रविवार, 11 जुलाई 2021

जगद्गुरु रामानुजाचार्य ने भी इसी महाशक्ति पीठ- शारदा सर्वज्ञ पीठ से प्रेरणा प्राप्त की थी


 नमस्ते शारदे देवि, काश्मीरपुर वासिनी, 

त्वामहं प्रार्थये नित्यं, विद्यादानं च देहि मे 

श्री शारदा सर्वज्ञ पीठ-काश्मीर का इतिहास 

प्राक्कथन 

   महाभारत काल में महाराजा युधिष्ठिर ने भारतवर्ष का विस्तार काम्बोज वर्तमान अफगानिस्तान तक किया था. धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी भी गांधार देश की थी, जो अब कंधार के नाम से जाना जाता है. पांच हजार वर्ष पूर्व इन देशों में सनातन धर्म ही राज धर्म रहा. राज सत्ता के लिए छल बल का प्रयोग हमेशा से रहा है, किन्तु किसी नए राजा के सत्ता प्राप्त करने पर न तो राजा का ही धर्म बदलता था, न ही प्रजा का ही धर्म बदलता था. राज शक्ति कभी भी धर्म की संस्कृति का उल्लंघन नहीं कर पायी. 

   जो हमारे पूर्वज मानते आए हैं, पृथ्वी पर मानव जीवन के साथ वैदिक धर्म की सनातन संस्कृति भी प्रवाहित होती रही है. पृथ्वी के संसाधनों पर प्रभुत्व हासिल करने के लिए मानव वीरों में रक्त युद्ध जीवन की नियति के रूप में देखा जाता रहा है. इस पृथ्वी व इसके ऊर्ध्व लोकों पर भी अधिपत्य को लेकर देवताओं और असुरों का संग्राम हमारे धर्म ग्रंथों में इतिहास-पुराण कथा रूप प्रचलित है. वीरों के लिए युद्ध क्षात्र धर्म की नियति है, वीरगति को प्राप्त होना ही धर्म है. 

   वीर ही इस धरा को भोगते हैं. जो शत्रुओं के साथ वीरता से युद्ध नहीं करते है, मृत्यु से भयभीत रहते हैं, वे भू पर अधिकार खो बैठते हैं. और रोग-शोक व वियोग से प्राप्त मृत्यु के पश्चात् अधोलोक को प्राप्त होते हैं, नरक भोगते हैं. भारत का आत्मज्ञान ही शूरवीरों को युद्ध में प्रचंड पराक्रम के लिए प्रेरित करता आया है. 

    उसी आत्म सत्ता से अभिभूत होकर ही काश्मीर की महाशक्ति पीठ माँ शारदा सर्वज्ञ पीठ पर विश्व के विद्वानों के आमंत्रण के लिए यह विचार प्रकट हो रहे हैं. यह नियति का ही गुप्त आग्रह है. यह आमंत्रण उन सभी राष्ट्र भक्तों के लिए है, जो आदि शंकर को जगद्गुरु की उपाधि प्रदान करने वाली माँ शारदा की सेवा का अवसर प्राप्त करना चाहते हैं. 

       श्री शारदा सर्वज्ञ पीठ, काश्मीर भारतवर्ष के अट्ठारह महाशक्ति पीठों में सबसे अग्रणी है. भगवान् शिव के अंश अवतार आदि शंकर ने अपनी दिग्विजय की उत्कृष्ट लीला यही संपन्न की थी. यहीं सर्वज्ञ पीठ पर माँ शारदा से प्रत्यक्ष 'जगद्गुरु' का आशीर्वाद प्राप्त किया था.

     स्वर्ग के प्रतिरूप इस काश्मीर देश की अधिष्ठात्री देवी 'शारदा' हैं, इसी कारण यह पवित्र भूमि 'शारदादेश' या 'शारदमंडल' कहलाता है और इसी से वहाँ की लिपि को 'शारदालिपि' कहते हैं. 

    शारदा, जिसे स्थानीय भाषा में शारदी भी कहते हैं, वर्तमान में पाक-अधिकृत कश्मीर के नीलम ज़िले में स्थित एक तहसील के रूप में आज भारत के मानचित्र में तो जुड़ा है, किन्तु भोगौलिक नियंत्रण से बाहर है. यह नीलम ज़िले की दो तहसील है. किशनगंगा घाटी (नीलम घाटी) में इस  महाशक्ति पीठ के अब भग्नावशेष बचे है. यह किशनगंगा नदी के किनारे समुद्र तल से 1981 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है.

