गए | 


बुधवार, 11 दिसंबर 2019

काशी की ज्ञानवापी मस्जिद प्राचीन विश्वनाथ मंदिर का हिस्सा है-आचार्य मदन, अध्यक्ष विश्व हिन्दू पीठ

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    वाराणसी | "काशी की ज्ञानवापी मस्जिद प्राचीन विश्वनाथ मंदिर का हिस्सा है, सरकार को चाहिए कि अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि स्थान की तरह पुरातत्व विभाग के द्वारा इस परिसर की खुदाई करायी जाए, अन्यथा हिन्दू महासभा पुनः जन आन्दोलन के द्वारा शिव भक्तों जगाएगी" यह वक्तव्य हिन्दू महासभा के प्रवक्ता और विश्व हिन्दू पीठ के अध्यक्ष आचार्य मदन ने दिया | 
      Image result for gyan vapi masjidआगे उन्होंने कहा कि "1950 से अयोध्या में श्रीराम जन्मस्थान का विवाद कोर्ट में लटका हुआ था और सन 92 के 6 दिसम्बर को श्रीराम मंदिर का भवन यह सोचकर विध्वंश कर दिया गया कि यह बाबर का कलंक है, किन्तु पूर्व में हुई पुरातत्वीय उत्खनन और बाद के शोध से वहां मूल रूप से मंदिर होने के ही प्रमाण मिले, जिसे माननीय उच्चतम न्यायालय ने प्रमाण रूप में स्वीकार कर यह स्थान हिन्दुओं के पक्ष किया | इसी तरह हिन्दू महा सभा द्वारा मुख्य रूप से मथुरा और काशी के देवस्थानों की मुक्ति की मांग प्रारम्भ से ही रही है जब जनसंघ और भाजपा का जन्म भी नहीं हुआ था |"
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    इसके साथ ही विश्व हिन्दू महा संघ के राष्ट्रीय मंत्री वीर रामनाथ लूथरा ने कहा कि "कांग्रेस ने हमेश मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति से हिन्दुओं की भावनाओं के विपरीत ही कार्य किया | वर्तमान में केंद्र की मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार से आशा की जा सकती है कि अयोध्या की तरह काशी विश्वनाथ परिसर को पूर्णतः इस्लामिक अतिक्रमण से मुक्त कराके काशी नगरी की गरिमा और धार्मिक तीर्थ की पवित्रता को अक्षुण्ण रखा जाए |"
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    पाठकों को जानकारी हो कि ज्ञानवापी परिक्षेत्र में श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर के बगल में अतिक्रमण किये स्थान पर स्थित भवन जिसे ज्ञानवापी मस्जिद कहते हैं, का विवाद सीनियर डिवीजन- फास्ट ट्रैक कोर्ट में चल रहा है | हिन्दू मंदिर को वापस लेने की मांग के लिए यह वाद  वर्ष 1991 से स्थानीय अदालत में चल रहा है | 


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     प्राचीन मूर्ति स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वर के पक्षकार पंडित सोमनाथ व्यास तथा अन्य ने ज्ञानवापी में नए मंदिर के निर्माण तथा हिंदुओं को पूजा-पाठ करने का अधिकार देने आदि को लेकर वर्ष 1991 में मुकदमा दायर किया था | उनकी ओर से यह कहा गया था कि मस्जिद ज्योतिर्लिंग विश्वेश्वर मंदिर का एक अंश है |
इसी मंगलवार को एक नयी प्रार्थना की गयी है कि कोर्ट आदेश करें कि पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई हो, जिससे हिन्दू अपने मंदिर को शांतिपूर्ण तरीके से कोर्ट के द्वारा प्राप्त कर सके | अदालत ने अपील पर सुनवाई करते हुए विपक्षियों से आपत्ति तलब करने के साथ ही अगली सुनवाई को नौ जनवरी 2020 की तिथि मुकर्रर की है | 
विपक्ष में अंजुमन इंतजामिया मस्जिद तथा अन्य विपक्षी हैं | इस अधिकार को लेकर मुकदमा दाखिल करने वाले दो वादियों पंडित सोमनाथ व्यास, डॉ. रामरंग शर्मा की मृत्यु हो चुकी है। दिवंगत वादी पंडित सोमनाथ व्यास के स्थान पर प्रतिनिधित्व कर रहे वाद मित्र पूर्व जिला शासकीय अधिवक्ता (सिविल) विजय शंकर रस्तोगी ने प्रार्थनापत्र में कहा है कि कथित विवादित परिसर में स्वयंभू विश्वेश्वरनाथ का शिवलिंग आज भी स्थापित है | यह देश के 12 ज्योतिर्लिंग में से एक है |
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    यहाँ पाठकों की जानकारी के लिए बता दें कि परिसर में ज्ञानवापी नाम का बहुत ही पुराना कुआं है और इसी कुएं के उत्तर तरफ भगवान विश्वेश्वरनाथ का मंदिर है | मंदिर परिसर के हिस्सों पर मुसलमानों ने आधिपत्य करके मस्जिद बना दिया |  15 अगस्त 1947 को भी विवादित परिसर का धार्मिक स्वरूप मंदिर का ही था |


