ऋग्वेद 1.34.1

 आवः शमं वृषभं तुग़यासु क्षेत्रजेषे मघवञ्छ्वित्र्यं गाम्

अथकादशर्चस्य पञ्चत्रिंशस्य सूक्स्याङ्गिरसो हिरण्यस्तूप ऋषिः। आदिमस्य

मन्त्रस्याग्निर्मित्रावरुणौ रात्रिः सविता च, २-११ सविता च देवताः। १ विराड् जगती। ९

निज्जगती छन्दः। निषादः स्वरः। २, ५, १०, ११ विराट् त्रिष्टुप्। ३, ४, ६ त्रिष्टुप् छन्दः।

धैवत: स्वरः ७,८ भुरिक् पङ्क्तिश्छन्दः। पञ्चमः स्वरः॥

तत्र अग्न्यादिगुणान् विज्ञाय कृत्यं सिद्धं कुर्यादित्युपदिश्यन्ते।

अब पैतीसवें सूक्त का आरम्भ है। उस के पहिले मन्त्र से अग्नि आदि के गुणों को जाने के सब प्रयोजनों को सिद्ध करे, इस विषय का वर्णन किया है।

ह्वाम्य॒ग्नि प्रथमं स्व॒स्तये ह्वयामि मित्रावरुणाविहावसे।

ह्वामि रात्री जगतो निवेशनी ह्वामि देवं सवितारमूतये॥१॥

ह्वामि। अग्निम्। प्रथमम्। स्व॒स्तये। ह्वामि। मित्रावरुणौ। दुह। अव॑से। हामि। रात्रीम्। जगतः। निऽवेशनीम्। ह्वामि। दे॒वम्। सवितारम्। ऊतये।। १॥

पदार्थ:-(ह्वयामि) स्पर्धामि (अग्निम्) रूपगुणम् (प्रथमम्) जीवनस्यादिमनिमित्तम् (स्वस्तये) सुशोभनमिष्टं सुखमस्ति यस्मात्तस्मै सुखाय (ह्वयामि) स्वीकरोमि (मित्रावरुणौ) मित्रः प्राणो वरुण उदानस्तौ (इह) अस्मिन् शरीरधारणादिव्यवहारे (अवसे) रक्षणाद्याय (ह्वयामि) प्राप्नोमि (रात्रीम्) सूर्याभावादन्धकाररूपाम् (ह्वयामि) गृह्णामि (देवम्) द्योतनात्मकं (सवितारम्) सूर्यलोकम् (ऊतये) क्रियासिद्धीच्छाये॥१॥

अन्वयः-अहमिह स्वस्तये प्रथममग्निं ह्वयाम्यवसे मित्रावरुणो ह्वयामि जगतो निवेशनी रात्री ह्वयाम्यूतये सवितारं देवं ह्वयामि।।१।।

भावार्थ:-मनुष्यैरहर्निशं सुखायाग्निवायुसूर्याणां सकाशादुपयोगं गृहीत्वा सर्वाणि सुखानि प्राप्याणि नैतदादिना विना कदाचित् कस्यचित् सुखं सम्भवतीति।।१।।

पदार्थ:-मैं (इह) इस शरीर धारणादि व्यवहार में (स्वस्तये) उत्तम सुख होने के लिये (प्रथमम्) शरीर धारण के आदि साधन (अग्निम्) रूप गुणयुक्त अग्नि के (ह्वयामि) ग्रहण की इच्छा करता हूँ (अवसे) रक्षणादि के लिये (मित्रावरुणौ) तथा प्राण वा उदान वायु को (ह्वयामि) स्वीकार करता हूं (जगतः) संसार को (निवेशनीम्) निद्रा में निवेश कराने वाली (रात्रीम्) सूर्य के अभाव से अन्धकाररूप रात्रि को (ह्वयामि) प्राप्त होता हूं (ऊतये) क्रियासिद्धि की इच्छा के लिये (देवम्) द्योतनात्मक (सवितारम्) सूर्य लोक को (ह्वयामि) ग्रहण करता हूं॥१॥

भावार्थ:-मनुष्यों को चाहिये कि दिन-रात सुख के लिये अग्नि वायु और सूर्य के सकाश से उपकार को ग्रहण करके सब सुखों को प्राप्त होवें, क्योंकि इस विद्या के विना कभी किसी पुरुष को पूर्ण सुख का सम्भव नहीं हो सकता।।१।

अथ सूर्यलोकगुणा उपदिश्यन्ते॥

अब अगले मन्त्र में सूर्यलोक के गुणों का उपदेश किया है।

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