शारदा महाशक्ति पीठ क्षेत्र में मधुमती और कृष्णगंगा के संगम पर गया, हरिद्वार के बाद पितृ कर्म अनुष्ठान व देव कार्य के लिए सनातन धर्मी आते थे. नीलमत पुराण में भी काश्मीर के देव स्थानों में बाबा अमरनाथ के तुल्य ही इस शारदा मंदिर का उल्लेख हुआ है. कल्हण ने अपनी राजतरंगिणी में लिखा है कि हिन्दू सम्राट महाराजा ललितादित्य ने इस शारदा महाशक्ति पीठ के तत्वाधान में संचालित 'शारदा विश्वविद्यालय, शारदा सर्वज्ञ पीठ में चारों दिशाओं से विद्यार्थी आकर वैदिक दर्शन, कला व विज्ञान का अध्ययन करते थे. 

आदि शंकर को जगत गुरु की उपाधि 

   भगवान शिव के 28वें अवतार के रूप में आदि शंकर का जन्म एक शिव भक्त के घर कालड़ी ग्राम, केरल में हुआ. बाल अवस्था में ही उन्होंने अपना दक्षिणामूर्ति रूप प्रकट कर दिया. सात वर्ष की आयु में ही चारों वेदों को कंठ में धारण कर लिया. फिर माता की अनुमति से घर त्याग कर संन्यास ले लिया.  शिव लीला के लिए गुरु गोविन्द पाद से दीक्षा लेकर वे देश भर में वैदिक धर्म की स्थापना के लिए निकल पड़े. 

    सनातन धर्म से विमुख ब्राह्मणों और बौद्ध विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित करते जा रहे थे. किन्तु जगद्गुरु की उपाधि के लिए उन्हें काश्मीर के इस शारदा सर्वज्ञ पीठ पर आना पड़ा, क्योंकि उसका दक्षिण द्वार अर्थात् भारत द्वार बंद था. इस चुनौती को स्वीकार करते हुए इस सर्वज्ञ पीठ की विद्वत सभा को सम्पूर्ण अध्यात्म दर्शन विषयमें परास्त किया और 'जगद्गुरु' की उपाधि से अलंकृत हुए. फिर माँ शारदा के साक्षात् दैवीय रूप से आत्मज्ञान की लीला की. इसके उपरांत ही आदि शंकर ने माँ शारदा की अनुकृति रूप भारतवर्ष के चार कोणों में चार शंकर-शारदा मठ की स्थापना की. पूर्व में द्वारिकापीठ, दक्षिण में श्रृंगेरीपीठ , पूर्व में पूरीपीठ और उत्तर में ज्योतिर्पीठ  में अपने चार शिष्यों को आचार्य नियुक्त किया. 

    इन चार पीठों के माध्यम से ही भारतवर्ष में सनातन धर्म की आश्रम व वर्ण व्यवस्था को सुव्यस्थित किया. वास्तव में ये चार मठ काश्मीर के शारदा सर्वज्ञ मठ की अनुकृति रूप ही हैं, जिससे भारत भूमि पर चक्रवर्ती सनातन धर्म का शासन स्थापित हो. इसी कारण शिव का यह शंकर अवतार हुआ. जम्बुद्वीप में भारतवर्ष प्रसिद्ध है और भारतवर्ष में काश्मीर देवलोक के समान प्रशंसनीय है.किन्तु काश्मीर में स्थित शारदा सर्वज्ञ महाशक्ति पीठ की महिमा तो त्रिलोक में फैली हुई है. 

पौराणिक महत्व 

     समुद्र मंथन में चौदह रत्नों में से एक 'अमृत' को देवताओं में वितरण करने में राहू छल से देवताओं की पंक्ति में बैठकर 'अमृत' पान कर लिया, भगवान् विष्णु को उस राहू असुर पर सुदर्शन चला दिया किन्तु राहू सर काटे जाने के बाद भी नहीं मरा, अमृत के प्रभाव से सदा के लिए अमर हो गया. फिर यह अमृत असुरों को प्राप्त न हो इसके लिए देवताओं ने 'अमृत कलश' को माँ शारदा को दे दिया. कलश से अमृत की कुछ बूँदें नासिक, उज्जैन, प्रयाग व हरिद्वार में गिरी थी, इसलिए वहां प्रत्येक बारह वर्षों में धर्मसभा हेतु 'महाकुम्भ' का आयोजन होता है. माँ शारदा ने उस 'अमृत कलश' को मधुमती नदी और कृष्णगंगा के तट पर भूमि के भीतर छिपा दिया, फिर अपने एक अंश को पाषाण शिला बनकर उसे ढक दिया. तभी से उस स्थान पर माँ शारदा महाशक्ति रूप में विद्यमान है. कालान्तर में, इसी शिला को माँ शारदा देवी के रूप में पूजा जाता रहा, अनेक दिव्य चमत्कारों व आशीर्वाद से माँ अपने भक्तों का कल्याण करती है. तभी से योग-तंत्र-मन्त्र व अध्यात्मिक शक्तियों की सिद्धि के लिए यह शारदा सर्वज्ञ पीठ विश्वभर के साधकों का आकर्षण बन गई. विश्व के वैदिक विद्वानों को एक सूत्र में बाँधने के लिए जगद्गुरु की उपाधि की परम्परा भी इसी शारदा पीठ से प्रारम्भ हुई. 

