ऋग्वेद 1.29.4

 ससन्तु त्या अरातो बोधन्तु शूर रा॒तयः।

आ तू न इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ॥४॥

स॒सन्तु। त्याः। अरातयः। बोधन्तु। शूर। रा॒तयः। आ। तु। नः। द्वन्द्र। शंसय। गोषु। अश्वेषु। शुभ्रिषु। सहस्रेषु। तुविऽमघ॥४॥ ___

पदार्थ:-(ससन्तु) निद्रां प्राप्नुवन्तु (त्याः) वक्ष्यमाणाः (अरातयः) अविद्यामानारातिर्दानं येषां शत्रूणां ते (बोधन्तु) जानन्तु (शूर) शृणाति हिनस्ति शत्रुबलान्याक्रमति। अत्र 'शू हिंसायाम्' इत्यस्माद् बाहुलकाड्डूरन्प्रत्ययः। (रातयः) दातारः (आ) समन्तात् (तु) पुनरर्थे। ऋचि तुनु० इति दीर्घः। (न:) अस्मान् (इन्द्र) उत्कृष्टैश्वर्य्यसभाध्यक्ष सेनापते (शंसय) शत्रूणां विजयेन प्रशंसायुक्तान् कुरु (गोषु) सूर्यादिषु (अश्वेषु) (शुभ्रिषु) (सहस्रेषु) उक्तार्थेषु (तुविमघ) अस्यार्थसाधुत्वे पूर्ववत्॥४॥

अन्वयः-हे तुवीमघ शूर सेनापते! तवारातयः ससन्तु ये रातयश्च ते सर्वे बोधन्तु तु पुनः हे इन्द्र वीरपुरुष! त्वं सहस्रेषु शुभ्रिषु गोष्वश्वेषु नोऽस्मानाशंसय॥४॥

भावार्थ:-अस्माभिः स्वसेनासु शूरा मनुष्या रक्षित्वा हर्षणीया येषां भयाद् दुष्टाः शत्रवः शयीरन् कदाचिन्मा जाग्रतु, येन वयं निष्कण्टकं चक्रवर्त्तिराज्यं नित्यं सेवेमहीति॥४॥

पदार्थ:-हे (तुविमघ) विद्या सुवर्ण सेना आदि धनयुक्त (शूर) शत्रुओं के बल को नष्ट करने वाले सेनापति! आप के (अरातयः) जो दान आदि धर्म से रहित शत्रुजन हैं, वे (ससन्तु) सो जावें और जो (रातयः) दान आदि धर्म के कर्ता हैं (त्याः) वे (बोधन्तु) जाग्रत होकर शत्रु और मित्रों को जानें (तु) फिर हे (इन्द्र) अत्युत्तम ऐश्वर्ययुक्त सभाध्यक्ष सेनापते वीरपुरुष! तू (सहस्रेषु) हजारह (शुभ्रिषु) अच्छेअच्छे गुण वाले (गोषु) गौ वा (अश्वेषु) घोड़े हाथी सुवर्ण आदि धनों में (नः) हम लोगों को (आशंसय) शत्रुओं के विजय से प्रशंसा वाले करो।।४।___

भावार्थ:-हम लोगों को अपनी सेना में शूर ही मनुष्य रखकर आनन्दित करने चाहिये, जिससे भय के मारे दुष्ट और शत्रुजन जैसे निद्रा में शान्त होते हैं, वैसे सर्वदा हों, जिससे हम लोग निष्कंटक अर्थात् बेखटके चक्रवर्त्ति राज्य का सेवन नित्य करें।।४॥

पुन: स वीरः कीदृश इत्युपदिश्यते॥

फिर वह वीर कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

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