शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

ऋग्वेद 1.32.114

 नव॑ च यन्नवति च स्रवन्ती: श्ये॒नो न भीतो अतरौ रजांसि॥१४॥

अहैः। यातारम्। कम्। अपश्यः। इन्द्र। हुदि। यत्। ते। जघ्नुपः। भीः। अगच्छत्। नवा चा यत्। नवतिम्। च स्रवन्तीः। श्ये॒नः। न। भीतः। अतरः। रजांसि।।१४॥ ___

पदार्थ:-(अहेः) मेघस्य (यातारम्) देशान्तरे प्रापयितारम् (कम्) सूर्यादन्यम् (अपश्यः) पश्येत्। अत्र लिडर्थे लङ्। (इन्द्र) शत्रुदलविदारकः योद्धः (हृदि) हृदये (यत्) धनम् (ते) तव (जघ्नुषः) हन्तुः सकाशात् (भीः) भयम् (अगच्छत्) गच्छति प्राप्नोति। अत्र सर्वत्र वर्तमाने लङ्। (नव) संख्यार्थे (च) पुनरर्थे (स्रवन्तीः) गमनं कुर्वन्तीनदीर्नाडीा। स्रवन्त्य इति नदीनामसु पठितम्। (निघं०१.१३) त्रु धातोर्गत्यर्थत्वाद् रुधिरप्राणगमनमार्गा जीवनहेतवो नाड्योऽपि गृह्यन्ते। (श्येनः) पक्षी (न) इव (भीतः) भयं प्राप्तः (अतरः) तरति (रजांसि) सल्लिोकान्। लोका रजांस्युच्यन्ते। (निरु०४.१९)।।१४।

अन्वयः-हे इन्द्र योद्धार्यस्य शत्रून् जघ्नुषस्ते तव प्रभावोऽहेर्मेघस्य विद्युद्गर्जनादिविशेषात् प्राणिनो यद्याभीरगच्छत् प्राप्नोति विद्वान् मनुष्यस्तस्य मेघस्य यातारं देशान्तरे प्रापयितारं सूर्य्यादन्यं कमप्यर्थ न पश्येयुःस सूर्येण हतो मेघो भीतो नेव श्येनादिव कपोत: भूमौ पतित्वा नवनवतिर्नदी डीर्वा स्रवन्ती: पूर्णाः करोति यद्यस्मात्सूर्यः स्वकीयैः प्रकाशाकर्षणछेदनादिगुणैर्महान् वर्त्तते तत्तस्माद्रजांस्यतर: सर्वांल्लोकान् सन्तरतीवास्ति स त्वं हृदि यं शत्रुमपश्यः पश्येस्तं हन्याः॥१४॥

भावार्थ:-अत्रोपमालङ्कारः। राजभृत्या वीरा यथा केनचित् प्रहृतो भययुक्त: श्येन: पक्षी इतस्ततो गच्छति तथैव सूर्येण हत आकर्षितश्च यो मेघ इतस्तत: पतन् गच्छति, स स्वशरीराख्येन जलेन लोकलोकान्तरस्य मध्येऽनेका नद्यो नाड्यश्च पिपर्ति। अत्र नवनवतिमिति पदमसंख्यातार्थेऽस्त्युपलक्षणत्वान्नह्येतस्य मेघस्य सूर्याद्भिन्नं किमपि निमित्तमस्ति। यथाऽन्धकारे प्राणिनां भयं जायते, तथा मेघस्य सकाशाद् विद्युद्गर्जनादिभिश्च भयं जायते तन्निवारकोऽपि सूर्य एव तथा सर्वलोकानां प्रकाशाकर्षणादिभिर्व्यवहारहेतुरस्ति तथैव शत्रून् विजयेरन्॥१४॥

पदार्थ:-हे (इन्द्र) इन्द्र योद्धा जिस युद्ध व्यवहार में शत्रुओं का (जघ्नुषः) हनने वाले (ते) आपका प्रभाव (अहेः) मेघ के गर्जन आदि शब्दो से प्राणियों को (यत्) जो (भीः) भय (अगच्छत्) प्राप्त होता है, विद्वान् लोग उस मेघ के (यातारम्) देश-देशान्तर में पहुंचाने वाले सूर्य को छोड़ और (कम्) किसको देखें। सूर्य से ताड़ना को प्राप्त हुआ मेघ (भीतः) डरे हुए (श्येनः) (न) वाज के समान (च) भूमि में गिर के (नवनवतिम्) अनेक (स्रवन्ती:) जल बहाने वाली नदी वा नाड़ियों को पूरित करता है (यत्) जिस कारण सूर्य अपने प्रकाश, आकर्षण और छेदन आदि गुणों से बड़ा है, इसी से (रजांसि) सब लोकों को (अतर:) तरता अर्थात् प्रकाशित करता है। इसके समान आप हैं, वे आप (हृदि) अपने मन में जिसको शत्रु (अपश्यः) देखो उसी को मारा करो।।१४।__

भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजसेना के वीर-पुरुषों को योग्य है कि जैसे किसी से पीड़ा को पाकर डरा हुआ श्येन पक्षी इधर-उधर गिरता-पड़ता उड़ता है वा सूर्य से अनेक प्रकार की ताड़ना और खेंच कढ़ेर को प्राप्त होकर मेघ इधर-उधर देशदेशान्तर में अनेक नदी वा नाड़ियों को पूर्ण करता हैइस मेघ की उत्पत्ति का सूर्य से भिन्न कोई निमित्त नहीं है और जैसे अन्धकार में प्राणियों को भय होता है, वैसे ही मेघ के बिजली और गर्जना आदि गुणों से भय होता है, उस भय का दूर करने वाला भी सूर्य ही है तथा सब लोकों के व्यवहारों को अपने प्रकाश और आकर्षण आदि गुणों में चलाने वाला है, वैसे ही दुष्ट शत्रुओं को जीता करें। इस मन्त्र में (नवनवतिम्) यह संख्या का उपलक्षण होने से पद असंख्यात अर्थ में है।।१४।___

पुन: सूर्यः कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर उक्त सूर्य कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

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