ऋग्वेद 1.12.11

 स नः स्तन आ भर गायत्रेण नवीयसा

रयिं वीरवीमिषम्॥११॥

सःनःस्तानःआ। भर। गायत्रेणा नवीयसा। रयिम्। वीरऽवतीम्। इषम्।। ११॥

पदार्थः-(स:) पूर्वोक्तं (न:) अस्मभ्यम् (स्तवानः) स्तूयमानः गृहीतगुणो वा। अत्र सम्यानच् स्तुवः। (उणा०२.८६) इति बाहुलकात्समुपपदाभवेऽपि कर्मण्यौणादिक आनच् प्रत्ययःअत्र सायणाचार्येण लट: स्थाने शानचमाश्रित्य स्तूयमानमिति व्याख्यानं कृतमत इदमशुद्धम्। (आ) समन्तात् (भर) धारय धारयति वा (गायत्रेण) गायत्री छन्द आदिर्यस्य प्रगाथस्य तेन। सोऽस्यादिरिति च्छन्दसः प्रगाथेषु। (अष्टा०४.२.५५) इति गायत्रीशब्दादण्। (नवीयसा) अतिशयितेन नवीनेन मन्त्रपाठगानयुक्तेन स्तवनेन (रयिम्) विद्याचक्रवर्तिराज्यजन्यं धनम् (वीरवतीम्) प्रशस्ता वीरा विद्यन्ते यस्याः ताम्। अत्र प्रशंसायां मतुप्। (इषम्) इष्यते या सत्क्रिया ताम्। अत्र कृतो बहुलमिति कर्मणि क्विप्॥११॥

अन्वयः-हे भगवन्! स त्वं नवीयस्सा गायत्रेण स्तवानः सन् नो रयिं वीरवतीमिषं चाभरेत्येकःस भौतिकोऽग्निर्नवीयसा गायत्रेणास्माभिः स्तवानो गृहीतगुणो रयिं वीरवतीमिषं चाभरतीति द्वितीयः॥११॥

भावार्थ:-अत्र श्लेषालङ्कारः। पूर्वस्मान्मन्त्राच्चकारोऽनुकृष्यते। तथा प्रतिजनं नवीनं नवीनं वेदाध्ययनं तज्जन्योच्चारणक्रिया च प्रवर्त्तते तस्मान्नवीयसेत्युक्तम्। यैर्धर्मात्मभिर्मनुष्यैर्यथावच्छब्दार्थसम्बन्धपुरःसरेण वेदस्याध्ययेन तदुक्तकर्मणा च प्रीत: सम्पादितो जगदीश्वर उत्तमानि विद्यादिधनानि शूरत्वादिगुणान् सतीमिच्छां च ददाति।।११।

पदार्थ:-हे भगवन्! (सः) जगदीश्वर आप! (नवीयसा) अच्छी प्रकार मन्त्रों के नवीन पाठ गानयुक्त (गायत्रेण) छन्दवाले प्रगाथों से (स्तवानः) स्तुति को प्राप्त किये हुए (नः) हमारे लिये (रयिम्) विद्या और चक्रवर्त्ति राज्य से उत्पन्न होनेवाले धन तथा जिसमें (वीरवतीम्) अच्छे-अच्छे वीर तथा विद्वान् हों, उस (इषम्) सज्जनों के इच्छा करने योग्य उत्तम क्रिया का (आभर) अच्छी प्रकार धारण कीजिये॥१॥११॥

(सः) उक्त भौतिक अग्नि (नवीयसा) अच्छी प्रकार मन्त्रों के नवीन-नवीन पाठ तथा गानयुक्त स्तुति और (गायत्रेण) गायत्री छन्दवाले प्रगाथों से (स्तवानः) गुणों के साथ ग्रहण किया हुआ (रयिम्) उक्त प्रकार का धन (च) और (वीरवतीम् इषम्) उक्त गुणवाली उत्तम क्रिया को (आभर) अच्छी प्रकार धारण करता है।२॥११॥

भावार्थ:-इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। तथा पहिले मन्त्र से 'चकार' की अनुवत्ति की है। हर एक मनुष्य को वेद आदि के नवीन-नवीन अध्ययन से वेद की उच्चारणक्रिया प्राप्त होती है, इस कारण 'नवीयसा' इस पद का उच्चारण किया है। जिन धर्मात्मा मनुष्यों ने यथावत् शब्दार्थपूर्वक वेद के पढ़ने और वेदोक्त कर्मों के अनुष्ठान से जगदीश्वर को प्रसन्न किया है, उन मनुष्यों को वह उत्तम-उत्तम विद्या आदि धन तथा शूरता आदि गुणों को उत्पन्न करनेवाली श्रेष्ठ कामना को देता है, क्योंकि जो वेद के पढ़ने और परमेश्वर के सेवन से युक्त मनुष्य हैं, वे अनेक सुखों का प्रकाश करते हैं।॥११॥

पुनरेतद्गुणा उपदिश्यन्ते।

फिर भी अगले मन्त्र में इन्हीं के गुणों का उपदेश किया है

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