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ऋग्वेद 1.25.3

 परा हि मे विर्मन्यवः पतन्ति वस्य॑इष्टये

वयो न वस॒तीरुप॥४॥

परा। हि। मे। विऽमन्यवः। पतन्ति। वस्य:ऽइष्टये। वयः। न। वसतीः। उप॥ ४॥

पदार्थ:-(परा) उपरिभावे। प्र परेत्येतस्य प्रातिलोम्यं प्राह। (निरु०१.३) (हि) खलु (मे) मम (विमन्यवः) विविधो मन्युर्येषां ते (पतन्ति) पतन्तु गच्छन्तु। अत्र लोडर्थे लट्। (वस्यइष्टये) वसीयत इष्टये सङ्गतयेअत्र वसुशब्दान्मतुप् ततोऽतिशय ईयसुनि। विन्मतोलुंक्। (अष्टा०५.३.६५) इति मतोलुंक्। टेः। (अष्टा०६.४.१५५) इति टेर्लोपस्ततश्छान्दसो वर्णलोपो वा इतीकारस्य लोपश्च। (वयः) पक्षिणः (न) इव (वसतीः) वसन्ति यासु ता विहाय (उप) सामीप्ये॥४॥

अन्वयः-हे जगदीश्वर! त्वत्कृपया वयो वसतीर्विहाय दूरस्थानान्युपपतन्ति न इव। मे मम वासात् वस्यइष्टये विमन्यवः परा पतन्ति हि खलु दूरे गच्छन्तु॥४॥ _

_भावार्थ:-अत्रोपमालङ्कारः। यथा ताडिताः पक्षिणो दूरं गत्वा वसन्ति, तथैव क्रोधयुक्ताः प्राणिनो मत्तो दूरे वसन्त्वहमपि तेभ्यो दूरे वसेयम्। यस्मादस्माकं स्वभावविपर्यासो धनहानिश्च कदाचिन्न स्यातामिति॥४॥

संस्कृताभिर्वाणीभिः (वरुण) जगदीश्वर (सीमहि) हृदये प्रेम वा कारागृहे चोरादिकं बन्धयामः। अत्र बहुलं छन्दसि इति श्नोलुंक वर्णव्यत्ययेन दीर्घश्च॥३॥

अन्वयः-हे वरुण! वयं रथी: संदितमश्वं न इव मृळीकाय ते तव गीर्भिर्मनो विषीमहि।।३॥

भावार्थ:-अत्रोपमालङ्कारः। हे भगवन्! यथा रथपते त्योऽश्वं सर्वतो बध्नाति, तथैव वयं तव वेदस्थं विज्ञानं हृदये निश्चलीकुर्मः।।३।।

पदार्थ:-हे (वरुण) जगदीश्वर! हम लोग (रथी:) रथवाले के (संदितम्) रथ में जोड़े हुए (अश्वम्) घोड़े के (न) समान (मृळीकाय) उत्तम सुख के लिये (ते) आपके सम्बन्ध में (गीर्भिः) पवित्र वाणियों द्वारा (मनः) ज्ञान (विषीमहि) बांधते हैं।।३।

भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे भगवन् जगदीश्वर! जैसे रथ के स्वामी का भृत्य घोड़े को चारों ओर से बांधता है, वैसे ही हम लोग आपका जो वेदोक्त ज्ञान है, उसको अपनी बुद्धि के अनुसार मन में दृढ़ करते हैं।।३।पुनः स एवार्थो दृष्टान्तेन साध्यते॥

फिर भी उसी अर्थ को दृष्टान्त से अगले मन्त्र में सिद्ध किया है।