गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

ऋग्वेद 1.23.17

 अम्बयो यन्त्यव॑भिर्जामयो अध्वरीयताम्।

पृञ्चतीमधुना पर्यः॥१६॥

अम्बयः। यन्ति। अव॑ऽभिः। जामयः। अध्वरिऽयताम्। पृञ्चतीः। मधुना। पर्यः॥१६॥

पदार्थ:-(अम्बयः) रक्षणहेतव आप: (यन्ति) गच्छन्ति (अध्वभिः) मार्गः (जामयः) बन्धव इव (अध्वरीयताम्) आत्मनोऽध्वारमिच्छतामस्माकम्। अत्र न छन्दस्यपुत्रस्य। (अष्टा०७.४.३५) अपुत्रादीनामिति वक्तव्यम् (अष्टा० वा०७.४.३५) इति वचनादीकारनिषेधो न भवति वा छन्दसि सर्वे विधयो भवन्ति इति नियमात् कव्यध्वरपृतनस्यर्चि लोपः। (अष्टा०७.४.३९) इत्यकारलोपोऽपि न भवति (पृञ्चतीः) स्पर्शयन्त्यः। अत्र सुपां सुलुग्० इति पूर्वसवर्णादेशोऽन्तर्गतो ण्यर्थश्च। (मधुना) मधुरगुणेन सह (पयः) सुखकारकं रसम्॥१६॥

अन्वयः-यथा बन्धूनां जामयो बन्धवोऽनुकूलाचरणैः सुखानि सम्पादयन्ति, तथैवेमा अम्बय आपो अध्वरीयतामस्माकमध्वभिर्मधुना पयः पृञ्चती: स्पर्शयन्त्यो यन्ति॥१६॥

भावार्थ:-अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा बन्धवः स्वबन्धून् सम्पोष्य सुखयन्ति, तथेमा आप उपर्य्यधो गच्छन्त्यः सत्यो मित्रवत् प्राणिनां सुखानि सम्पादयन्ति, नैताभिर्विना केषांचित् प्राण्यप्राणिनामुन्नतिः सम्भवति तस्मादेताः सम्यगुपयोजनीयाः॥१६॥

पदार्थ:-जैसे भाइयों को (जामयः) भाई लोग अनुकूल आचरण सुख सम्पादन करते हैं, वैसे ये (अम्बयः) रक्षा करने वाले जल (अध्वरीयताम्) जो कि हम लोग अपने आप को यज्ञ करने की इच्छा करते हैं, उनको (मधुना) मधुरगुण के साथ (पयः) सुखकारक रस को (अध्वभिः) मार्गों से (पृञ्चती:) पहुंचाने वाले (यन्ति) प्राप्त होते हैं।।१६।।

भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बन्धुजन अपने भाई को अच्छी प्रकार पुष्ट करके सुख करते हैं, वैसे ये जल ऊपर-नीचे जाते-आते हुए मित्र के समान प्राणियों के सुखों कोसम्पादन करते हैं और इनके विना किसी प्राणी वा अप्राणी की उन्नति नहीं हो सकती। इससे ये रस को उत्पत्ति के द्वारा सब प्राणियों को माता पिता के तुल्य पालन करते हैं॥१६॥

___पुनस्ताः कीदृश्य इत्युपदिश्यते।।

फिर वे जल कैसे है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है

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