गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

ऋग्वेद 1.23.6

 वरुणः प्राविता भुवन्मित्रो विश्वाभिरूतिभिः।

करतां नः सुराधसः॥६॥

वरुणः। प्रअविता। भुव॒त्। मित्रः। विश्वाभिः। ऊतिऽभिः। करताम्। नः। सुऽराधसः॥६॥

पदार्थ:-(वरुणः) बाह्याभ्यन्तरस्थो वायुः (प्राविता) सुखप्रापकः (भुवत्) भवति। अत्र लडर्थे लेट् बहुलं छन्दसि इति शपो लुक्। भूसुवोस्तिङि। (अष्टा०७.३.८८) अनेन गुणनिषेधः। (मित्रः) सूर्य्यःअत्र अमिचिमिश० (उणा०४.१६४) अनेन कत्रः प्रत्ययः। (विश्वाभिः) सर्वाभिः (ऊतिभिः) रक्षणादिभिः कर्मभिः (करताम्) कुरुतः। अत्रापि लडर्थे लोट। विकरणव्यत्ययश्च। (न:) अस्मान् (सुराधसः) शोभनानि विद्याचक्रवर्तिराज्यसंम्बन्धीनि राधांसि धनानि येषां तानेवं भूतान्॥६॥ ___

अन्वयः-यथायं सुयुक्त्या सेवितो वरुणो विश्वाभिरूतिभिः सर्वेः पदार्थेः प्राविता भुवत् भवति मित्रश्च यौ नोस्मान् सुराधसः करताम् कुरुतस्तमादेतावस्माभिरप्येवं कथं न परिचयॊ वर्तेते॥६॥

भावार्थ:-यस्मादेतयोः सकाशेन सर्वेषां पदार्थानां क्षणादयो व्यवहारास्सम्भवन्त्यस्माद्विद्वांस एनाभ्यां बहूनि कार्याणि संसाध्योत्तमानि धनानि प्राप्नुवन्तीति॥६॥

पदार्थ:-जैसे यह अच्छे प्रकार सेवन किया हुआ (वरुणः) बाहर वा भीतर रहनेवाला वायु (विश्वाभिः) सब (ऊतिभिः) रक्षा आदि निमित्तों से सब प्राणि या पदार्थों को करके (प्राविता) सुख प्राप्त करने वाला (भुवत्) होता है (मित्रश्च) और सूर्य भी जो (न:) हम लोगों को (सुराधसः) सुन्दर विद्या और चक्रवर्त्ति राज्यसम्बन्धी धनयुक्त (करताम्) करते हैं, जैसे विद्वान् लोग इन से बहुत कार्यों को सिद्ध करते हैं, वैसे हम लोग भी इसी प्रकार इन का सेवन क्यों न करें॥६॥ ___+

भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैजिसलिये इन उक्त वायु और सूर्य के आश्रय करके सब पदार्थों के रक्षा आदि व्यवहार सिद्ध होते हैं, इसलिये विद्वान् लोग भी इनसे बहुत कार्यों को सिद्ध करके उत्तम उत्तम धनों को प्राप्त होते हैं।।६।__

अथ वायुसहचारीन्द्रगुणा उपदिश्यन्ते

अब अगले मन्त्र में वायु के सहचारी इन्द्र के गुण उपदेश किये हैं

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