ऋग्वेद 1.33.9

 पर यदिन्द्र रोदसी उभे अबुभोजीर्महिना विश्वतः सीम्।

अमन्यमानाँ अभि मन्यमा निर्ब्रह्मभिरधो दस्युमिन्द्र॥९॥

परि। यत्। इन्द्र। रोदसी इति। उभे इति। अबुभोजीः। महिना। विश्वतः। सीम्। अम॑न्यमानान्। अभि। मन्यमानैः। निः। ब्रह्मऽभिः। अधमः। दस्युम्। इन्द्र॥९॥

पदार्थ:-(परि) सर्वतो भावे (यत्) यस्मात् (इन्द्र) ऐश्वर्ययोजक राजन् (रोदसी) भूमिप्रकाशो (उभे) द्वे (अबुभोजी:) आकर्षणेन न्यायेन वा पालयसि पालयति वा। अत्र भुज पालनाभ्यवहारयोर्लडर्थे लङि सिपि बहुलं छन्दसि इति शप: स्थान आदिष्टस्य श्नम: स्थाने श्लुः श्लौ इति द्वित्वम् बहुलं छन्दसि इति इडागमश्च। (महिना) महिम्ना। अत्र छान्दसो वर्णलोपो वा यथेष्कर्तारमध्वर इति मलोपः। (विश्वतः) सर्वतः (सीम्) सुखप्राप्तिः। सीमिति पदनामसु पठितम्। (निघं०४.२) अनेन प्राप्त्यर्थो गृह्यते। सीमिति परिग्रहार्थीयः। (निरु०१.७) (अमन्यमानान्) अज्ञानहठाग्रहयुक्तान् सूर्यप्रकाशनिरोधकान् मेघावयवान् वा (अभि) आभिमुख्ये (मन्यमानैः) विद्यार्जवयुक्तैर्दुराग्रहरहितैर्मनुष्यैर्ज्ञानसम्पादकैः किरणैर्वा (निः) सातत्ये (ब्रह्मभिः) वेदैर्ब्रह्मविद्भिर्ब्राह्मणैर्वा। ब्रह्म हि ब्राह्मणः। (शत० ब्रा०५.१.१.११) (अधमः) शिक्षय अग्निनासंयोजयति वा। लोडर्थे लडर्थे वा लङ्। (दस्युम्) दुष्टकर्मणा सह वर्तमानां परद्रोहिणं परस्वहर्तारं चोरं शत्रु वा (इन्द्र) राज्यश्वर्ययुक्त सेनाध्यक्ष शूरवीर मनुष्य॥९॥

अन्वयः-हे इन्द्र! त्वं यथेन्द्रः सूर्यलोको महिना महिम्नोभे रोदसी सी विश्वतः पर्युबुभोजीः। मन्यमानैर्ब्रह्मभिर्वृहत्तमैः किरणैर्दस्युं वृत्रं मेघममन्यमानान्मेघावयवान् घनान् यद्यस्मादभिनिरधमः। अभितो नितरां स्वतापाग्नियुक्तान् कृत्वा निवारयति तथा विश्वतो महिम्ना सीमुभे रोदसी पर्यबुभोजी: सर्वतो भुग्धि। एवं च हे इन्द्र! मन्यमानब्रह्मभिरमन्यमानान् मनुष्यान् दस्युं दुष्टपुरुषं चाभिनिरधम आभिमुख्यतया शिक्षय॥९॥

भावार्थः-अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सूर्यलोकः सर्वान् पृथिव्यादिमूर्तिमतो लोकान् प्रकाश्याकर्षणेन धृत्वा पालको भूत्वा वृत्ररात्र्यन्धकारान्निवारयति, तथैव हे मनुष्या! भवन्तः सुशिक्षितैर्विद्वद्भिर्मूर्खाणां मूढतां निवार्य दुष्टशत्रून् शिक्षित्वा महद्राज्यसुखं नित्यं भुञ्जीरन्निति॥९॥

पदार्थ:-हे (इन्द्र) ऐश्वर्य का योग करने वाले राजन्! आपको योग्य है कि जैसे सूर्यलोक (महिना) अपनी महिमा से (उभे) दोनों (रोदसी) प्रकाश और भूमि को (सीम्) जीवों के सुख की प्राप्ति के लिये (विश्वतः) सब प्रकार आकर्षण से पालन करता और (मन्यमानैः) ज्ञानसम्पादक (ब्रह्मभिः) बड़े आकर्षणादि बलयुक्त किरणों से (दस्युम्) मेघ और (अमन्यमानान्) सूर्य प्रकाश के रोकने वाले मेघ के अवयवों को (निरधमः) चारों ओर से अपने तापरूप अग्नि करके निवारण करता है, वैसे सब प्रकार अपनी महिमा से प्राणियों के सुख के लिये (उभे) दोनों (रोदसी) प्रकाश और पृथिवी का (पर्य्यबुभोजीः) भोग कीजिये। इसी प्रकार हे (इन्द्र) राज्य के ऐश्वर्या से युक्त सेनाध्यक्ष शूरवीर पुरुष! आप (मन्यमानैः) विद्या की नम्रता से युक्त हठ दुराग्रह रहित (ब्रह्मभिः) वेद के जानने वाले विद्वानों से (अमन्यमानान्) अज्ञानी दुराग्रही मनुष्यों को (अभिनिरधमः) साक्षात्कार शिक्षा कराया कीजिये।॥९॥

भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्यलोक सब पृथिव्यादि मूर्त्तिमान् लोकों का प्रकाश, आकर्षण से धारण और पालन करने वाला होकर मेघ और रात्रि के अन्धकार को निवारण करता है, वैसे ही हे मनुष्यो! आप लोग उत्तम शिक्षित विद्वानों से मूों की मूढ़ता छुड़ा और दुष्ट शत्रुओं को शिक्षा देकर बड़े राज्य के सुख का भोग नित्य कीजिये।।९।

पुनरिन्द्रकर्माण्युपदिश्यन्ते।।

फिर अगले मन्त्र में इन्द्र के कर्मों का उपदेश किया है।।

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