गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

ऋग्वेद 1.23.20

 अ॒प्स्वन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुत प्रशस्तये

देवा भवत वाजिनः॥१९॥

अप्ऽसु। अन्तः। अमृतम्। अप्ऽसु। भेषजम्। अ॒पाम्। उता प्रशस्तये। देवाः। भवत। वाजिनः॥१९॥

पदार्थ:-(अप्सु) जलेषु (अन्तः) मध्ये (अमृतम्) मृत्युकारकरोगनिवारकं रसम् (अप्सु) जलेषु (भेषजम्) औषधम् (अपाम्) जलानाम् (उत) अप्यर्थे (प्रशस्तये) उत्कर्षाय (देवाः) विद्वांसः (भवत) स्त: (वाजिनः) प्रशस्तो बाधो येषामस्ति ते। अत्र प्रशंसार्थ इनिः। गत्यर्थाद्विज्ञानं गृह्यते॥१९॥

अन्वयः-हे देवा विद्वांसो यूयं प्रशस्तयेऽप्स्वन्तरमृतमुताऽप्सु भेषजम् विदित्वाऽपां प्रयोगेण वाजिनो भवत॥१४॥

भावार्थ:-हे मनुष्या! यूयममृतरसाभ्य ओषधिगर्भाभ्योऽद्भयः शिल्पवैद्यकविद्याभ्यां गुणान् विदित्वा शिल्पकार्यसिद्धिं रोगनिवारणं च नित्यं कुरुतेति।।१९।

पदार्थ:-हे (देवाः) विद्वानो! तुम (प्रशस्तये) अपनी उत्तमता के लिये (अप्सु) जलों के (अन्तः) भीतर जो (अमृतम्) मार डालने वाले रोग का निवारण करने वाला अमृतरूप रस (उत) तथा (अप्सु) जलों में (भेषजम्) औषध हैं, उनको जानकर (अपाम्) उन जलों की क्रियाकुशलता से (वाजिनः) उत्तम श्रेष्ठ ज्ञान वाले (भवत) हो जाओ।।१९।

भावार्थ:-हे मनुष्यो तुम अमृतरूपी रस वा ओषधि वाले जलों से शिल्प और वैद्यकशास्त्र की विद्या से उनके गुणों को जानकर कार्य की सिद्धि वा सब रोगों की निवृत्ति नित्य करो॥१९॥

पुनस्ता कीदृश्य इत्युपदिश्यते।

फिर वे जल किस प्रकार के हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

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