शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

ऋग्वेद 1.32.12

 अश्व्ो वारौ अभव॒स्तदिन्द्र सृके यत्त्वा प्रत्यहन्देव एकः

अजयो गा अजयः शूर सोम॒मासृजः सतवे सप्त सिधून्।॥१२॥

अश्व्यः । वारः। अभवः। तत्। इन्द्र। सके। यत्। त्वा। प्रतिऽअर्हन्। देवः। एकः। अजयः। गाःअजयः। शूर। सोमम्। अवा अ॒सृजः। सर्तवे। स॒प्ता सिन्धून्।॥ १२॥

पदार्थ:-(अश्व्यः ) योऽश्वेषु वेगादिगुणेषु साधुः (वारः) वरीतुमर्हः (अभवः) भवति। अत्र सर्वत्र वर्त्तमाने लङ् व्यत्ययश्च। (तत्) तस्मात् (इन्द्र) शत्रुविदारक (सके) वज्र इव किरणसमूहे। सृक इति वज्रनामसु पठितम्। (निघं०२.२०) (यत्) यः। अत्र सुपाम् इति सोलुंक्। (त्वा) त्वां सभेशं राजानम् (प्रत्यहन्) प्रति हन्ति (देवः) दानादिगुणयुक्तः (एक:) असहाय: (अजयः) जयति (गाः) पृथिवी: (अजयः) जयति (शूर) वीरवन्निर्भय (सोमम्) पदार्थरससमूहम् (अव) अधोऽर्थे (असृजः) सृजति (सर्त्तवे) सर्तुं गन्तुम्। अत्र तुमऽर्थे से० इति तुमर्थे तवेन् प्रत्ययः। (सप्त) (सिन्धून्) भूमौ महाजलाशयसमुद्रनदीकूपतडागस्थांश्चतुरोऽन्तरिक्षे निकटमध्यदूरदेशस्था स्त्रीश्चेति सप्त जलाशयान्॥१२॥

अन्वयः-हे शूरसेनेशन्द्र! त्वं यथा यद् योऽश्व्यो वार एको देवो मेघः सूर्येण सह योद्धाऽभवो भवति सके स्वघनदलं प्रत्यहन् किरणान् प्रति हन्ति सूर्यस्तं मेघं जित्वा गा अजयो जयति सोममजयो जयति एवं कुर्वन् सूर्यो जलानि सर्त्तवे सर्तुमुपर्यधो गन्तुं सप्त सिन्धूनवासृजः सृजति, तथैव शत्रुषु चेष्टसे तत्तस्मात्त्वा त्वां युद्धेषु वयमधिकर्मः ॥१२॥

भावार्थ:-अत्रोपमालङ्कारःयथायं मेघः सूर्यस्य प्रकाशं निवारयति तदा सूर्यः स्वकिरणैस्तं छित्त्वा भूमौ जलं निपातयत्यत एवायमस्य जलसमूहस्य गमनागमनाय समुद्राणां निष्पादनहेतुर्भवति तथा प्रजापालको राजाऽरीनिरुध्य शस्त्रश्छित्त्वाऽधो नीत्वा प्रजाया धर्म्य मार्गे गमनहेतुः स्यात्॥१२॥ ___

पदार्थ:-हे (शूर) वीर के तुल्य भयरहित (इन्द्र) शत्रुओं को विदीर्ण करनेहारे सेना के स्वामी! आप जैसे (यत्) जो (अश्व्यः ) वेग और तड़फ आदि गुणों में निपुण (वारः) स्वीकार करने योग्य (एक:) असहाय और (देवः) उत्तम-उत्तम गुण देने वाला मेघ सूर्य के साथ युद्ध करनेहारा (अभवः) होता है (सूके) किरणरूपी वज्र में अपने बद्दलों के जाल को (प्रत्यहन्) छोड़ता है अर्थात् किरणों को उस घन जाल से रोकता है, सूर्य उस मेघ को जीत कर (गाः) उससे अपनी किरणों को (अजयः) अलग करता अर्थात् एक देश से दूसरे देश में पहुंचाता और (सोमम्) पदार्थों के रस को (अजयः) जीतता है। इस प्रकार करता हुआ वह सूर्यलोक जलों को (सर्त्तवे) ऊपर नीचे जाने आने के लिये सब लोकों में स्थिर होने वाले (सप्त) (सिधून) बड़े-बड़े जलाशय, नदी, कुंआ और साधारण तालाब ये चार जल के स्थान पृथिवी पर और समीप, बीच और दूरदेश में रहने वाले तीन जलाशय इन सात जलाशयों को (अवासृजः) उत्पन्न करता है, वैसे शत्रुओं में चेष्टा करते हो (तत्) इसी कारण (त्वा) आपको युद्धों में हम लोग अधिष्ठाता करते हैं।।१२॥

भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे यह मेघ सूर्य के प्रकाश को ढांप देता, तब वह सूर्य अपनी किरणों से उसको छिन्न-भिन्न कर भूमि में जल को वर्षाता है। इसी से यह सूर्य उस जल समुदाय को पहुंचाने न पहुंचाने के लिये समुद्रों को रचने का हेतु होता है, वैसे प्रजा का रक्षक राजा शत्रुओं को बाँध शस्त्रों से काट और नीच गति को प्राप्त करके प्रजा को धर्मयुक्त मार्ग में चलाने का निमित्त होवे॥१२॥

एतयोरस्मिन् युद्धे कस्य विजयो भवतीत्युपदिश्यते।।

इन दोनों के इस युद्ध में किस का विजय होता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया

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