श्री बलदेव मंदिर-जम्मू काश्मीर का अकेला विष्णु शेषावतार का मंदिर-जिसके दर्शन मात्र से ही हो जाता है कालसर्प दोष का निवारण 


जम्मू के पंजतीर्थी क्षेत्र में स्थित 'श्री बलदेव जी मंदिर' का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है | जम्मू काश्मीर राज्य में  लगभग एक हजार से ऊपर हिन्दू देवी-देवताओं के पौराणिक काल के मंदिर आज भी अस्तित्व में है, किन्तु जम्मू शहर में तवी नदी के ठीक किनारे धौंथली डक्की में भगवान विष्णु के शेष अवातर हलधर श्रीबलराम का अकेला मंदिर में आज भी श्रद्धालु आते हैं | इस मंदिर में ऐसी मान्यता है कि यहाँ भगवान बलराम-देवी रेवती के आशीर्वाद से भक्त अपने मनोनुकूल जीवन साथी प्राप्त करते हैं |
   लगभग दो सौ वर्ष पूर्व महाराजा श्रीरणजीत के शासन काल में अनेकों मंदिरों का जीर्णोद्धार हुआ | जम्मू के इस ऐतिहासिक श्रीबलदेव मंदिर का भी पुनर्निमाण किया | डोगरा शासन काल में इस पंजतीर्थी (पञ्च तीर्थ ) अनेक मंदिरों को उनके वैभव काल के समान जागृत किया गया | तवी नदी को सूर्य पुत्री भी कहा जाता है | इस कारण भी इस पंजतीर्थी की महिमा है | 
     श्रीबलराम के एक हाथ में हल रहता है जो कृषि कर्म का प्रतीक है, और दुसरे हाथ में मूसल है, जो दुष्टों के संहार के लिए है | श्रीशेषावतार के इस लीला रूप के कारण बहुत ही पूजनीय रहे हैं, जिससे कृषि प्रधान संस्कृति की रक्षा हो सके |    
     इस  श्रीबलदेव मंदिर के गर्भ गृह का शिखर बहुत ही ऊँचा है, जहाँ विष्णु कलश स्थापित है | पिछले कुछ वर्षों से मंदिर प्रबन्ध के ठीक से रखरखाव न होने के गर्भ गृह के भीतर दीवारों के ऊपर के चारों चित्र मिटते जा रहे हैं | इस गर्भ के चारों की प्रदक्षिणा पथ भी ढका हुआ है, उसकी दीवारों पर भी बने दुर्लभ चित्रों ध्यान न देने के कारण अब धीरे-धीरे नष्ट हो रहे है |
  गर्भगृह में मूल विग्रह श्रीबलराम जी और उनकी पत्नी रेवती जी का है | भगवान कृष्ण श्याम वर्ण के थे, यहाँ श्रीबलराम की प्रतिमा भी श्यामवर्ण की है, जबकि वास्तव में श्री बलराम जी गौर वर्ण के हैं | इस मंदिर के मान्यता यह है कि जिनके विवाह में विलम्ब हो रहा है, बार-बार बाधाएं आती हो, तो वे यहाँ बलराम जी को मौली बांधते हैं, प्रदक्षिणा करते हैं, जिसके उपरान्त उनकी सर्व प्रकार की बाधा दूर हो जाती है | 
श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार  रेवती का जन्म सतयुग में हुआ था | योग्य वर न मिलने पर इनके पिता महाराज रेवत अपनी पुत्री रेवती को लेकर ब्रह्मा के पास गये | उस समय हाहा, हूहू नामक दो गंधर्व गान  प्रस्तुत कर रहे थे | गान समाप्त होने के उपरांत उन्होंने ब्रह्मा से रेवती के योग्य वर न मिल पाने की बात कही |
ब्रह्मा ने कहा,"यह गान जो तुम्हें अल्पकालिक लगा, वह चतुर्युग तक चला | अब पृथ्वी पर तुम्हारे समकालीन सम्बन्धी जन नहीं रहे | तुम विष्णु के शेषावतार के साथ इसका पाणिग्रहण कर दो वह बलराम के रूप में अवतरित हैं |"
  फिर जब राजा रेवती को लेकर पृथ्वी पर वापस आए तो द्वापर युग का अंतिम समय था | विभिन्न नगर राज्य जैसे छोड़ गये थे, वैसे अब शेष नहीं थे | श्रेष्ठ मनुष्यों की लम्बाई सात फीट हो गयी थी | बलराम ने रेवती को अट्ठाइस फीट लंबा देखकर अपने हल की नोक से दबाकर उनकी लंबाई अपने अनुकूल कर दी | वह अन्य आर्य नारियों के  समान हो गयी | 
 एक और विशेष बात इस मंदिर से जुड़ी है कि यदि किसी  जातक की कुंडली में कालसर्प योग है, तो वह दिव्य मंदिर में प्रवेश करके गर्भ के दर्शन मात्र से कालसर्प के दोष समाप्त हो जाता है | 
         


