ऋग्वेद 1.7.6

 स नौ वृषन्नमुं चरुं सादावन्नावृधि।

अ॒स्मभ्यमप्रतिष्कुतः॥६॥

सःनःवृषन्। अमुम्। चुरुम्। साऽदावन्। अप। वृधि। अस्मभ्यम्। अप्रतिऽष्कुतः॥६॥

पदार्थ:-(सः) ईश्वरः सूर्यो वा (नः) अस्माकम् (वृषन्) वर्षति सुखानि तत्सम्बुद्धो, वर्षयति जलं वा स वाकनिन्युवृषि० (उणा०१.१५४) अनेन ‘वृष' धातोः कनिन्प्रत्ययः। (अमुम्) मोक्षद्वारमागाम्यानन्दं चान्तरिक्षस्थम् (चरुम्) ज्ञानलाभं मेघ वा। चरुरिति मेघनामसु पठितम्। (निघं०१.१०) (सत्रादावन्) सत्यं ददातीति तत्सम्बुद्धौ, सत्रं वृष्टयाख्यं यज्ञं समन्ताद्ददातीति स वा। सत्रेति सत्यनामसु पठितम्। (निघं०३.१०) अत्र आतो मनिन्क्वनिब्वनिपश्च। (अष्टा०३.२.७२) अनेन वनिप्प्रत्ययः। (अप) निवारणे। निपातस्य च। (अष्टा०६.३.१३६) इति दीर्घः। (वृधि) उद्घाटयोद्धाटयति वा। ‘वृञ्' धातोः प्रयोगः। बहुलं छन्दसि (अष्टा०२.४.७३) अनेन श्नोलुंक्। श्रुशृणुप्रकृवृभ्यश्छन्दसि (अष्टा०६.४.१०२) अनेन हेधिः। (अस्मभ्यम्) त्वदाज्ञायां पुरुषार्थे च वर्तमानेभ्यः (अप्रतिष्कुतः)असञ्चलितोऽविस्मृतो वायास्काचार्योऽस्यार्थमेवमाह-अप्रतिष्कुतोऽप्रतिस्कृतोऽप्रतिस्खलितो वेति(निरु०६.१६)॥६॥

अन्वयः-हे वृषन् सत्रादावन् परमेश्वर! स त्वमस्मभ्यमप्रतिष्कुतः सन्नोऽस्माकममुं चरुं मोक्षद्वारमपावृधि उद्घाटय इत्याद्यःतथा भवद्रचितोऽयं सत्रादावा वृषाऽप्रतिष्कुतः सूर्योऽस्मभ्यममुं चरु मेघमपावृणोत्युद्- घाटयतीत्यपरः॥६॥ ___

भावार्थ:-यो मनुष्यो दृढतया सत्यं विद्यां चेश्वराज्ञामुपतिष्ठति तस्यात्मन्यन्तर्यामीश्वरोऽविद्यान्धकार नाशयति। यतो नैव स पुरुषार्थाद्धर्माच्च कदाचिद्विचलति॥६॥

पदार्थ:-हे (वृषन्) सुखों के वर्षाने और (सत्रादावन्) सत्यज्ञान को देनेवाले (स:) परमेश्वर ! आप (अस्मभ्यम्) जो कि हम लोग आपकी आज्ञा वा अपने पुरुषार्थ में वर्तमान हैं, उनके लिये (अप्रतिष्कुतः) निश्चय करानेहारे (नः) हमारे (अमुम्) उस आनन्द करनेहारे प्रत्यक्ष मोक्ष का द्वार (चरुम्) ज्ञानलाभ को (अपावृधि) खोल दीजिये।

तथा हे परमेश्वर! जो यह आपका बनाया हुआ (वृषन्) जल को वर्षाने और (सत्रादावन्) उत्तम-उत्तम पदार्थों को प्राप्त करनेवाला (अप्रतिष्कुतः) अपनी कक्षा ही में स्थिर रहता हुआ सूर्य्य (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (अमुम्) आकाश में रहनेवाले इस (चरुम्) मेघ को (अपावृधि) भूमि में गिरा देता है।॥६॥ __

भावार्थ:-जो मनुष्य अपनी दृढ़ता से सत्यविद्या का अनुष्ठान और नियम से ईश्वर की आज्ञा का पालन करता है, उसके आत्मा में से अविद्यारूपी अन्धकार का नाश अन्तर्यामी परमेश्वर कर देता है, जिससे वह पुरुष धर्म और पुरुषार्थ को कभी नहीं छोड़ता॥६॥

पुनरिन्द्रशब्देनेश्वर उपदिश्यते।

फिर भी अगले मन्त्र में इन्द्र शब्द से परमेश्वर का प्रकाश किया है

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