शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

ऋग्वेद 1.31.9

 त्वं नो अग्ने पत्रोरुपस्थ आ दे॒वो दे॒वेष्वनवद्य जागृविः

तनूकद्वौधि प्रम॑तिश्च कारवे त्वं कल्याण वसु विश्वमोपिष॥९॥

त्वम्नः। अग्ने। पित्रोः। उपऽस्थै। आदेवः। देवेषु। अनवद्य। जागृविःतनूऽकृत्। बोधि। प्रऽमंतिःच। कारवे। त्वम्। कल्याण। वसु। विश्वम्। आ। ऊपिषे॥ ९॥

पदार्थ:-(त्वम्) सर्वमङ्गलकारकः सभाध्यक्षः (न:) अस्मान् (अग्ने) विज्ञानस्वरूप (पित्रोः) जनकयोः (उपस्थे) उपतिष्ठन्ति यस्मिन् तस्मिन्। अत्र घञर्थे कविधानं स्थास्नापाव्यधिहनियुध्यर्थम्। (अष्टा० वा०३.३.५८) अनेनाधिकरणे कः। (आ) अभितः (देवः) सर्वस्य न्यायविनयस्य द्योतकः (देवेषु) विद्वत्सु अग्न्यादिषु त्रयस्त्रिंशद्दिव्यगुणेषु वा (अनवद्य) न विद्यते वयं निन्द्यं कर्म यस्मिन् तत्सम्बुद्धौ अवधपण्यव-० (अष्टा०३.१.१०१) अनेन गर्थेऽवद्यशब्दो निपातितः। (जागृविः) यो नित्यं धर्म्य पुरुषार्थे जागर्ति सः (तनूकृत्) यस्तनूषु पृथिव्यादिविस्तृतेषु लोकेषु विद्यां करोति सः (बोधि) बोधय। अत्र लोडर्थे लङडभावोऽन्तर्गतो ण्यर्थश्च। (प्रमति:) प्रकृष्टा मतिर्ज्ञानं यस्य सः (च) समुच्चये (कारवे) शिल्पकार्यसम्पादनाय (त्वम्) सर्वविद्यावित् (कल्याण) कल्याणकारक (वसु) विद्याचक्रवर्त्यादिराज्यसाध्यधनम् (विश्वम्) सर्वम् (आ) समन्तात् (ऊपिषे) वपसि। अत्र लड लिट्॥९॥ ___

अन्वयः-अनवद्याग्ने सभास्वामिन्! जागृविर्देवस्तनूकृत्त्वं देवेषु पित्रोरुपस्थे नोऽस्मानोपिणे वपसि सर्वतः प्रादुर्भावयसि। हे कल्याणप्रमतिस्त्वं कारवे मा विश्वमाबोधि समन्ताद्वोधय॥९॥ __

भावार्थः-पुनरित्थं जगदीश्वरः प्रार्थनीयः। हे भगवन्! यदा यदास्माकं जन्म दद्यास्तदा तदा विद्वत्तमानां सम्पर्के जन्म दद्यास्तत्रास्मान् सर्वविद्यायुक्तान् कुरु, यतो वयं सर्वाणि धनानि प्राप्य सदा सुखिनो भवेमेति।।९॥

पदार्थ:-हे (अनवद्य) उत्तम कर्मयुक्त (अग्ने) सब पदार्थों के जानने वाले सभापते! (जागृविः) धर्मयुक्त पुरुषार्थ में जागने (देवः) सब प्रकाश करने (तनूकृत्) और बड़े-बड़े पृथिवी आदि बड़े लोकोंमें ठहरने हारे आप (देवेषु) विद्वान् वा अग्नि आदि तेजस्वी दिव्य गुणयुक्त लोकों में (पित्रोः) मातापिता के (उपस्थे) समीपस्थ व्यवहार में (न:) हम लोगों को (ऊपिषे) वार-वार नियुक्त कीजिये(कल्याण) हे अत्यन्त सुख देने वाले राजन्! (प्रमतिः) उत्तम ज्ञान देते हुए आप (कारवे) कारीगरी के चाहने वाले मुझ को (वसु) विद्या, चक्रवर्त्ति राज्य आदि पदार्थों से सिद्ध होने वाले (विश्वम्) समस्त धन का (आबोधि) अच्छे प्रकार बोध कराइये।९।

भावार्थ:-फिर भी ईश्वर की इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये कि हे भगवन्! जब-जब आप जन्म दें, तब-तब श्रेष्ठ विद्वानों के सम्बन्ध में जन्म दें और वहाँ हम लोगों को सर्व विद्यायुक्त कीजिये, जिससे हम लोग सब धनों को प्राप्त होकर सदा सुखी हों॥९॥

पुन सः कीदृश इत्युपदिश्यते॥

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

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