     श्रीशेषावतार भगवान बलदेव के इस मंदिर परिसर में विचित्र अलौकिक शक्ति है जिसके दिव्य प्रभाव से कालसर्प दोष व प्रणय बाधाओं का निवारण होता है | जो भी भक्त सच्चे ह्रदय से अन्य कोई कामना लेकर आता है उसकी कामनापूर्ति भी यहाँ होती है | इस कारण से इस जम्मू काश्मीर भू-भाग में अकेला यही मंदिर है जहाँ साक्षात दिव्य शक्ति के रूप में श्रीबलराम-रेवती विद्यमान है |
साल में एक बार विशेष भंडारा होता है | देश भर से श्रद्धालु यहाँ एकत्रित होते हैं |
श्रीबलराम जी का पौराणिक मंदिर 'बलदाऊ का मंदिर' मथुरा में है | जिसका पांच हजार साल पुराना इतिहास है | इसके अतिरिक्त एक अन्य श्रीबलराम के मंदिर, ग्वालियर में है | वैसे तो बलदाऊ की मूर्तियाँ अनेक मंदिरों में किन्तु हजारों वर्ष पुराने इस पंजतीर्थी क्षेत्र में दूर-दूर से हिन्दू सनातनी लोग आते रहे हैं | 
  महाभारत काल के युद्ध में श्रीबलराम ने भाग नहीं लिया था, वे तीर्थ यात्रा में चले गए थे | इस पंजतीर्थी क्षेत्र में भी श्रीबलराम जी ने तवी नदी के तट पर वास किया था | 
राजतरंगिणी में भी एक स्वयंवर में भाग लेने हेतु श्रीकृष्ण और श्रीबलराम जी की गांधार यात्रा के समय में उनके काश्मीर प्रवास की चर्चा है | 
श्रीबलराम 'नारायणीयोपाख्यान' में वर्णित व्यूहसिद्धान्त के अनुसार विष्णु के चार रूपों में दूसरा रूप 'संकर्षण' अवतार के रूप में हजारों साल से पूजे जाते रहे हैं | जब कंस ने देवकी-वसुदेव के छ: पुत्रों को मार डाला, तब देवकी के गर्भ में भगवान बलराम पधारे |  योगमाया ने उन्हें आकर्षित करके नन्द बाबा के यहाँ निवास कर रही श्री रोहिणी जी के गर्भ में पहुँचा दिया | इसलिये उनका एक नाम संकर्षण पड़ा |


(सभी छाया चित्र श्रीवीरेन्द्र बांगरू, क्षेत्रीय निदेशक- इंदिरागांधी राष्ट्रीय कला व संस्कृति, जम्मू-काश्मीर और लद्दाख के विशेष सहयोग से प्राप्त हुए )


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