सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

ऋग्वेद 1.9.6

 अ॒स्मान्त्सु तत्र चोदयेन्द्र राये रभस्वतः

तुविद्युम्न यशस्वतः॥६॥

अस्मान्। सु। तत्र। चोय। इन्द्र। गये। रभस्वतः। तुविद्युम्न। यशस्वतः॥६॥

पदार्थः-(अस्मान्) विदुषो धार्मिकान् मनुष्यान् (सु) शोभनार्थे क्रियायोगे च (तत्र) पूर्वोक्ते पुरुषार्थे (चोदय) प्रेरय (इन्द्र) अन्तर्यामिन्नीश्वर! (राये) धनाय (रभस्वतः) कार्यारम्भं कुर्वत आलस्यरहितान् पुरुषार्थिनः (तुविद्युम्न) बहुविधं द्युम्नं विद्याद्यनन्तं धनं यस्य तत्सम्बुद्धौ। द्युम्नमिति धननामसु पठितम्। (निघ०२.१०) तुवीति बहुनामसु च। (निघं०३.१) (यशस्वतः) यशोविद्याधर्मसर्वोपकाराख्या प्रशंसा विद्यते येषां तान्अत्र प्रशंसार्थे मतुप्॥६॥

अन्वयः-हे तुविद्युम्नेन्द्र परात्मस्त्वं रभस्वतो यशस्वतोऽस्मान् तत्र पुरुषार्थे राये उत्कृष्टधनप्राप्त्यर्थे सुचोदय।।६॥ ___

भावार्थः-अस्यां सृष्टौ परमेश्वराज्ञायां च वर्तमानैः पुरुषार्थिभिर्यशस्विभिः सर्वैर्मनुष्यैर्विद्याराज्यश्रीप्राप्त्यर्थे सदैव प्रयत्नः कर्त्तव्य नैतादृशैर्विनैताः श्रियो लब्धं शक्या: । कुतः, ईश्वरेण पुरुषार्थिभ्य एव सर्वसुखप्राप्तर्निर्मित्तत्वात्।।६।। ___

पदार्थ:-हे (तुविद्युम्न) अत्यन्त विद्यादिधनयुक्त (इन्द्र) अन्तर्यामी ईश्वर! (रभस्वतः) जो आलस्य को छोड़ के कार्यों के आरम्भ करने (यशस्वतः) सत्कीर्तिसहित (अस्मान्) हम लोग पुरुषार्थी विद्या धर्म और सर्वोपकार से नित्य प्रयत्न करनेवाले मनुष्यों को (तत्र) श्रेष्ठ पुरुषार्थ में (राये) उत्तमउत्तम धन की प्राप्ति के लिये (सुचोदय) अच्छी प्रकार युक्त कीजिये॥६॥

भावार्थ:-सब मनुष्यों को उचित है कि इस सृष्टि में परमेश्वर की आज्ञा के अनुकूल वर्तमान तथा पुरुषार्थी और यशस्वी होकर विद्या तथा राज्यलक्ष्मी की प्राप्ति के लिये सदैव उपाय करें। इसी से उक्त गुणवाले पुरुषों ही को लक्ष्मी से सब प्रकार का सुख मिलता है, क्योंकि ईश्वर ने पुरुषार्थी सज्जनों ही के लिये सुख रचे हैं।॥६॥

पुनः कीदृशं तद्धनमित्युपदिश्यते

फिर भी उक्त धन कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में प्रकाश किया है

Featured Post

जगद्गुरु रामानुजाचार्य ने भी इसी महाशक्ति पीठ- शारदा सर्वज्ञ पीठ से प्रेरणा प्राप्त की थी

 नमस्ते शारदे देवि, काश्मीरपुर वासिनी,  त्वामहं प्रार्थये नित्यं, विद्यादानं च देहि मे  श्री शारदा सर्वज्ञ पीठ-काश्मीर का इतिहास  प्राक्कथन ...