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विजय शंकर रस्तोगी अदालत से संपूर्ण ज्ञानवापी परिसर तथा कथित विवादित स्थल के संबंध में भौतिक तथा पुरातात्विक दृष्टि से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा रडार तकनीक से सर्वेक्षण तथा परिसर की खोदाई कराकर रिपोर्ट मंगाने की अपील की है | जिसमें मुख्य रूप से कब्जे वाले भवन के बाहर व अंदरूनी दीवारों, गुबंदों, तहखानों आदि के संबंध में एएसआइ से निरीक्षण कराकर रिपोर्ट देने की मांग है |  अदालत ने वादी पक्ष की अपील पर विपक्षीगण से आपत्ति मांगी है | 


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गुरुवार, 5 दिसंबर 2019

गृहस्थों के लिए आवश्यक है-दर्श पूर्णमास यज्ञ

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   यज्ञ से उत्तम कोई भी कर्म नहीं है | इसका एक अर्थ यह भी है कि जो भी उत्तम कर्म है वह यज्ञ है | वह स्वयं में एक यज्ञ है | जैसे परोपकार स्वयं में एक श्रेष्ठ कर्म है, वैसे ही यज्ञ स्वयं में एक लोकोपकार कर्म है | ऋषियों ने वेदों में वर्णित यज्ञों से अनेक प्रकार के विज्ञान को सिद्ध कर संसार को लाभ पहुंचाया | किन्तु भौतिक सुखों में गृहस्थ सुख स्वयं में पूर्ण सुख है | गृहस्थ के ही मानवीय सुखों को सिद्ध करने में दैनिक हवन की अपनी विशिष्ट भूमिका है | वैदिक काल में गुरुकुलीय शिक्षा व धर्म व्यवस्था के प्रभाव से सभी मनुष्य नित्य यज्ञ में कुछ न कुछ द्रव्य समर्पित करते थे |


  गीता में भी यज्ञ से कामनाओं की पूर्ति होने की चर्चा हुई है | गीता पांच हजार साल की संस्कृति का प्रमाण है तो लगभग दो करोड़ वर्ष पूर्व रामायण काल में भी  राजा दशरथ ने श्रृंगेरी ऋषि के निर्देशन व ब्रह्मत्व में पुत्रेष्टि यज्ञ का आयोजन किया और फिर उन्हें  चार दिव्य सन्तानें प्राप्त हुई |Image result for पुत्रेष्टि यज्ञ


   शतपथ ब्राह्मण ग्रन्थ में अग्न्याधान और अग्नि चयन से सम्बंधित अनेक रहस्यों को उद्घाटित किया है | अग्निपुराण में तथा उपनिषदों में वर्णित पंचाग्नि विद्या में यज्ञ रहस्य को भी समझाने का प्रयास किया है |  विश्वामित्र आदि ऋषि इंद्र शक्ति को प्राप्त करने के लिए और ब्रह्मास्त्र जैसे दिव्य अस्त्रों को प्रयोग करने के लिए भी अनेक मान्त्रिक यज्ञों का अनुष्ठान करते थे |  लंका विजय के उपरांत प्रभु श्रीराम ने दस अश्वमेध यज्ञ किये थे |


   


