ऋग्वेद 1.22.10

 आ ग्ना अग्न डहाव॑से होत्रां यविष्ठ भारतीम्व

रूत्री धिषणां वह॥१०॥५॥

आ। ग्नाः। अ॒ग्ने। इह। अव॑से। होयम्। यविष्ठ। भारतीम्। वरूत्रीम्। धिषणाम्। वह॥ १०॥

पदार्थः-(आ) क्रियायोगे (ग्नाः) पृथिव्याः। ग्ना इत्युत्तरपदनामसु पठितम्। (निघं०३.२९) (अग्ने) पदार्थविद्यावेत्तर्विद्वन् (इह) शिल्पकार्येषु (अवसे) प्रवेशाय (होत्राम्) हुतद्रव्यगतिम् (यविष्ठ) यौति मिश्रयति विविनक्ति वा सोऽतिशयितस्तत्सम्बुद्धौ। (भारतीम्) यो ययाशुभैर्गुणैर्बिभर्ति पृथिव्यादिस्थान् प्राणिनः स भरतस्तस्येमां भाम्। भरत आदित्यस्तस्य भा इळा। (निरु०८.१३) (वरूत्रीम्) वरितुं स्वीकर्तुमर्हाम्। अहोरात्राणि वै वरूत्रयः। (श० ब्रा०६.४.२.६) (धिषणाम्) धृष्णोति कार्येषु यया तामग्ने लाप्रेरितां वाचम्। धिषणेति वाड्नामसु पठितम्। (निघं०१.११) धृषेर्धिषच् संज्ञायाम्। (उणा० २.८०) इति क्युः प्रत्ययो धिषजादेशश्च। (वह) प्राप्नुहि। अत्र व्यत्ययो लडथै लोट च॥१०॥

अन्वयः-हे यविष्ठाग्ने विद्वंस्त्वमिहावसे ग्ना होत्रां भारती वरूत्री धिषणामा वह समन्तात् प्राप्नुहि।।१०॥

भावार्थ:-विद्वद्भिरस्मिन् संसारे मनुष्यजन्म प्राप्य वेदादिद्वारा सर्वा विद्याः प्रत्यक्षीकाऱ्याःनैव कस्यचिद् द्रव्यस्य गुणकर्मस्वभावानां प्रत्यक्षीकरणेन विना विद्या सफला भवतीति वेदितव्यम्॥१०॥

इति पञ्चमो वर्गः सम्पूर्णः॥

पदार्थ:-हे (यविष्ठ) पदार्थों को मिलाने वा उनमें मिलने वाले (अग्ने) क्रियाकुशल विद्वान् ! तू (इह) शिल्पकार्यों में (अवसे) प्रवेश करने के लिये (ग्नाः) पृथिवी आदि पदार्थ (होत्राम्) होम किये हुए पदार्थों को बहाने (भारतीम्) सूर्य की प्रभा (वरूत्रीम्) स्वीकार करने योग्य दिन रात्रि और (धिषणाम्) जिससे पदार्थों को ग्रहण करते हैं, उस वाणी को (आवह) प्राप्त हो।।१०।

भावार्थ:-विद्वानों को इस संसार में मनुष्य जन्म पाकर वेद द्वारा सब विद्या प्रत्यक्ष करनी चाहिये, क्योंकि कोई भी विद्या पदार्थों के गुण और स्वभाव को प्रत्यक्ष किये विना सफल नहीं हो सकती।।१०॥

यह पांचवा वर्ग पूरा हुआ

अथ विद्वत्स्त्रियोऽप्येतानि कार्याणि कुर्युरित्युपदिश्यते।

अब विद्वानों की स्त्रियां भी उक्त कार्यों को करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में कहा है

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