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ऋग्वेद 1.30.3

 सं यन्माय शुष्मिण एना ह्यस्योदरै

समुद्रो न व्यचौ धे॥३॥

सम्। यत्। माया शुष्मिणे। एना। हि। अस्य। उदरे। समुद्रः। न। व्यचः। धे।॥ ३॥

पदार्थः-(सम्) सम्यगर्थे (यत्) याः (मदाय) हर्षाय (शुष्मिणे) शुष्मं प्रशस्तं बलं विद्यते यस्मिन् व्यवहारे तस्मै। शुष्ममिति बलनामसु पठितम्। (निघं०२.९) अत्र प्रशंसार्थ इनिः। (एना) एनेन शतेन सहस्रेण वा। अत्र सुपां सुलुग्० इत्याकारादेशः। (हि) खलु (अस्य) इन्द्राख्यस्याग्ने: (उदरे) मध्ये (समुद्रः) जलाधिकरणः (न) इव (व्यचः) विविधं जलादिवस्त्वञ्चन्ति ताः । अत्र व्युपपदादऽचेः किन् ततो जस्। (दधे) धरेयम्॥३॥ __

अन्वयः-अहं कि खलु मदाय शुष्मिणे समुद्रो व्यचो नो वाऽस्येन्द्राख्यस्याग्नेरुदर एना एनेन शतेन सहस्रेण च गुणैः सह वर्तमाना यत् याः क्रियाः सन्ति ताः सन्दधे॥३॥

भावार्थ:-अत्रोपमालङ्कारःयथा समुद्रस्योदरेऽनेके गुणा रत्नानि सन्त्यगाधं जलं वास्ति तथैवाग्नेमध्येऽनेके गुणा अनेकाः क्रिया वसन्ति। तस्मान्मनुष्यैरग्निजलयोः सकाशात् प्रयत्नेन बहुविध उपकारो ग्रहीतुं शक्य इति॥३॥

पदार्थ:-मैं (हि) अपने निश्चय से (मदाय) आनन्द और (शुष्मिणे) प्रशंसनीय बल और ऊर्जा जिस व्यवहार में हो, उसके लिये (समुद्रः) (न) जैसे समुद्र (व्यचः) अनेक व्यवहार (न) सैकड़ह हजार गुणों सहित (यत्) जो क्रिया हैं, उन क्रियाओं को (सन्दधे) अच्छे प्रकार धारण करूं।।३।।

भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे समुद्र के मध्य में अनेक गुण, रत्न और जीव-जन्तु और अगाध जल है, वैसे ही अग्नि और जल के सकाश से प्रयत्न के साथ बहुत प्रकार का उपकार लेना चाहिये॥३॥ __

_पुनः स एवोपदिश्यते।

फिर भी उसी विषय का अगले मन्त्र में प्रकाश किया है।