ऋग्वेद 1.33.1

 अथ तृतीयोऽध्यायः प्रारभ्यते॥

विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव। यद्भद्रं तन्न आ सुव॥ ऋ०५.८२.५॥

अथ पञ्चदशर्चस्य त्रयस्त्रिंशस्य सूक्तस्याङ्गिरसो हिरण्यस्तूप ऋषिः। इन्द्रो देवता

१,२,४,८,१२, १३। निवृत्रिष्टुप् ३,६,१०; त्रिष्टुप् ५,७,११; विराट् त्रिष्टुप् १४-१५;

भुरिक् पड्क्तिश्छन्दः। पङ्क्तेः पञ्चमः। त्रिष्टुभो धैवतः स्वरश्च॥

तत्रादाविन्द्रशब्देनेश्वरसभापती उपदिश्यते॥

अब तेतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके पहिले मन्त्र में इन्द्र शब्द से ईश्वर और सभापति का प्रकाश किया है

एताया॒मोपं गव्यन्त॒ इन्द्र॑म॒स्माकं सु प्रम॑तिं वावृधाति

अनामृणः। कुविंदादस्य रायो गवां केतं परमावर्जत नः॥१॥

आ। हुतअामा उपा गव्यन्तःइन्द्रम्। अस्माकम्। सु। प्रऽमंतिम्। ववृधातअनामृणःकुवित्आत्। अस्य। रा॒यः। गाम्। केतम्। परम्। आऽवर्जत। नः॥१॥

पदार्थ:-(आ) समन्तात् (इत) प्राप्नुत (अयाम) प्राप्नुयाम। अयं लोडुत्तमबहुवचने प्रयोगः (उप) सामीप्ये (गव्यन्तः) आत्मनो गा इन्द्रियाणीच्छन्तः। अत्र गो शब्दात् सुप आत्मन: क्यच्। (अष्टा०३.१.८) इति क्यच्। गौरिति पदनामसु पठितम्। (निघं०४.१) (इन्द्रम्) परमेश्वरम् (अस्माकम्) मनुष्यादीनाम् (सु) पूजायाम् (प्रमतिम्) प्रकृष्टा मतिर्विज्ञानं यस्य तम् (वावृधाति) वर्द्धयेत्। अत्र वृधुधातोर्लेट् बहुलं छन्दसि शप: श्लुः व्यत्ययेन परस्मैपदम्। तुजादीनां दीर्घ० (अष्टा०६.१.७) इत्यभ्यासदीर्घत्वमन्तर्गतो ण्यर्थश्च। (अनामृणः) अविद्यमाना समन्तान् मृणा हिंसका यस्य सः (कुवित्) बहुविधानि। कुविदिति बहुनामसु पठितम्। (निघं०३.१) (आत्) अनन्तरार्थे (अस्य) जगतः (रायः) प्रशस्तानि धनानि (गवाम्) मनआदीनामिन्द्रियाणां पृथिव्यादीनां पशूनां वा (केतम्) प्रज्ञानम्। केत इति प्रज्ञानामसु पठितम्। (निघं०३.९) (परम्) प्रकृष्टम् (आवर्जते) समन्ताद्वर्जयति त्याजयति। अत्राङ्पूर्वाद् वृजीधातोर्लट् बहुलं छन्दसि इति शपो लुङ् न। अन्तर्गतो ण्यर्थश्च। (नः) अस्मभ्यम्॥१॥

अन्वयः-हे मनुष्या! यथा गव्यन्तो वयं योऽस्माकमस्य जगतश्च कुविद्रायो वावृधाति, यश्च आदनन्तरं नोऽस्मभ्यमनामृणो गवां परं केतं वावृधात्यज्ञानं चावर्जते सुप्रमतिमिन्द्रं परेशं न्यायाधीशं वा शरणमुपायाम तथैव यूयमप्येत॥१॥ __

_ भावार्थः-अत्र श्लेषालङ्कारःमनुष्यैरविद्यानाशविद्यावृद्धियां यः परमं धनं वर्द्धयति तस्यैवेश्वरस्याज्ञापालनोपासनाभ्यां शरीरात्मबलं नित्यं वर्द्धनीयम्। न तस्य सहायेन विना कश्चिद्धर्मार्थकाममोक्षाख्यं फलं प्राप्तुं शक्नोतीति।।१।

पदार्थ:-हे मनुष्यो! (गव्यन्तः) अपने आत्मा गौ आदि पशु और शुद्ध इन्द्रियों की इच्छा करने वाले हम लोग जो (अस्माकम्) हम लोगों और (अस्य) इस जगत् के (कुवित्) अनेक प्रकार के (रायः) उत्तम धनों को (वावृधाति) बढ़ाता और जो (आत्) इसके अनन्तर (नः) हम लोगों के लिये (अनामृणः) हिंसा, वैर, पक्षपातरहित होकर (गवाम्) मन आदि इन्द्रिय, पृथिवी आदि लोक तथा गौ आदि पशुओं के (परम्) उत्तम (केतम्) ज्ञान को बढ़ाता और अज्ञान का (आवर्जते) नाश करता है, उस (सुप्रमतिम्) उत्तम ज्ञानयुक्त (इन्द्रम्) परमेश्वर और न्यायकर्ता को (उपायाम) प्राप्त होते हैं, वैसे तुम लोग भी (आ इत) प्राप्त होओ।।१॥ __

_ भावार्थ:-यहाँ श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि जो पुरुष संसार में अविद्या का नाश तथा विद्या के दान से उत्तम-उत्तम धनों को बढ़ाता है, परमेश्वर की आज्ञा का पालन और उपासना करके उसी के शरीर तथा आत्मा का बल नित्य बढ़ावे और इसकी सहायता के विना कोई भी मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी फल प्राप्त होने को समर्थ नहीं हो सकता॥१॥

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते॥

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

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