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महाभारत में पांडवों का राजसूय यज्ञ और महाराजा युधिष्ठिर के महल में प्रतिदिन हजारों ब्राह्मणों व संन्यासियों का सत्कार होता था |  कलयुग में स्वामी दयानंद ने याज्ञिक कर्मकाण्ड पर सबसे अधिक बल दिया | पञ्च महा यज्ञ में अग्निहोत्र नित्य कर्म में सम्मिलित किया | सभी गृहस्थों को दैनिक अग्निहोत्र अवश्य करना चाहिए | यज्ञ करने से मानसिक बल प्राप्त होता है | निसंदेह यज्ञ हमारी सभी भौतिक कामनाओं को पूर्ण करने में सक्षम है | यज्ञ का प्रत्यक्ष लाभ हमें मन के उत्साह और आत्म विश्वास में वृद्धि के रूप में प्राप्त होता है


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     इसलिए जो भी व्यक्ति प्रातः ध्यान संध्या के उपरान्त हवन करता है वह अपने भीतर एक अतिरिक्त आत्म विश्वास को अनुभव करता है | परमात्मा के प्रति उसकी आस्था प्रतिदिन दृढ होती जाती है | वह हर प्रकार के भय पर विजय प्राप्त करता है | सायं काल भी यज्ञ करना चाहिए | किन्तु आज कल की भागदौड़ में यदि हवन की तैयारी में समय न मिलता हो तो पन्द्रह-पन्द्रह दिन में हवन अवश्य करना चाहिए | यदि दैनिक या साप्ताहिक यज्ञ भी करते हो तो भी अमावश्या और पूर्णिमा के दिन यज्ञ से मनोकामना सिद्ध के विशिष्ट यज्ञ का विधान है | पन्द्रह दिन के अन्तराल में होने वाले इन यज्ञों को दर्श पूर्ण मासी यज्ञ कहते हैं | 


सुवर्गाय हिवैलोकाय दर्शपूर्णमासौ इज्यते।

 ( तैति ० स ० २/२/५ )

अर्थात् ,प्रत्येक माह में अमावस्या और पूर्णिमा के दिन के हवन को दर्श पूर्णमास कहते हैं |

शास्त्रों में पूर्णिमा और अमावश्या के दिन पक्षेष्टि करने का विधान है | चंद्रमा अमावस्या के दिन अदृश्य होता है | चंद्रमा का हमारे मन से सम्बन्ध होता है | आधिदैविक तल पर चंद्रमा और मन एक दुसरे से जुड़े हुए हैं, इस कारण जब चंद्रमा सूर्य से अस्त होता है तो सूर्य चन्द्र के एक साथ वास करने पर आधि दैविक शक्ति उत्पन्न होती है, जो यज्ञ के द्वारा सिद्ध कर सकते हैं | अमावस्या के यज्ञ का पारिभाषिक नाम अविधान दर्शेष्टि हैं | और पूर्णिमा के यज्ञ का नाम पौर्णमासेष्टि है | यज्ञ की अग्नि का सूक्ष्म भाग  पृथ्वी के तल पर और पृथ्वी की बाहरी कक्षा से लेकर सूर्य की बाहरी कक्षा तक फिर सूर्य के भीतर की प्राण शक्ति तक पहुंचता है | अमावस्या तिथि के प्रारम्भ से और जब सूर्य व चंद्रमा समान अंशों में हो फिर उसके उपरांत कुछ घटी पर्यंत यज्ञ का विशेष मुहूर्त होता है, जो आत्मिक सिद्धि अर्थात् महान भौतिक कामना को पूर्णतः सिद्ध करने के लिए मानसिक व आत्मिक बल प्रदान करता है |

इसलिए गृहस्थों को आदेश देते हुए महर्षि मनु लिखते हैं -

अग्निहोत्रं च जुहुयादाद्यन्ते द् युनिशोः सदा। 

दर्शेन चार्धमासान्ते पौर्णमासेन चैव हि। । 

                                                     (मनु ० ४/४५ )

अर्थात् गृहस्थ प्रतिदिन दिन-रात के आदि और अन्त में अर्थात्  सायं प्रातः सन्धि वेलाओं में अग्निहोत्र करे और आधे मास के अन्त में दर्शयज्ञ अर्थात् अमावस्या का यज्ञ करे तथा इसी प्रकार पन्द्रह दिन के उपरान्त मास पूर्ण होने पर पूर्णिमा के दिन पौर्णमास यज्ञ करे | 

   

     संस्कार विधि गृहस्थ प्रकरण में लिखा है -  पक्षयाग अर्थात् जिसके घर में अभाग्य से अग्निहोत्र न होता हो तो सर्वत्र पक्षयागादि में  यज्ञ करें साथ ही ईश्वरोपासना ,स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण भी यथायोग्य करें |

                

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