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ऋग्वेद 1.34.11

 आ नासत्या त्रिभिरैकादशैरिह देवेभिर्यातं मधुपेय॑मश्विना।

प्रायुस्तारिष्टं नी रपांसि मृक्षतं सेधतं द्वेषो भव॑तं सचाभुवा॥११॥

आ। नासत्या। त्रिऽभिः। एकादशैः। इह। देवेभिः। यातम्। मधुऽपेयम्। अश्विना। प्रा आयुः। तारिष्टम्निः। रपांसि। मृक्षतम्। सेधतम्। द्वेषः। भवतम्। साऽभुवा॥ ११॥

पदार्थ:-(आ) समन्तात् (नासत्या) सत्यगुणस्वभावौ। अत्र सर्वत्र सुपां सुलुग्० इत्याकारादेशः। (त्रिभिः) एभिरहोरात्रैः समुद्रस्य पारम् (एकादशैः) एभिरहोरात्रैर्भूगोलान्तम् (इह) यानेषु सम्प्रयोजितो (देवेभिः) विद्वद्भिः (यातम्) प्राप्नुतम् (मधुपेयम्) मधुभिर्गुणैर्युक्तं पेयं द्रव्यम् (अश्विना) द्यावापृथिव्यादिको द्वौ द्वौ (प्र) प्रकृष्टार्थे (आयुः) जीवनम् (तारिष्टम्) अन्तरिक्षं प्लावयतम् (नि:) नितराम् (रपांसि) पापानि दुःखप्रदानि। रपोरिप्रमिति पापनामनी भवतः। (निरु०४.२१) (मक्षतम्) दूरीकुरुतम्(सेधतम्) मङ्गलं सुखं प्राप्नुतम् (द्वेषः) द्विषतः शत्रून्। अन्येभ्योऽपि दृश्यन्त इति कर्तरि विच्। (भवतम्) (सचाभुवा) यो सचा समवायं भावयतस्तौ। अत्रान्तर्गतो ण्यर्थः ।।११॥ __

अन्वयः-हे शिल्पिनौ! युवां नासत्याश्विना सचाभुवाविव देवेभिर्विद्वद्भिस्सहेहोत्तमेषु यानेषु स्थित्वा त्रिभिरहोरात्रैर्महासमुद्रस्य पारमेकादशैरहोरात्रैर्भूगोलान्तं यातं द्वेषो रपांसि च निर्मुक्षतं मधुपेयमायुः प्रतारिष्टं सुसुखं सेधतं विजयिनौ भवतम्॥११॥ ___

भावार्थ:-यदा मनुष्या ईदृशेषु (यानेषु) स्थित्वा चालयन्ति तदा त्रिभिरहोरात्रैः सुखेन समुद्रपारमेकादशैरहोरात्रैर्भूगोलस्याभितो गन्तुं शक्नुवन्ति। एवं कुर्वन्तो विद्वांसः सुखयुक्तं पूर्णमायुः प्राप्य दुःखानि दूरीकृत्य शत्रून् विजित्य चक्रवर्तिराज्यभागिनो भवन्तीति।।११।।

पदार्थ:-हे शिल्पि लोगो! तुम दोनों (नासत्या) सत्यगुण स्वभावयुक्त (सचाभुवा) मेल कराने वाले जल और अग्नि के समान (देवेभिः) विद्वानों के साथ (इह) इन उत्तम यानों में बैठ के (त्रिभिः) तीन दिन और तीन रात्रियों में महासमुद्र के पार और (एकादशभिः) ग्यारह दिन और ग्यारह रात्रियों में भूगोल पृथिवी के अन्त को (यातम्) पहुंचो (द्वेषः) शत्रु और (रपांसि) पापों को (निर्मक्षतम्) अच्छे प्रकार दूर करो (मधुपेयम्) मधुर गुणयुक्त पीने योग्य द्रव्य और (आयुः) उमर को (प्रतारिष्टम्) प्रयत्न से बढ़ाओ, उत्तम सुखों को (सेधतम्) सिद्ध करो और शत्रुओं को जीतने वाले (भवतम्) होओ।।११।

भावार्थ:-जब मनुष्य ऐसे यानों में बैठ और उनको चलाते हैं, तब तीन दिन और रात्रियों में सुख से समुद्र के पार तथा ग्यारह दिन और ग्यारह रात्रियों में ब्रह्माण्ड के चारों और जाने को समर्थ हो सकते हैं। इसी प्रकार करते हुए विद्वान् लोग सुखयुक्त पूर्ण आयु को प्राप्त हो दुःखों को दूर और शत्रुओं को जीत कर चक्रवर्तिराज्य भोगने वाले होते हैं।११।।

___ पुनरेताभ्यां किं साधनीयमित्युपदिश्यते।

फिर इन से क्या सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।