ऋग्वेद 1.4.2

 उप॑ नः सवनाहि सोम॑स्य सोमपा: पिब

गोदा इद्रेवो मदः॥२॥

उप। नः। सर्वना। आ। गहि। सोमस्य। सोमऽपाः। पिब। गोऽदाः। इत्। रेवतः। मदः॥२॥

पदार्थ:-(उप) सामीप्ये (न:) अस्माकम् (सवना) ऐश्वर्ययुक्तानि वस्तूनि प्रकाशयितुम्। सु प्रसवैश्वर्ययोः इत्यस्माद्धातोर्म्युट् प्रत्ययः (अष्टा०३.३.११४) शेश्छन्दसि बहुलमिति शेर्लुक्। (आगहि) आगच्छति। शपो लुकि सति वाच्छन्दसीति हेरपित्वादनुदात्तोपदेश०। (अष्टा०६.४.३७) इत्यनुनासिकलोप: लडथै लोट् च। (सोमस्य) उत्पन्नस्य कार्य्यभूतस्य जगतो मध्ये (सोमपाः) सर्वपदार्थरक्षकः सन् (पिब) पिबति। अत्र व्यत्ययः लडर्थे लोट् च। (गोदाः) चक्षुरिन्द्रियव्यवहारप्रदः। क्विप् चेति क्विप् प्रत्ययः। गौरिति पदनामसु पठितम्। (निघ०५.५) जीवो येन रूपं जानाति तस्माच्चक्षुर्गो:। (इत्) एव (रेवतः) पदार्थप्राप्तिमतो जीवस्य। छन्दसीर इति वत्वम्। (मदः) हर्षकरः॥२॥ __ अन्वयः-यतोऽयं सोमपा गोदा इन्द्रः सूर्य्यः सोमस्य जगतो मध्ये स्वकिरणैः सवना सवनानि प्रकाशयितुमुपागहि उपागच्छति तस्मादेव नोऽस्माकं रेवत: पुरुषार्थिनो जीवस्य च हर्षकरो भवति॥२॥

भावार्थ:-सूर्य्यस्यः प्रकाशे सर्वे जीवाः स्वस्य स्वस्य कर्मानुष्ठानाय विशेषतः प्रवर्त्तन्ते नैवं रात्रौ कश्चित्सुखतः कार्याणि कर्तुं शक्नोतीति।।२।

पदार्थान्वयभाषा-(सोमपाः) जो सब पदार्थों का रक्षक और (गोदाः) नेत्र के व्यवहार को देनेवाला सूर्य अपने प्रकाश से (सोमस्य) उत्पन्न हुए कार्य्यरूप जगत् में (सवना) ऐश्वर्ययुक्त पदार्थों के प्रकाश करने को अपनी किरण द्वारा सन्मुख (आगहि) आता है, इसी से यह (न:) हम लोगों तथा (रेवतः) पुरुषार्थ से अच्छे-अच्छे पदार्थों को प्राप्त होनेवाले पुरुषों को (मदः) आनन्द बढ़ाता है॥२॥

भावार्थ:-जिस प्रकार सब जीव सूर्य के प्रकाश में अपने-अपने कर्म करने को प्रवृत्त होते हैं, उस प्रकार रात्रि में सुख से नहीं हो सकते।२॥

येनायं सूर्यो रचितस्तं कथं जानीमेत्युपदिश्यते।

जिसने सूर्य को बनाया है, उस परमेश्वर ने अपने जानने का उपाय अगले मन्त्र में जनाया है

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