    नीलमत पुराण के अनुसार इस शारदा तीर्थ में स्नान करने से एक सहस्र गौ दान का फल प्राप्त होता है. ऋषि शांडिल्य ने भी यहाँ आकर तपस्या की थी. तपस्या से प्रसन्न होकर माँ शारदा ने उन्हें दर्शन देकर उनका मनोरथ पूर्ण किया. 

    जगद्गुरु रामानुजाचार्य ने भी यहाँ  महाशक्ति पीठ- शारदा सर्वज्ञ पीठ से प्रेरणा प्राप्त की. 12 वीं सदी के महान हिन्दू महाराजा ललितादित्य से लेकर 1947 तक यह तीर्थ सनातन धर्म का केंद्र रहा. 

  डोगरा राजपूत महाराजा गुलाब सिंह (1822-1856) से लेकर महाराजा हरी सिंह (1925-1947) के शासन काल में शारदा सर्वज्ञ पीठ, काश्मीर को मंदिर स्थापना के लिए अनेक स्थानों पर भूमि प्रदान की गई.  देश के विभाजन के उपरान्त पाकिस्तान द्वारा काश्मीर के इस भू-भाग पर कब्ज़ा होने के बाद यह शारदा सर्वज्ञ पीठ विधर्मियों द्वारा नष्ट-भ्रष्ट किया जा रहा है. यह पावन मंदिर आज वहां एक खँडहर के रूप में बचा हुआ है. कभी प्रतिवर्ष यहाँ माघ माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को दीक्षांत पर्व का आयोजन होता था. इस दीक्षांत समारोह में देश-विदेश से योग व अध्यात्म प्रेमी श्रद्धालु जन भाग लेते थे. सार्वदेशिक विद्वत वर्ग के लिए सदैव यह शारदा भूमि वन्दनीय रही है. इस शारदा देश काश्मीर में वास करने वाले हिन्दुओं को वर्ण व्यवस्था के भेद से ना देखकर उन्हें काश्मीरी पंडित-शारदा देश विद्वान कहा जाता है. 

    व्याकरण के मनीषी महर्षि पाणिनि, योग ऋषि पतंजलि, वाग्भट्ट, चरक आदि अनेक विभूतियों की जन्म स्थली यही दिव्य हिमालय का आँचल रहा  है. फलतः चिकित्सा शास्त्र, खगोल शास्त्र, ज्योतिष शास्त्र, विमान तकनीकी कला, दर्शन, भवन व वास्तु शिल्प कला के अनेक ग्रंथों का प्रकाशन इसी शारदा भूमि से हुआ. 

    सिखों के दुसरे गुरु अंगद देव जी ने पंजाब से फारसी भाषा की दासता से मुक्ति के लिए जिस गुरुमुखी का चलन प्रारम्भ किया उसके मूल में भी शारदा लिपि है. 

    सातवीं सदी के चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इस शारदा सर्वज्ञ पीठ का भ्रमण किया, जिसकी प्रशंसा करते हुए लिखा कि प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में हिन्दू तीर्थ यात्री व धर्माचार्य इस पीठ पर माँ शारदा के दर्शन करते हैं.

  ग्यारहवीं सदी के इतिहासकार अलबरूनी ने इस शारदा महाशक्ति पीठ-शारदा सर्वज्ञ पीठ की तुलना मुल्तान के शिव मंदिर, गुजरात के सोमनाथ और थानेश्वर के विष्णु चक्रस्वामिन् मंदिर की भव्यता से कर दी थी. साथ ही इस इतिहासकार ने काश्मीर, हिमाचल व पंजाब में प्रयोग होने वाली शारदा लिपि को 'सिद्ध मात्रिक' नाम से उल्लेख किया है,क्योंकि शारदा वर्णमाला "ओम् स्वस्ति सिद्धम्" से आरम्भ होता है.

    ग्यारहवीं सदी के ही मनीषी कवि कल्हण जो काश्मीर छोड़ के चोलुक्य साम्राज्य के राजा विक्रमादित्य छठे के राजसभा के 'विद्यापाठी' नियुक्त हुए, ने भी देवि शारदा सर्वज्ञ पीठ की अद्भुत महिमा लिखी. 

    सोहलवीं सदी के अबुल फ़जल ने इस पवित्र शारदा मंदिर के चमत्कार के विषय में लिखा कि हर हिन्दू महीने की अष्टमी को दैवीय घटनाएं घटती थी. 

      यह शारदा सर्वज्ञ पीठ आज विदेशी आक्रांताओ के कब्जे में हैं, जिसे मुक्त कराने के लिए भारत ही विश्व भर से हिन्दू एक जुट हो रहे हैं. सनातन धर्म और भारतीयता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. और इसी सनातन धर्म के उत्स में शारदा देश काश्मीर है. 


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