शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

ऋग्वेद 1.34.7

त्रिों अश्विना यजता दिवेदिवे पर त्रिधातु पृथिवीम॑शायत

म्ति॒स्रो नासत्या रथ्या परावत आत्मेव वातः स्वसंराणि गच्छतम्॥७॥

__त्रिः। नः। अश्विना। यजताद्विवेऽदिवे। परि। त्रिऽधातु। पृथिवीम्अायतम्तस्रः। नासत्यारथ्यापराऽवतः। आत्माऽइव। वातः। स्वसराणि। गच्छतम्॥७॥

पदार्थः-(त्रिः) त्रिवारम् (न:) अस्माकम् (अश्विना) जलाग्नी इव शिल्पिनौ (यजता) यष्टारौ सङ्गन्तारौ। अत्र सर्वत्र सुपां सुलुग्० इत्याकारादेशः। (दिवेदिवे) प्रतिदिनम् (परि) सर्वतो भावे (त्रिधातु) सुवर्णरजतादिधातुसम्पादितम् (पृथिवीम्) भूमिमन्तरिक्षं वा। पृथिवीत्यन्तरिक्षनामसु पठितम्। (निघं०१.३) (आशयतम्) शयाताम्। अत्र लोडर्थे लङ। अशयातामिति प्राप्ते ह्रस्वदीर्घयोर्व्यत्ययासः। (तिस्रः) ऊर्ध्वाधः समगती: (नासत्या) न विद्यतेऽसत्यं ययोस्तौ (रथ्या) यौ रथविमानादिकं यानं वहतस्तौ (परावतः) दूरस्थानानि। परावतः प्रेरितवत: परागताः। (निरु०११.४८) परावत इति दूरनामसु पठितम्। (निघं०३.२६) (आत्मेव) आत्मनः शीघ्रगमनवत् (वातः) कलाभिमितो वायुः (स्वसराणि) स्वस्वकार्य्यप्रापकाणि दिनानि। स्वसराणीति पदनामसु पठितम्। (निघ०४.२) अनेन प्राप्त्यर्थो गृह्यते (गच्छतम्) ।।७॥ ____

अन्वयः-हे नासत्यौ यजतौ रथ्यावश्विनाविव शिल्पिनौ युवां! पृथिवी प्राप्य त्रिः पर्यशयातमात्मेव वात: प्राणश्च स्वसराणि दिवे दिवे गच्छति तद्वद्गच्छतं नोऽस्माकं त्रिधातु यानं परावतो मागाँस्तिस्रो गतीर्गमयतम्॥७॥

भावार्थ:-अत्रोपमालङ्कारः। ऐहिकसुखमभीप्सवो जना यथा जीवोऽन्तरिक्षादिमागैः सद्यः शरीरान्तरं गच्छति यथा च वायुः सद्यो गच्छति तथैव पृथिव्यादिविकारैः कलायन्त्रयुक्तानि यानानि रचयित्वा तत्र जलाग्न्यादीन् सम्प्रयोज्याभीष्टान् दूरदेशान् सद्यः प्राप्नुयुः। नैतेन कर्मणा विना सांसारिकं सुखं भवितुमर्हति॥७॥

पदार्थ:-हे (नासत्या) असत्य व्यवहाररहित (यजता) मेल करने तथा (रथ्या) विमानादि यानों को प्राप्त कराने वाले (अश्विना) जल और अग्नि के समान कारीगर लोगो! तुम दोनों (पृथिवी) भूमि वा अन्तरिक्षे को प्राप्त होकर (त्रिः) तीन वार (पर्यशायतम्) शयन करो (आत्मेव) जैसे जीवात्मा के समान (वातः) प्राण (स्वसराणि) अपने कार्यों में प्रवृत्त करने वाले दिनों को नित्य नित्य प्राप्त होते हैं, वैसे (गच्छतम्) देशान्तरों को प्राप्त हुआ करो और जो (न:) हम लोगों के (त्रिधातु) सोना चान्दी आदि धातुओं से बनाये हुए यान (परावतः) दूर स्थानों को (तिस्रः) ऊंची नीची और सम चाल चलते हुए मनुष्यादि प्राणियों को पहुंचाते हैं, उनको कार्यसिद्धि के अर्थ हम लोगों के लिये बनाओ।॥७॥

भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। संसारसुख की इच्छा करने वाले पुरुष जैसे जीव अन्तरिक्ष आदि मार्गों से दूसरे शरीरों को शीघ्र प्राप्त होता और जैसे वायु शीघ्र चलता है, वैसे ही पृथिव्यादि विकारों से कलायन्त्र युक्त यानों को रच और उनमें अग्नि, जल आदि का अच्छे प्रकार प्रयोग करके चाहे हुए दूर देशों को शीघ्र पहुंचा करें, इस काम के विना संसारसुख होने को योग्य नहीं है॥७॥

पुनस्तौ कीदृशौ ताभ्यां कि कि साध्यमित्युपदिश्यते॥

फिर वे कैसे हैं और उनसे क्या-क्या सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में

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