ऋग्वेद 1.27.7

 यमग्ने पृत्सु मर्त्यमा वाजेषु यं जुनाः।

स यन्ता शर्यतीरिषः॥७॥

यम्। अग्ने। पृऽत्सु। मर्त्यम्। अवाः। वाजेषु। यम्। जुनाः। सः। यन्ता। शश्वतीः। इषः॥७॥

पदार्थ:-(यम्) धार्मिकं शूरवीरम् (अग्ने) स्वबलतेजसा प्रकाशमान (पृत्सु) पृतनासु। पदादिषु मांस्पृत्स्नूनामुपसंख्यानम्। (अष्टा०वा०६.१.६३) इति वार्त्तिकेन पृतनाशब्दस्य पृदादेशः। (मर्त्यम्) मनुष्यम् (अवाः) रक्षेः। अयं लेटप्रयोगः। (वाजेषु) संग्रामेषु (यम्) योद्धारम् (जुनाः) प्रेरयः। अयं 'जुन गतौ' इत्यस्य लेटप्रयोगः। (सः) मनुष्यः (यन्ता) शत्रूणां निग्रहीता (शश्वती:) अनादिस्वरूपाः (इषः) इष्यन्ते यास्ताः प्रजाःअत्र कृतो बहुलम् इति कर्मणि क्विप्॥७॥

अन्वयः-हे जगदीश्वर! त्वं यं मयं पृत्स्ववा रक्षेर्यं च वाजेषु जुनाः प्रेरयेर्य इमाः शश्वती: प्रजा: सततमवरक्षेरस्मात् कारणात् स भवानस्माकं सदा यन्ता भवत्विति वयं प्रतिजानीमः॥७॥ ___

भावार्थ:-यथा यो जगदीश्वर एवानादिकालाद् वर्तमानायाः प्रजाया रक्षारचनाव्यवस्थाकारकोऽस्ति, तथा यो मनुष्य एतं सर्वव्यापिनं सर्वतोऽभिरक्षकं परमेश्वरमुपास्यैवं विदधाति तस्य नैव कदाचित्पीडापराजयौ भवत इति॥७॥

पदार्थ:-हे (अग्ने) सेनाध्यक्ष! आप (यम्) जिस युद्ध करने वाले (मर्त्यम्) मनुष्य को (पृत्सु) सेनाओं के बीच (अवाः) रक्षा करें (यम्) जिस धार्मिक शूरवीर को (वाजेषु) संग्रामों में (जुनाः) प्रेरें जो इस (शश्वतीः) अनादि काल से वर्तमान (इषः) प्रजा की निरन्तर रक्षा करें, इस कारण से (सः) सो आप हमारा (यन्ता) नियमों में चलाने वाला नायक हूजिये, इस प्रकार हम प्रतिज्ञा करते हैं॥७॥ ___

भावार्थ:-जैसे जगदीश्वर जो अनादि काल से वर्तमान प्रजा की रक्षा, रचना और व्यवस्था करने वाला है, वैसे जो मनुष्य इस सर्वव्यापी सब प्रकार की रक्षा करने वाले परमेश्वर की उपासना कर यथोक्त काम करता है, उसको न कभी पीड़ा वा पराजय होता है।।७।। ___

पुनः सः कीदृश इत्युपदिश्यते॥

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

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